बिहार के भोजपुर जिले में स्थित आरा के शोभी डुमरा गांव के दो युवा मित्रों ने परंपरागत तरीके को आधुनिक उद्यमिता से जोड़कर एक नई मिसाल पेश की है. रंजन और अक्षय ने किसी निजी कंपनी में नौकरी तलाशने अथवा पुश्तैनी कामधंधे में हाथ बंटाने के बजाय अपनी मेहनत से कुछ नया करने का संकल्प लिया. दोनों ने स्वाद और सेहत के संगम को ध्यान में रखते हुए अपना मसाला उद्योग स्थापित करने का फैसला किया. उनके इस प्रयास को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की युवा उद्यमी योजना से जरूरी आर्थिक सहारा मिला, जिससे उन्होंने 'सास बहू मसाला' नाम से अपने ब्रांड की नींव रखी. आज यह उद्यम अपनी विशिष्ट उत्पादन शैली और शुद्धता के चलते स्थानीय बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.
पारंपरिक कुटाई और भारी हथौड़े की तकनीक
बाजार में उपलब्ध अधिकांश मसालों को आधुनिक ग्राइंडर मशीनों में तीव्र गति से पीसा जाता है, जिससे अत्यधिक गर्मी पैदा होती है और मसालों के प्राकृतिक तेल व पोषक तत्व प्रभावित हो सकते हैं. इसके विपरीत, इस उद्यम में मसालों को केवल सामान्य मशीनों में महीन पीसने के बजाय पारंपरिक कुटाई पद्धति से तैयार किया जाता है. इस प्रक्रिया के लिए विशेष कुटाई मशीनों को स्थापित किया गया है, जिनमें भारी वजन वाले हथौड़े गिरकर साबुत मसालों को धीरे-धीरे कूटते हैं. इसके पश्चात उन्हें बारीक पाउडर का रूप दिया जाता है. इस देसी विधि से मसालों की स्वाभाविक सुगंध, पोषक गुणवत्ता और मूल स्वाद पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं.
कम मात्रा में भरपूर स्वाद का दावा
संस्थापकों का स्पष्ट कहना है कि नियमित रूप से बाजार में बिकने वाले आम पैकेटबंद मसालों के मुकाबले यह उत्पाद कम मात्रा में इस्तेमाल करने पर भी खाने को अधिक लजीज बना देता है. धीमी और भारी कुटाई के कारण मसालों का प्राकृतिक स्वरूप नहीं बदलता, जिससे व्यंजनों में स्वाद और सुगंध दोनों गहराई से उभरते हैं. कम मात्रा, बेहतर स्वाद और शुद्ध देसी कुटाई ही आज इस ब्रांड की मुख्य यूएसपी बन चुकी है. दोनों सहयोगियों का दावा है कि जो ग्राहक एक बार इस देसी पद्धति से तैयार मसाले का स्वाद चख लेता है, वह किसी अन्य कंपनी के पैकेटबंद मसाले का रुख नहीं करता.
35 लाख की लागत से 1 करोड़ से अधिक का टर्नओवर
इस पूरे उद्यम को धरातल पर उतारने में कुल 35 लाख रुपये का शुरुआती निवेश हुआ था. निरंतर लगन और गुणवत्ता के दम पर आज इस कारोबार का सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा के आंकड़े को पार कर चुका है. उत्पादन का केंद्र भले ही शोभी डुमरा गांव हो, लेकिन अब इसकी आपूर्ति केवल भोजपुर जिले तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बिहार के कई अन्य प्रमुख जिलों में भी इनके उत्पाद नियमित तौर पर भेजे जा रहे हैं. दोनों युवाओं की यह उपलब्धि यह दर्शाती है कि अपनी मिट्टी की पुरानी परंपराओं को सही तकनीक से जोड़कर ग्रामीण स्तर पर भी करोड़ों का सफल उद्यम खड़ा किया जा सकता है.



















