सिनेमा प्रेमियों के लिए आरोन सॉर्किन की नई फिल्म द सोशल रेकनिंग रिव्यू एक नया दृष्टिकोण सामने लाता है, क्योंकि यह कहानी फेसबुक के शुरुआती दिनों वाली कानूनी लड़ाई के बजाय उसके गंभीर आंतरिक संकट पर केंद्रित है। वर्ष 2010 की चर्चित फिल्म में जब दर्शक मार्क जुकरबर्ग से आखिरी बार रूबरू हुए थे, तब वह एक कानूनी दफ्तर में बैठकर बार-बार स्क्रीन रिफ्रेश करते हुए अपनी पूर्व प्रेमिका द्वारा फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अगर किसी को यह उम्मीद थी कि लेखक और निर्देशक के रूप में लौटे आरोन सॉर्किन उस एकाकी युवा टेक जीनियस के दो दशकों के नैतिक पतन और फ्री स्पीच के पैरोकार बनने के सफर को दिखाएंगे, तो यह फिल्म उस अपेक्षा को पूरी तरह बदल देती है। शीर्षक के दो शब्द और जुकरबर्ग का केंद्रीय चरित्र साझा करने के बावजूद, यह डेविड फिंचर की उस क्लासिक फिल्म का पारंपरिक सीक्वल नहीं है।
जुकरबर्ग के बजाय व्हिसलब्लोअर फ्रांसेस हौगेन पर फोकस
इस नई पटकथा में सॉर्किन का मुख्य केंद्र मार्क जुकरबर्ग नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक विशाल कॉर्पोरेट विरोधी शक्ति के रूप में पेश किया गया है। जेरेमी स्ट्रॉन्ग ने नाक से बोलने वाले और बेहद गंभीर जुकरबर्ग के किरदार को सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद बेहद प्रभावशाली दृश्यों के साथ निभाया है, जिसे पहले जेसी आइजनबर्ग ने निभाया था। फिल्म का असली मिजाज अदालती दांव-पेंच के मुकाबले खोजी राजनीतिक पत्रकारिता की पड़ताल करता है। इसमें पुराने और धीमे मीडिया के मूल्यों को बखूबी जगह दी गई है, जिसे पत्रकार जेफ हॉरविट्ज़ की भूमिका में जेरेमी एलेन व्हाइट ने बेहद शांत और सुलझे हुए अंदाज में जीवंत किया है। हालांकि, पूरी कहानी का असली ध्रुव माइकी मैडिसन का किरदार है, जो फेसबुक की कर्मचारी और व्हिसलब्लोअर फ्रांसेस हौगेन के रूप में सामने आती हैं।
एल्गोरिदम का खतरा और नैतिक अंतर्द्वंद्व
फिल्म की शुरुआती कड़ियों में हौगेन को एक ऐसी जिद्दी और असहज बाहरी शख्सियत के तौर पर पेश किया गया है, जो सिलिकॉन वैली के दफ्तरों में काम करते हुए वहां की कार्यसंस्कृति से तालमेल नहीं बिठा पाती। हौगेन एक स्पष्ट मिशन पर हैं, जिसका मकसद यह उजागर करना है कि फेसबुक का एल्गोरिदम किस तरह आम यूजर्स को चरमपंथी समूहों की ओर धकेलता है। इसके साथ ही वह इस बात को भी रेखांकित करती हैं कि इंस्टाग्राम किस तरह युवा महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहा है। उनका यह प्रयास उनके सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों को नागवार गुजरता है, जो उन्हें नजरअंदाज करते हुए कसान्ड्रा का नाम दे देते हैं।
बदले की भावना के बजाय निस्वार्थ नायकत्व
जुकरबर्ग के अतीत के विपरीत, जहां अकेलापन बदले की आग में तब्दील हो गया था, हौगेन का अलगाव उन्हें एक निस्वार्थ नायकत्व की ओर ले जाता है। 6 जनवरी 2021 को यूएस कैपिटल में हुई हिंसा के दौरान जब फेसबुक की नीतियों के भयानक परिणाम दुनिया के सामने आते हैं, तो हौगेन की अंतरात्मा उन्हें सच सामने लाने के लिए प्रेरित करती है। सॉर्किन ने इस ऐतिहासिक घटना को स्क्रीन पर आंशिक रूप से दोबारा पेश किया है, हालांकि यह उनके पिछले निर्देशन में दिखाए गए 1968 के दंगों जितने बड़े पैमाने पर नहीं है। मैडिसन ने अपने किरदार की भावनात्मक कशमकश को पर्दे पर बेहद संजीदगी से उतारा है। उनके अभिनय के बारे में समीक्षकों का कहना है कि
माइकी मैडिसन पूरी फिल्म में शानदार ढंग से संवेदनशील और दृढ़ बनी रहती हैंऔर जेरेमी एलेन व्हाइट के साथ उनके संवाद बेहद धारदार हैं।
संवादों की धार और फिंचर की दृश्य शैली की कमी
सॉर्किन की किसी भी रचना की तरह, यह फिल्म भी तीखे, चुटीले और बौद्धिक संवादों से सजी हुई है, जिसे सामान्य जीवन में कोई नहीं बोलता लेकिन हर कोई बोलने की ख्वाहिश रखता है। तकनीकी और दृश्य शैली के मामले में फिल्म फिंचर के निर्देशन की चमक, विजुअल कसावट और ट्रेंट रेज़नर तथा एटिकस रॉस के असाधारण बैकग्राउंड स्कोर के मुकाबले थोड़ी फीकी पड़ती है। उच्च जोखिम वाले मुद्दों के बावजूद यह कैनवस पर कुछ हद तक छोटी महसूस होती है। इसके बावजूद, इसकी विषयवस्तु बेहद सामयिक और सशक्त है, जो एक बेहतरीन स्टारकास्ट के दम पर आधुनिक डिजिटल युग का एक अनिवार्य अध्याय पेश करती है।























