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नरेंद्र मोदी की पुतिन और पेजेशकियान से अहम मुलाकात, 7.8% जीडीपी ग्रोथ और मोहन भागवत के बयान पर सियासी संग्रामभारत
1 सित॰ 2026, 4:34 pm (48 मिनट पहले)· 2

नरेंद्र मोदी की पुतिन और पेजेशकियान से अहम मुलाकात, 7.8% जीडीपी ग्रोथ और मोहन भागवत के बयान पर सियासी संग्राम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अंतहीन युद्ध खत्म करने की अपील की, जबकि देश की पहली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इसके अलावा मोहन भागवत के बयानों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नए अभियान पर भी राजनीतिक हलचल तेज है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अपनी बातचीत के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब अनवरत संघर्षों का दौर समाप्त होना चाहिए और दुनिया को शांति की राह पर आगे कदम बढ़ाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी की पावन भूमि भारत का यही चिरकाल से संदेश रहा है कि वैश्विक पटल पर अमन कायम हो, क्योंकि युद्ध के मैदानों में तबाही और बर्बादी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता। रूसी नेता से मिलने से ठीक पहले नरेंद्र मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से भी द्विपक्षीय चर्चा हुई थी। इस दौरान ईरानी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि यदि भारत पहल करे तो मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति बहाली संभव हो सकती है, क्योंकि वैश्विक महाशक्तियां और यूरोपीय देश भारत के दृष्टिकोण को गंभीरता से सुनते हैं। उनका सुझाव था कि भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से संवाद करना चाहिए और क्षेत्र में सैन्य हमलों को रोकने के लिए अपनी बात रखनी चाहिए।

वैश्विक संघर्ष और कूटनीति के मोर्चे पर भारत की भूमिका

नरेंद्र मोदी ने रूसी समकक्ष के समक्ष जो विचार रखे, वे आज संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मुख्य आवश्यकता बन चुके हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे सैन्य टकराव ने यूरोपीय महाद्वीप की आर्थिकी को गहरे संकट में डाल दिया है, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच सुलग रही जंग की आंच से पृथ्वी का शायद ही कोई कोना बचा होगा। दोनों ही विवाद बिना किसी ठोस तार्किक आधार के आरम्भ हुए और अब थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। एक तरफ व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की एक ही मेज पर बैठकर चर्चा करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं, तो दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप भी हरसंभव तरीके से ईरान को कड़ा सबक सिखाने पर अड़े हुए हैं। ऐसे नाज़ुक मोर्चे पर एक तटस्थ और स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करने वाला भारत एक अत्यंत निर्णायक और बड़ी कूटनीतिज्ञ भूमिका का निर्वहन कर सकता है। भारत ने सदैव वसुधैव कुटुंबकम और शांति का पैगाम दिया है, भले ही आज के इस दौर में शांति की आवाज को सुनने और समझने वाले राष्ट्रों की संख्या में कुछ कमी आई हो। आगामी कुछ हफ्तों के भीतर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भारत की आधिकारिक यात्रा पर आने वाले हैं। यदि नरेंद्र मोदी अपने कूटनीतिक कौशल से डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की नीतियों को थोड़ा भी प्रभावित करने में सफल रहते हैं, तो संपूर्ण विश्व को एक बड़ी राहत मिल सकती है, क्योंकि वर्तमान संघर्षों से पूरी मानवता त्रस्त हो चुकी है और हर कोई अमन-चैन के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है।

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भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और जीडीपी के शानदार आंकड़े

देश के आर्थिक मोर्चे से बेहद उत्साहजनक और सकारात्मक खबरें सामने आई हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP की वृद्धि दर शानदार 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार भारतीय रिजर्व बैंक के तमाम अनुमानों और संभावनाओं से कहीं अधिक बेहतर साबित हुई है। इस मजबूत जीडीपी ग्रोथ के बूते पर भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का ताज अपने नाम कर चुका है। दुनिया भर की तमाम अनिश्चितताओं और आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत की यह विकास दर देखकर बड़े-बड़े विकसित राष्ट्र भी चकित रह गए हैं। देश के वित्तीय सेवा क्षेत्र, रियल एस्टेट, आईटी और पेशेवर सेवाओं यानी प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे सेक्टर्स में वृद्धि दर 12 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गई है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी पेट्रोल और डीजल के दामों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर आर्थिक पहियों पर पड़ता है, जिससे महंगाई बेलगाम होने लगती है। परंतु इस बार न तो घरेलू औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और न ही महंगाई का ग्राफ नियंत्रण से बाहर हुआ।

