दिल्ली और एनसीआर के निवासियों के लिए पिछले 50 घंटे किसी बड़े बदलाव से कम नहीं रहे हैं। पिछले तीन वर्षों के लंबे समय के बाद, दिल्ली की हवा की गुणवत्ता 'अच्छी' श्रेणी में दर्ज की गई है। इस बदलाव का मुख्य कारण पिछले दो दिनों से हो रही लगातार मानसून की बारिश है, जिसने दिल्ली के प्रदूषण को पूरी तरह से धो दिया है। एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह 65, 49, 56 और 48 के स्तर तक पहुंच गया है। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाली करोड़ों जनता के लिए यह ताजी हवा किसी संजीवनी से कम नहीं है।
हवा की स्थिति में आया बड़ा सुधार
बुधवार को दिल्ली का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 59 था, जो गुरुवार को और सुधरकर 48 के स्तर पर आ गया। शुक्रवार को भी यह 65 दर्ज किया गया। इसी तरह की राहत नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम के निवासियों को भी मिली है। एयर क्वालिटी इंडेक्स के मानकों के अनुसार, 0 से 50 के बीच का AQI सबसे शुद्ध हवा माना जाता है। दिल्ली जैसे शहर में, जहां प्रदूषण का स्तर अक्सर 600 तक पहुंच जाता है, वहां AQI का 50 से नीचे जाना वास्तव में एक चमत्कार जैसा है।
कुदरत की मेहरबानी
यह जानना दिलचस्प है कि दिल्ली को आखिरी बार 10 सितंबर 2023 को 'अच्छी' हवा नसीब हुई थी। उस दौरान G-20 शिखर सम्मेलन की सुरक्षा और कड़े ट्रैफिक प्रतिबंधों के साथ भारी बारिश ने हवा को साफ किया था। हालांकि, इस बार का बदलाव बिल्कुल अलग है। इस बार कोई लॉकडाउन या सरकारी पाबंदियां नहीं हैं, फिर भी प्रकृति ने खुद को साफ कर लिया है।
क्लीन एयर के पीछे का विज्ञान
पिछले 50 घंटों से जारी इस स्वच्छता के पीछे एक सीधा वैज्ञानिक सिद्धांत काम कर रहा है जिसे 'वेट डिपोजिशन' या 'वॉशआउट इफेक्ट' कहा जाता है। जब बारिश की बूंदें आसमान से गिरती हैं, तो वे हवा में तैर रहे जहरीले कणों को अपने साथ नीचे ले आती हैं। इनमें PM 2.5, PM 10, धूल के कण और अन्य खतरनाक रसायन शामिल हैं। बारिश इन्हें सोखकर जमीन पर लाती है, जिससे हवा सांस लेने योग्य हो जाती है। इसके अलावा, लगातार नमी के कारण धूल के कण सड़क या निर्माण स्थलों से उड़ नहीं पाते, जिससे हवा की गुणवत्ता में और भी सुधार होता है।
विशेषज्ञों की राय
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की वैज्ञानिक अनुमिता रॉयचौधरी का कहना है कि यह सुधार दर्शाता है कि प्रकृति कितनी तेजी से खुद को रिफ्रेश कर सकती है। हालांकि, वे यह भी चेतावनी देती हैं कि हम केवल मौसम पर निर्भर रहकर स्थायी समाधान नहीं निकाल सकते। हमें प्रदूषण कम करने के लिए अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा।
पिछले 11 वर्षों का रिपोर्ट कार्ड
सेंट्रल पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड यानी CPCB के डेटा से पता चलता है कि पिछले 11 वर्षों में दिल्ली ने बहुत मुश्किल से हवा में सुधार देखा है। 2015 से अब तक केवल 15 दिन ही ऐसे रहे हैं जब हवा 'अच्छी' श्रेणी में दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि दिल्ली को साल में एक या दो दिन ही साफ हवा मिल पाती है। वर्ष 2015, 2016 और 2018 में तो एक भी दिन ऐसा नहीं था जब AQI 50 से नीचे गया हो। 2020 का वर्ष सबसे साफ रहा था, जिसमें 5 दिन AQI 50 से नीचे दर्ज हुआ, जिनमें से एक दिन लॉकडाउन का था। बाकी वर्षों में भी मानसून और कभी-कभार हुई भारी बारिश ही हवा को साफ करने का जरिया बनी है। सर्दियों में हवा भारी होने के कारण प्रदूषक कण जमीन के करीब जमा हो जाते हैं, जिससे स्थिति गैस चैंबर जैसी हो जाती है, जो मानसून की बारिश के विपरीत होता है।











