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नवाब मीर कासिम ने बनवाई थी ऐसी गुफा, जिसका आधा राज़ आज भी अनसुलझा हैयात्रा
2 घंटे पहले· 3

नवाब मीर कासिम ने बनवाई थी ऐसी गुफा, जिसका आधा राज़ आज भी अनसुलझा है

बिहार के मुंगेर स्थित श्रीकृष्ण वाटिका में मौजूद नवाब मीर कासिम की करीब 250 साल पुरानी गुफा का एक छोर आज तक नहीं मिल पाया है, जिसने इसे एक बड़ा ऐतिहासिक रहस्य बना दिया है।

काव्या नायरकाव्या नायरट्रैवल एडिटर 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बिहार के मुंगेर शहर में श्रीकृष्ण वाटिका के अंदर एक ऐसी गुफा छिपी है, जिसकी कहानी करीब 250 साल पुरानी है और आज भी लोगों की जिज्ञासा जगाती है। यह जगह नवाब मीर कासिम के दौर की गवाह मानी जाती है और इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है।

आधी सुरंग का रहस्य आज भी अनसुलझा

इस गुफा की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका एक सिरा आज भी मुंगेर में मौजूद है, लेकिन दूसरा सिरा कहां जाकर खुलता था, इसका कोई पक्का जवाब किसी के पास नहीं है। बरसों से लोग इस सुरंग के दूसरे छोर को लेकर तरह-तरह की बातें करते आए हैं, मगर कोई ठोस प्रमाण अब तक सामने नहीं आया। यही अनसुलझा सवाल इस जगह को और रहस्यमयी बना देता है और शायद यही वजह है कि यह आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती है।

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1760 में मीर कासिम ने क्यों बनवाई थी यह सुरंग

इतिहासकारों के मुताबिक यह गुप्त सुरंगनुमा गुफा साल 1760 में नवाब मीर कासिम के आदेश पर बनाई गई थी। उस दौर में अंग्रेजों के हमलों का खतरा लगातार बना रहता था, इसलिए मीर कासिम को सुरक्षित तरीके से आना-जाना करने के लिए एक गुप्त रास्ते की जरूरत थी। यही वजह थी कि उन्होंने इस सुरंग का निर्माण करवाया, ताकि जरूरत पड़ने पर बिना किसी की नजर में आए वे एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकें।

मुर्शिदाबाद से मुंगेर पहुंची थी बंगाल की राजधानी

मीर कासिम ने सिर्फ यह सुरंग ही नहीं बनवाई, बल्कि उन्होंने बंगाल की राजधानी को मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर ला दिया था। 1760 से लेकर 1764 तक के इस दौर में उन्होंने मुंगेर शहर को एक मजबूत किले के तौर पर विकसित किया। आज भी शहर में मौजूद विशाल दरवाजे और किले की दीवारें उसी दौर की याद दिलाती हैं और बताती हैं कि उस समय यह इलाका कितना रणनीतिक रूप से अहम रहा होगा।

श्रीकृष्ण वाटिका में इतिहास, विरासत और प्रकृति साथ-साथ

इस ऐतिहासिक गुफा को संभालकर रखने के लिए प्रशासन ने इसके चारों तरफ श्रीकृष्ण वाटिका बनवाई है। यहां घूमने आने वाले लोग एक ही जगह पर इतिहास, विरासत और हरियाली, तीनों का अनुभव एक साथ कर सकते हैं। इसी परिसर में मीर कासिम के बेटे प्रिंस बहार और बेटी राजकुमारी गुल का मकबरा भी बना हुआ है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अंग्रेजों से बचते-बचाते इन दोनों की मौत हो गई थी, जिसके बाद उन्हें यहीं दफनाया गया।

