घर में दूसरे बच्चे का आगमन हर परिवार के लिए बेहद खास और उल्लास से भरा पल होता है। परिवार का दायरा बढ़ते ही खुशियों के साथ-साथ माता-पिता की जिम्मेदारियां और घर की रोजमर्रा की दिनचर्या भी तेजी से बदलती है। इस नए बदलाव का सबसे बड़ा प्रभाव अक्सर घर के बड़े बच्चे पर पड़ता है, जिसके लिए अचानक सब कुछ बदला हुआ नजर आने लगता है। जो माता-पिता अब तक अपना पूरा वक्त, ऊर्जा और प्यार सिर्फ उसी पर समर्पित करते थे, उनका बड़ा हिस्सा अब छोटे बच्चे की सार-संभाल में बीतने लगता है। ऐसी स्थिति में बड़े बच्चे के मन में अनजाने ही असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है कि क्या माता-पिता का प्यार उसके प्रति पहले जैसा ही रहेगा।
यही कारण है कि दूसरे बच्चे के आने के बाद केवल नवजात शिशु की देखभाल पर ही ध्यान केंद्रित करना काफी नहीं होता, बल्कि दोनों भाई-बहनों के बीच भावनात्मक तालमेल स्थापित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि माता-पिता शुरुआत से ही दोनों बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को समझते हुए संतुलित कदम उठाएं, तो परिवार का माहौल हमेशा सहज, सकारात्मक और प्यार से भरा बना रह सकता है।
बड़े बच्चे को दिलाएं उसकी खास अहमियत का निरंतर एहसास
घर में नवजात के आने के बाद स्वाभाविक तौर पर माता-पिता का अधिकांश समय उसकी निरंतर देखभाल में चला जाता है। नवजात को समय पर दूध पिलाना, सुलाना, कपड़े बदलना और उसकी नींद और सेहत का ख्याल रखना दैनिक जीवन का प्रमुख हिस्सा बन जाता है। इस व्यस्तता के बीच बड़े बच्चे को यह महसूस हो सकता है कि अब घर में उसकी अहमियत पहले जितनी नहीं रही।
ऐसे नाजुक समय में बच्चे को शब्दों और व्यवहार दोनों से यह भरोसा दिलाना बेहद आवश्यक है कि छोटा भाई या बहन आने के बाद भी परिवार में उसकी जगह उतनी ही अनमोल है। इसके लिए माता-पिता को रोजाना कुछ समय विशेष रूप से केवल बड़े बच्चे के लिए निर्धारित करना चाहिए। यह समय बहुत लंबा होना जरूरी नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए। उसके साथ बैठकर बातें करना, कोई पसंदीदा कहानी पढ़ना, साथ में खेलना या शांति से बैठकर खाना खाना भी उसे माता-पिता के करीब बनाए रखता है और उसके भीतर किसी भी तरह का अकेलापन नहीं आने देता।
जिम्मेदारी का बोझ लादने से बचें
कई बार परिवार के सदस्य अनजाने में बड़े बच्चे से यह कहने लगते हैं कि अब वह बड़ा भाई या बड़ी बहन बन चुका है, इसलिए उसे छोटे बच्चे की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। बड़े बच्चे को प्यार से छोटी-मोटी गतिविधियों में शामिल करना तो ठीक है, लेकिन उस पर देखभाल का दबाव बनाना बिल्कुल सही दृष्टिकोण नहीं है।
उदाहरण के तौर पर, माता-पिता उसे डायपर लाने, छोटे बच्चे के कपड़े चुनने या उसके पास खिलौना रखने जैसे आसान कामों में हाथ बंटाने के लिए कह सकते हैं। हालांकि, यदि उसका मन उस समय किसी काम में मदद करने का न हो, तो उस पर जबरदस्ती करने के बजाय उसकी पसंद और अनिच्छा का सम्मान करना चाहिए। जब बड़े बच्चे पर कोई दबाव नहीं होता, तब नवजात के प्रति उसका स्वाभाविक स्नेह और अपनापन धीरे-धीरे खुद ही विकसित होने लगता है।
दोनों बच्चों के बीच तुलना करने की गलती बिल्कुल न करें
दो बच्चों के बीच तुलना करना उनके आपसी रिश्ते में अनावश्यक कड़वाहट और दबाव पैदा कर सकता है। बड़े बच्चे से यह कहना कि नवजात कितना शांत रहता है या छोटे बच्चे से यह उम्मीद करना कि वह बड़े की तरह व्यवहार करे, दोनों के विकास के लिए हानिकारक साबित होता है।
प्रत्येक बच्चे का अपना अनूठा स्वभाव, व्यक्तित्व और अलग जरूरतें होती हैं। माता-पिता यदि दोनों बच्चों की व्यक्तिगत खूबियों और विशेषताओं को पहचानें और उन्हें स्वीकार करें, तो घर में आपसी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बड़े बच्चे की पढ़ाई, खेलकूद या किसी भी छोटी उपलब्धि की सराहना हमेशा स्वतंत्र रूप से की जानी चाहिए, उसमें कभी भी छोटे भाई या बहन का जिक्र या तुलना शामिल नहीं होनी चाहिए।
साझा गतिविधियों से मजबूत करें आपसी लगाव
बच्चों की उम्र में अंतर होने के बावजूद ऐसी कई सामान्य गतिविधियां चुनी जा सकती हैं, जिनमें दोनों बच्चे एक साथ हिस्सा ले सकें। उदाहरण के लिए, बड़ा बच्चा अपने छोटे भाई या बहन को चित्र वाली किताब दिखा सकता है, उसे हल्की लोरी या गाना सुना सकता है, अथवा माता-पिता की निगरानी में उसके साथ थोड़ी देर खिलौनों से खेल सकता है।
शुरुआती दिनों में यदि दोनों के बीच बहुत गहरा लगाव या दोस्ती नजर न आए, तो माता-पिता को घबराने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। भाई-बहन का अटूट बंधन रातोंरात नहीं बनता, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे आकार लेता है। दैनिक जीवन के छोटे-छोटे अनुभव और साझा पल ही आगे चलकर उनके रिश्ते की मजबूत नींव तैयार करते हैं।
समान प्यार लेकिन देखभाल का अलग तरीका
माता-पिता के लिए यह समझना जरूरी है कि दोनों बच्चों को हर समय बिल्कुल एक जैसा वक्त या एक जैसी चीजें देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। छोटे बच्चे को उसकी उम्र और निर्भरता के कारण अधिक शारीरिक देखभाल और निगरानी की जरूरत होती है। दूसरी ओर, बड़ा बच्चा माता-पिता से खुली बातचीत, भावनात्मक जुड़ाव, खेलकूद और व्यक्तिगत ध्यान की अपेक्षा रखता है। प्यार दोनों के लिए बराबर होना चाहिए, लेकिन उसे व्यक्त करने और देखभाल करने का तरीका दोनों की जरूरतों के अनुसार अलग हो सकता है।



