राजनीतिक बयानबाजी और आर्थिक मोर्चे पर आलोचकों को करारा जवाब

विपक्षी खेमे से कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी लगातार यह दावा करते आ रहे थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी है और केंद्र सरकार ने इसे समाप्त कर दिया है। पहली तिमाही के ये ताज़ा 7.8 प्रतिशत के आंकड़े उन सभी तीखी आलोचनाओं और बयानों का सबसे करारा और तथ्यात्मक जवाब बनकर उभरे हैं। खास बात यह है कि यह शानदार आर्थिक वृद्धि ऐसे समय में हासिल की गई है जब दो भीषण युद्धों के कारण पूरी दुनिया आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, होर्मुज जलडमरूमध्य के मार्ग बाधित हैं, ईंधन की आपूर्ति को लेकर गंभीर संकट खड़े हैं और वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमराई हुई है। इन विषम परिस्थितियों के बीच यदि देश की विकास दर 7.8 प्रतिशत की ऊंचाई को छू रही है, तो यह अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। जो लोग इस उम्मीद में बैठे थे कि भारत की अर्थव्यवस्था रसातल में चली जाएगी और उन्हें इसका सीधा राजनीतिक लाभ मिलेगा, उन्हें इन आंकड़ों ने भारी निराशा के गर्त में धकेल दिया है।

मोहन भागवत के बयानों पर छिड़ी राष्ट्रीय बहस और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

कनाडा के शहर टोरंटो में आयोजित एक भव्य "हिंदू विश्व-बंधु" सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण विचार रखा कि यदि हिंदू समाज अपनी शक्ति और चेतना से जागेगा तो पूरी दुनिया में सकारात्मक जागरण होगा, क्योंकि सनातन संस्कृति हमेशा से सबको साथ लेकर चलने और संपूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानने में विश्वास रखती है। संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में आगे कहा कि विविधता में एकता ही भारत के मूल डीएनए का अभिन्न हिस्सा है, जहां विभिन्न धर्मों को मानने वाले और हजारों भाषाएं बोलने वाले लोग रहते हैं और इतनी भारी सामाजिक बहुरूपता के बावजूद देश एक सूत्र में बंधा है। हालांकि, संघ प्रमुख के ये विचार देश के विपक्षी दलों के कई नेताओं को बिल्कुल रास नहीं आए। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोहन भागवत विदेशी धरती पर केवल दुनिया को दिखाने के लिए मीठी-मीठी बातें कर रहे हैं, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है और मुसलमानों के प्रति घृणा की भावना संघ के मूल स्वभाव में रची-बसी है। इसी कड़ी में कांग्रेस पार्टी के सांसद इमरान मसूद ने भी अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि संघ प्रमुख को विदेश में जाकर उपदेश देने के बजाय अपनी ही पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को समझाना चाहिए, क्योंकि भाजपा के कई मुख्यमंत्री समुदाय विशेष के लोगों पर निशाना साधते हैं और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं।

संघ के रुख पर असमंजस और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का नया आंदोलन

