उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की राजनीति में मतदाता सूची को लेकर घमासान छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी लगातार इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपना रही है और पार्टी के शीर्ष नेताओं के बाद अब सांसद डिंपल यादव ने भी निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कड़े तेवर दिखाए हैं। मैनपुरी में मीडिया से बातचीत करते हुए डिंपल यादव ने कहा कि मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सामने आई अनियमितताओं से उनके पुराने दावे सच साबित हुए हैं और पार्टी इस गंभीर मामले पर बिल्कुल चुप नहीं बैठने वाली है।
पुराने चुनावों के आरोपों पर नया बवंडर
मैनपुरी में संवाददाताओं के सवालों के जवाब देते हुए डिंपल यादव ने साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी की ओर से तब से यह लगातार कहा जा रहा था कि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है और सुनियोजित तरीके से सपा समर्थकों के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं। उनका कहना था कि हाल ही में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट्स सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर जो सवाल उठ रहे थे, वे अब पूरी तरह से पुख्ता हो चुके हैं।
हलफनामों पर चुप्पी का उठाया मुद्दा
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए डिंपल यादव ने पिछले चुनावों के दौरान पार्टी द्वारा उठाए गए कदमों की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि साल 2022 के चुनावों के वक्त निर्वाचन आयोग ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को एक नोटिस भेजा था और हलफनामे जमा करने के निर्देश दिए थे। पार्टी ने उस समय पूरी जिम्मेदारी निभाते हुए लगभग 4,000 मतदाताओं के हलफनामे निर्वाचन आयोग को सौंपे थे। लेकिन इसके बावजूद आयोग की तरफ से ईमेल या किसी अन्य आधिकारिक माध्यम से कोई प्रतिक्रिया या अनुवर्ती कार्रवाई नहीं की गई, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध नजर आती है।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग
विशेष सघन पुनरीक्षण प्रक्रिया में उजागर हुई गड़बड़ियों की तरफ इशारा करते हुए सपा सांसद ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस पूरे प्रकरण के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ-साथ पूरी निर्वाचन आयोग की टीम और इस धांधली को अंजाम देने वाले प्रशासनिक अधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। लोकतंत्र की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करने वाले इन सभी लापरवाह और दोषी लोगों के खिलाफ सबसे कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो सके।
साल 2027 के रण के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार
उत्तर प्रदेश में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच वोटर लिस्ट का यह विवाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बाहर आने के बाद समाजवादी पार्टी को सत्तारूढ़ दल और चुनाव आयोग दोनों को घेरने का एक बड़ा राजनीतिक मौका हाथ लग गया है। अखिलेश यादव के बाद अब डिंपल यादव के मैदान में उतरने से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़क से लेकर संसद और अदालतों तक इसकी गूंज सुनाई देगी।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग
डिंपल यादव के इन तीखे बयानों से राज्य का सियासी पारा काफी चढ़ गया है। समाजवादी पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची के हर एक नाम का जमीनी स्तर पर दोबारा सत्यापन हो और पूरी प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी ने डिंपल यादव के इन तमाम आरोपों को पूरी तरह से बेतुका करार दिया है। भाजपा का यह तर्क है कि साल 2022 में समाजवादी पार्टी निर्वाचन आयोग के सामने अपने दावों को साबित करने में विफल रही थी और अब केवल राजनीतिक लाभ के लिए अनावश्यक विवाद खड़ा कर रही है। भाजपा का दावा है कि आगामी चुनावों में जनता एक बार फिर वही परिणाम दोहराएगी और सपा को सत्ता से दूर रखेगी।



















