बिहार के रोहतास जिले में बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों पर लगाम लगाने की दिशा में एक बड़ा अदालती फैसला सामने आया है। जिला न्यायालय ने डालमियानगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गांव में नाबालिग मासूम बच्ची के साथ हुई हैवानियत और उसकी बेरहमी से हत्या के मामले में शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-7 श्री अरविन्द की अदालत ने इस भयानक वारदात को रेयरेस्ट ऑफ रेयर यानी दुर्लभतम श्रेणी का अपराध करार देते हुए एकमात्र दोषी बलिराम सिंह को मौत की सजा सुनाई है। इस सख्त कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ न्यायालय ने पीड़ित बच्ची की मां को तत्काल 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता राशि प्रदान करने का भी निर्देश जारी किया है।
11 गवाहों की गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्यों से साबित हुआ जुर्म
इस संवेदनशील मामले में कानून के शिकंजे को मजबूत करने के लिए अभियोजन पक्ष ने वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का सहारा लिया। विशेष लोक अभियोजक हीरा प्रताप सिंह ने बताया कि अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की तरफ से कुल 11 गवाहों को पेश किया गया, जिन्होंने पूरी सच्चाई अदालत के सामने रखी। इसके अतिरिक्त, पुलिस विभाग द्वारा जुटाए गए फॉरेंसिक सबूतों और तकनीकी साक्ष्यों को भी ठोस तरीके से न्यायपीठ के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अदालत ने गवाहों के बयानों, घटना के समय की परिस्थितियों और वैज्ञानिक प्रमाणों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद बलिराम सिंह को दोषी पाया और समाज में एक सख्त संदेश देने के उद्देश्य से उसे फांसी की सजा मुकर्रर की।
15 नवंबर 2020 को मासूम को बनाया गया था शिकार
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, यह दर्दनाक वारदात 15 नवंबर 2020 को डालमियानगर थाना क्षेत्र के एक गांव में घटित हुई थी। घटना वाले दिन दोषी बलिराम सिंह ने गांव की ही रहने वाली लगभग 10 साल की एक मासूम बच्ची को खिलौना देने का झांसा दिया। वह बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने घर के भीतर ले गया, जहां उसने मासूम के साथ दुष्कर्म जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम दिया। इसके बाद, जब आरोपी को यह डर सताने लगा कि उसकी पहचान उजागर हो जाएगी और वह पकड़ा जाएगा, तो उसने सबूत मिटाने और खुद को बचाने के लिए बच्ची की गला दबाकर हत्या कर दी। इस अमानवीय घटना के सामने आते ही पूरे इलाके के लोग आक्रोशित हो उठे थे।
काठ के बक्से में छुपाया गया था बच्ची का शव
मासूम बच्ची की जान लेने के बाद भी आरोपी के सिर से हैवानियत का साया नहीं उतरा था। अपने घिनौने अपराध पर पर्दा डालने के इरादे से उसने बच्ची के निष्प्राण शरीर को अपने घर के अंदर रखे एक बड़े काठ यानी लकड़ी के बक्से में बंद कर दिया। इसके बाद, वह खुद को निर्दोष दिखाने के लिए अपने घर में ताला लगाकर गांव के ही एक दूसरे ठिकाने पर जाकर छिप गया। उधर, काफी देर तक जब बच्ची घर नहीं लौटी, तो उसके माता-पिता और परिजनों ने उसकी खोजबीन शुरू कर दी, जिससे पूरे गांव में चिंता और अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
चश्मदीद के खुलासे के बाद पुलिस ने बरामद किया शव
पुलिस की शुरुआती तफ्तीश के दौरान गांव के एक चश्मदीद गवाह ने महत्वपूर्ण जानकारी दी। उसने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उसने घटना वाले दिन पीड़ित बच्ची को आरोपी बलिराम सिंह के साथ उसके घर की तरफ जाते हुए देखा था। इस पुख्ता सुराग के मिलते ही पुलिस की टीम ने तत्परता दिखाते हुए आरोपी के घर पर छापेमारी की। घर की सघन तलाशी के दौरान जब पुलिस ने वहां रखे काठ के बक्से को खोला, तो उसमें से मासूम बच्ची का शव बरामद हुआ। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को धर दबोचा और कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी और परिजनों का संतोष
अदालत ने अंतिम फैसला सुनाते समय अपराध की वीभत्सता, पीड़िता की बेहद कम उम्र और वारदात के बाद दोषी के आचरण को बेहद गंभीर माना। जज ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों के खिलाफ ऐसे अमानवीय कृत्य समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख देते हैं और ऐसे अपराधियों के लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इसलिए न्याय और कानून व्यवस्था पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए दोषी को मृत्युदंड देना अनिवार्य है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद रोहतास में पीड़ित परिवार ने अदालत के प्रति आभार जताया और कहा कि हालांकि उनकी बेटी कभी वापस नहीं आ सकती, लेकिन इस कठोर सजा से उन्हें न्याय मिलने का संबल मिला है, जिससे भविष्य में ऐसी हरकत करने वाले अपराधियों के मन में डर पैदा होगा।