पहचान बनने का इंतजार कर रहा है यह हेरिटेज स्पॉट

देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसी ऐतिहासिक जगहें पर्यटन की बड़ी पहचान बन चुकी हैं। मीर कासिम की यह गुफा भी बिहार के एक बड़े हेरिटेज पर्यटन स्थल के तौर पर उभरने की पूरी क्षमता रखती है। यहां घूमने के लिए किसी तरह का प्रवेश शुल्क भी नहीं लिया जाता, इसके बावजूद प्रचार-प्रसार की कमी और रखरखाव ठीक न होने के चलते यहां पर्यटकों की संख्या अपेक्षाकृत कम ही रहती है। अगर इस धरोहर की सही तरीके से देखभाल और सजावट की जाए, तो यह सिर्फ मुंगेर ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के पर्यटन नक्शे पर एक नई और मजबूत पहचान बना सकती है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: इस तरह की अनदेखी ऐतिहासिक धरोहरें दिखाती हैं कि देश में हेरिटेज पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अभी भी काफी काम बाकी है।
  • मुंगेर, बिहार में: अगर प्रशासन गुफा और श्रीकृष्ण वाटिका का बेहतर प्रचार करे और रखरखाव सुधारे, तो स्थानीय लोगों के लिए पर्यटन से जुड़ी कमाई और रोजगार के नए मौके बन सकते हैं।

सवाल-जवाब

मीर कासिम की गुफा कहां स्थित है?
यह गुफा बिहार के मुंगेर स्थित श्रीकृष्ण वाटिका के भीतर मौजूद है।
यह गुफा कितनी पुरानी है?
यह गुफा करीब 250 साल पुरानी है और इसे 1760 में बनवाया गया था।
यह गुफा किसने और क्यों बनवाई थी?
नवाब मीर कासिम ने अंग्रेजों के हमलों से बचने और सुरक्षित आवाजाही के लिए इस गुप्त सुरंगनुमा गुफा का निर्माण करवाया था।
गुफा के दूसरे छोर को लेकर क्या रहस्य है?
गुफा का एक छोर मुंगेर में मौजूद है, लेकिन दूसरा छोर कहां निकलता था, इसका आज तक कोई प्रमाणित जवाब नहीं मिल पाया है।
श्रीकृष्ण वाटिका परिसर में और क्या देखने को मिलता है?
यहां मीर कासिम के बेटे प्रिंस बहार और बेटी राजकुमारी गुल का मकबरा भी मौजूद है, जिनकी मृत्यु स्थानीय मान्यता के अनुसार अंग्रेजों से बचने के दौरान हुई थी।
क्या यहां घूमने के लिए टिकट लगता है?
नहीं, प्रवेश निःशुल्क है, लेकिन प्रचार-प्रसार और रखरखाव की कमी के कारण यहां पर्यटकों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है।
काव्या नायर
लेखक के बारे मेंकाव्या नायरट्रैवल एडिटर देहरादून
विशेषज्ञताट्रैवल लेखन, पर्यटन, डेस्टिनेशन गाइड, संस्कृति, लाइफस्टाइल ट्रैवल, होटल, एडवेंचर ट्रैवल, फूड एवं ट्रैवल, वैश्विक पर्यटन रुझान

काव्या नायर एक ट्रैवल लेखिका हैं जो पर्यटन स्थलों, ट्रैवल गाइड, पर्यटन रुझानों, संस्कृति और लाइफस्टाइल अनुभवों को कवर करती हैं। वे दुनियाभर के यात्रियों के लिए दिलचस्प कहानियाँ और व्यावहारिक जानकारी साझा करती हैं।

काव्या नायर एक ट्रैवल लेखिका हैं जो पर्यटन स्थलों की कवरेज, ट्रैवल फ़ीचर, सांस्कृतिक खोज और ट्रैवल लाइफस्टाइल पत्रकारिता में विशेषज्ञता रखती हैं। वे लोकप्रिय व उभरते पर्यटन स्थलों, ट्रैवल गाइड, होटल व आतिथ्य अनुभवों, स्थानीय संस्कृतियों, खानपान परंपराओं और एडवेंचर टूरिज़्म के बारे में लिखती हैं। प्रेरक और जानकारीपूर्ण कहानी कहने पर ज़ोर देते हुए काव्या पाठकों को नई जगहें खोजने और सार्थक यात्रा अनुभव योजना बनाने में मदद करती हैं। उनका काम वैश्विक पर्यटन रुझानों, बजट व लक्ज़री ट्रैवल की अंतर्दृष्टि और पाठकों को दुनियाभर की जगहों से जोड़ने वाली सांस्कृतिक कहानियों को उजागर करता है।

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