अमेरिका के न्यूयॉर्क और कनाडा के टोरंटो में अल्पसंख्यकों के संदर्भ में मोहन भागवत ने जो बातें रखीं, उन्होंने संघ के धुर विरोधियों को भी गहरी सोच में डाल दिया है। जो राजनीतिक दल और नेता हमेशा यह आरोप लगाते आए थे कि संघ प्रमुख केवल कट्टरता और हिंदू राष्ट्र की बातें करेंगे, मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाएंगे और समाज का ध्रुवीकरण करेंगे, वे इस नए दृष्टिकोण को देखकर हक्के-बक्के रह गए। जब मोहन भागवत ने टोरंटो के मंच से यह बात दोहराई कि हिंदू समुदाय सबको साथ लेकर आगे बढ़ता है, और जब उन्होंने न्यूयॉर्क में यह स्पष्ट किया कि यदि कोई भी हिंदू यह विचार रखता है कि भारत की सरज़मीं पर मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, तो वह सच्चा हिंदू कहलाने का अधिकारी नहीं है, तब से मुस्लिम सियासतदानों के सामने यह असमंजस की स्थिति बन गई है कि उनके इस वैचारिक रुख का मुकाबला कैसे किया जाए। हालांकि इसके बावजूद असदुद्दीन ओवैसी का तर्क है कि संघ प्रमुख विदेशों में उदारवादी छवि प्रस्तुत करते हैं और देश के भीतर इसके विपरीत नीतियां चलाई जाती हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि आलोचक यह भूल जाते हैं कि संघ प्रमुख ने भारत की धरती पर ही यह बात कही थी कि देश के हिंदुओं को हर मस्जिद के भीतर शिवलिंग खोजने की आदत नहीं डालनी चाहिए। इन तमाम वैचारिक बहसों के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने आगामी 17 सितंबर से पूरे देश भर में "सेव इंडिया, सेव शरिया" नाम से एक राष्ट्रव्यापी अभियान का शंखनाद करने की औपचारिक घोषणा कर दी है। बोर्ड का तर्क है कि भाजपा शासित राज्यों में एक समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code को जबरन लागू किया जा रहा है और अल्पसंख्यकों को वंदे मातरम गाने के लिए विवश किया जा रहा है, जबकि इस्लामिक शरीयत इसकी अनुमति नहीं देती।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपत्तियां और आगामी राजनीतिक समीकरण

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के समक्ष कई प्रकार की शिकायतें और चिंताएं हैं। वह एक तरफ जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे राष्ट्रगीत गाने से बचने, वक्फ कानून में किए जा रहे संशोधनों को खारिज करने की मांग उठा रहे हैं। हालांकि इन तमाम शिकायतों को जनता के सामने अलग-अलग बयानों और तरीकों से रखा जा रहा है। बोर्ड के प्रतिनिधियों का यह कहना है कि उनकी मस्जिदों को छीना जा रहा है और सरकार मुसलमानों के निकाह तथा नमाज अदा करने जैसे धार्मिक स्वतंत्रताओं के अधिकारों को कुचलना चाहती है, जिसके चलते इन तमाम मुद्दों को आधार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। ठीक इसी प्रकार का परिदृश्य नागरिक संशोधन अधिनियम यानी CAA के नाम पर चले विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी देखने को मिला था, जहां आंदोलनकारियों के हाथों में भारतीय संविधान और तिरंगा झंडा दिखाई दिया था। इस बार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सीधे तौर पर "सेव इंडिया, सेव शरिया" का एक नया और आक्रामक नारा गढ़ा है। इस प्रस्तावित राजनीतिक आंदोलन का सबसे पहला और स्पष्ट प्रभाव यह होगा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत राजनीतिक मुद्दा और वैचारिक मसाला आसानी से मिल जाएगा। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल जो खुद को धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हैं, वे खुलकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस अभियान का समर्थन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे, क्योंकि उन्हें बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं की नाराजगी का गहरा भय सताता रहेगा। इस पूरी राजनीतिक परिस्थिति का सबसे अधिक चुनावी फायदा उठाने की जुगत में असदुद्दीन ओवैसी पूरी तरह जुटे नजर आ रहे हैं।

सवाल-जवाब

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ कितनी रही?
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्लादिमीर पुतिन से क्या अपील की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा कि अंतहीन युद्धों का दौर समाप्त होना चाहिए और दुनिया को शांति की तरफ बढ़ना चाहिए।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने मोदी से क्या अनुरोध किया था?
मसूद पेजेशकियान ने अनुरोध किया कि भारत मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने में मदद करे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात करे।
मोहन भागवत ने 'हिंदू विश्व-बंधु' सम्मेलन में क्या कहा था?
मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में कहा कि यदि हिंदू समाज जागेगा तो दुनिया जागेगी क्योंकि हिंदू संस्कृति सबको साथ लेकर चलती है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कौन सा नया अभियान शुरू करने की घोषणा की है?
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 17 सितंबर से पूरे देश में 'सेव इंडिया, सेव शरिया' कैंपेन चलाने का ऐलान किया है।
राहुल गांधी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर क्या बयान दिया था?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत हो चुकी है और मोदी ने इसे समाप्त कर दिया है।
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