पॉल ग्रीनग्रास के निर्देशन में बनी नई ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म द अपराइजिंग का यह विस्तृत द अपराइजिंग रिव्यू पड़ताल करता है कि कैसे एक पुरानी सदी का जनसंघर्ष आज के सामाजिक सरोकारों से जुड़ता है। यूनाइटेड 93 और कैप्टन फिलिप्स जैसी तनावपूर्ण फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले पॉल ग्रीनग्रास ने अपनी जानी-पहचानी सिनेमा वेरिटे शैली को चौदहवीं शताब्दी की पृष्ठभूमि पर लागू किया है। इस फिल्म में एंड्रयू गारफील्ड हाथ में हंसिया थामे सर्वहारा वर्ग के प्रतीक के रूप में दिखाई देते हैं। स्पाइडर-मैन के किरदार के लिए मशहूर अभिनेता यहां एक गहरे शोक में डूबे, दबे-कुचले व्यक्ति की भूमिका निभाते हैं, जिसके कंधों पर एक विशाल आंदोलन की जिम्मेदारी आ जाती है। उनका पात्र केवल 'प्लोमैन' नाम से जाना जाता है, जो चौदहवीं सदी की प्रसिद्ध कविता पियर्स प्लोमैन की याद दिलाता है। यह किरदार उस ऐतिहासिक पीजेंट्स रिवोल्ट की अगुवाई करता है, जिसके बारे में प्रचार के दौरान यह दावा भी जुड़ा रहा कि इसी से रॉबिन हुड की लोककथा का जन्म हुआ था। इस दावे की सच्चाई जो भी हो, यह फिल्म उसी कालखंड से ताल्लुक रखती है जहां अमीरों से छीनकर गरीबों को बांटने की अंग्रेजी लोककथाएं पनपी थीं, जो आज भी दर्शकों के बीच बेहद प्रासंगिक लगती हैं।
1381 का कालखंड और शाही हुकूमत के जुल्म
कहानी की शुरुआत वर्ष 1381 से होती है। ब्लैक प्लेग महामारी के भीषण दौर के बाद इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए वहां का किशोर राजा रिचर्ड द्वितीय किसानों पर बेरहम टैक्स लगा देता है। वूडी नॉर्मन द्वारा निभाया गया यह बाल राजा अपनी चालाक और कुटिल शाही परिषद के इशारों पर चलता है, जिसे बेहतरीन चरित्र अभिनेताओं की टोली ने पर्दे पर साकार किया है। किसानों पर बढ़ते अत्याचार के बीच जब यह खबर फैलती है कि प्लोमैन नाम के एक आम किसान ने एक क्रूर शाही गार्ड की अवज्ञा की है, तो एक चिंगारी की तरह बगावत पूरे इलाके में भड़क उठती है। यह घटना कई ऐतिहासिक विद्रोही नेताओं को एकजुट कर देती है। इनमें अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले विद्रोही वॉट टायलर और ओजस्वी उपदेशक जॉन बॉल शामिल हैं, जिनकी भूमिकाएं क्रमशः कॉस्मो जार्विस और जेमी बेल ने निभाई हैं। ये दोनों नेता लंदन की ओर एक ऐतिहासिक मार्च आयोजित करने का फैसला करते हैं।
विद्रोह के भीतर नैतिक द्वंद्व और खूनी संघर्ष
लंदन की ओर बढ़ते इस आंदोलन के बीच प्लोमैन को अपने बदलते नैतिक सिद्धांतों से जूझना पड़ता है। आंदोलन में शामिल कई उग्र विद्रोही केवल बदलाव नहीं बल्कि खून का बदला खून चाहते हैं। इस उग्र और बदले की आग को थॉमसिन मैकेंजी का किरदार ऐलिस बखूबी दर्शाता है। ऐलिस का अतीत दर्दनाक घटनाओं से भरा है, जो उसे और प्लोमैन को एक साझे भावनात्मक रिश्ते में बांधता है। फिल्म पूरी तरह नियंत्रित अराजकता के जरिए आगे बढ़ती है, जो निर्देशक पॉल ग्रीनग्रास की कार्यशैली का मुख्य ट्रेडमार्क माना जाता है। निर्देशक के यथार्थवादी कैमरे और ऐतिहासिक कालखंड के बीच का यह अनूठा संगम फिल्म को एक समकालीन धार देता है। यह किसी पारंपरिक ऐतिहासिक नाटक की तरह धीमा या औपचारिक नहीं लगता, बल्कि लगातार हिंसा और खूनी संघर्ष की आशंका से भरा रहता है।
शाही दरबार, आंतरिक राजनीति और अदाकारी का दम
हजारों लोगों की भीड़ इस संघर्ष को दिशा देती है, जो एक तरफ खूनी बदले और ठोस राजनीतिक मांगों के बीच झूलती है, वहीं दूसरी तरफ अपने ही राजा के प्रति गहरा धार्मिक सम्मान भी बनाए रखती है। निर्देशक और संपादक विलियम गोल्डनबर्ग ने इस विशाल जनसमूह और आंदोलन के प्रमुख चेहरों के बीच एक सटीक संतुलन स्थापित किया है। किशोर सम्राट रिचर्ड द्वितीय के रूप में वूडी नॉर्मन ने एक भयभीत और दुस्वप्नों से घिरे शासक को पेश किया है, जिसकी कमजोर निर्णय क्षमता का फायदा उसके दरबारी उठाते हैं। इस बीच रिचर्ड की उसूलपसंद मां, फेयर मेड ऑफ केंट के रूप में कैथरीन वॉटरस्टन की मौजूदगी बाल राजा के प्रति दर्शकों में हमदर्दी जगाती है। ग्रीनग्रास इस उथल-पुथल को छोटे-छोटे किरदारों के जरिए भी गहराई देते हैं, जिसमें स्काई यांग द्वारा निभाया गया शाही मुंशी का मूक किरदार बेहद प्रभावशाली साबित होता है। हालांकि पूरी फिल्म का मुख्य आकर्षण एंड्रयू गारफील्ड ही बने रहते हैं, जिनका वर्षों का दबा हुआ दर्द उनके हर शब्द और हरकत में साफ झलकता है।
तीखे टकराव और नैतिक सवाल
शुरुआती उग्र और हिंसक दृश्यों के बाद फिल्म गहन बातचीत और वार्ताओं की ओर मुड़ती है। यह ड्रामा आधुनिक वर्ग संघर्ष के मुद्दों को उस दौर की प्राचीन धार्मिक चेतना में पिरोता है। भले ही यह नजरिया आज के आधुनिक दर्शकों को थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यह किरदारों के सामने गहरे नैतिक और आध्यात्मिक सवाल खड़े कर देता है। यहां न्याय और बदले की परिभाषाएं आपस में उलझ जाती हैं, जिससे कहानी एक अशांत और अप्रत्याशित अंजाम की ओर बढ़ती है। अमीरों के खिलाफ बगावत दिखाने वाली समकालीन व्यंग्यात्मक फिल्मों के इस दौर में यह ऐतिहासिक ड्रामा बिना किसी लाग-लपेट के उस क्रूर यथार्थ को सामने रखता है कि व्यवस्था के खिलाफ एक आम विद्रोह कैसा रूप ले सकता है।





















