नई दिल्ली में वोटों की गिनती के दौरान मतदान की गोपनीयता और मतदाताओं की सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आयोजित की गई। इस याचिका का मुख्य उद्देश्य मतगणना प्रक्रिया में टोटलाइजर मशीनों के उपयोग को अनिवार्य करना है, जिससे किसी विशेष मतदान केंद्र के मतदान पैटर्न को पूरी तरह से गुप्त रखा जा सके। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रणाली के आने से यह पता नहीं चल पाएगा कि किस विशिष्ट पोलिंग बूथ पर किस उम्मीदवार को कितने मत मिले हैं।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि टोटलाइजर मशीनों के प्रयोग से मतदाताओं की पहचान उजागर होने का खतरा टल जाएगा, जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की संभावित प्रताड़ना से बचाया जा सकेगा। इस प्रकार की तकनीक से चुनाव प्रक्रिया में गोपनीयता और सुरक्षा के मानकों को और अधिक मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। वर्तमान कानूनी ढांचे में बदलाव की मांग को लेकर यह पूरा मामला अदालत के समक्ष आया है जिस पर गहन विचार-विमर्श जारी है।
चुनाव आयोग ने रखी अपनी दलीलें और कानूनी अड़चनें
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के समक्ष केंद्रीय चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि इन मशीनों को जमीनी स्तर पर लागू करने से पहले मौजूदा कानूनों में विधिवत संशोधन करना अनिवार्य होगा। आयोग ने इस प्रक्रिया से जुड़ी कई व्यावहारिक कठिनाइयों का भी हवाला दिया। चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने कोर्ट को बताया कि इन मशीनों के उपयोग के बाद उम्मीदवारों द्वारा डाले गए वोटों के क्रॉस-वेरिफिकेशन में गंभीर तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।
इसके साथ ही चुनाव आयोग ने अतीत में हुई सर्वदलीय बैठकों के आंकड़ों का भी जिक्र किया। आयोग ने बताया कि इससे पहले आयोजित हुई बैठक में लगभग 50 फीसदी राष्ट्रीय दलों और 68 फीसदी राज्य स्तरीय दलों ने टोटलाइजर मशीनों के प्रस्ताव के खिलाफ अपना रुख जताया था और इसका विरोध किया था।
पुराने आदेश और याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता योगेश गुप्ता की पैरवी करते हुए अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुनवाई के दौरान वर्ष 2018 के सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश का विशेष रूप से हवाला दिया। उन्होंने अदालत को याद दिलाया कि उस समयावधि में चुनाव आयोग ने खुद कोर्ट के सामने टोटलाइजर मशीनों को शुरू करने का समर्थन किया था और यह कहा था कि वोटों की गिनती के लिए इस प्रणाली को अपनाने का सही समय आ गया है।
मौजूदा कानूनी कार्यवाही के दौरान इन मशीनों को अपनाने में आ रही कानूनी बाधाओं, व्यावहारिक चुनौतियों और मतदाताओं के संरक्षण से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जा रही है। अदालत इस मामले में सभी पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद आगे की दिशा तय करेगी।



















