डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर किया बड़ा पोस्ट, कहा- काम पूरा करना हैसर्दियों में गर्म पानी से नहाना पड़ सकता है भारी, रूखी और बेजान हो सकती है स्किनलाहौर में शादाब खान और हारिस रऊफ के चमत्कार से पाकिस्तान ने इंग्लैंड को हराया, तोड़ा 51 साल पुराना रिकॉर्डनया साल शुरू होने का इंतजार क्यों? फिटनेस की शुरुआत के लिए दिसंबर सबसे सही समयआयुष्मान खुराना को जब करण जौहर ने दिखाया था बाहर का रास्ता, स्ट्रगल के दिनों का अनसुना किस्सापेंटागन ने बनाया फोर्ट्रेस प्लान, युद्ध छिड़ने पर 90 दिन तक खुद चलेंगे अमेरिकी सैन्य अड्डेसंसद हमले के दोषी अफजल गुरु पर हामिद अंसारी की टिप्पणी से फिर गरमाई कानूनी और सियासी बहसआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में जर्मनी ने ढीले किए पर्यावरण नियम, डेटा सेंटरों के लिए कचरा गर्मी का दोबारा इस्तेमाल अब अनिवार्य नहींबॉम्बे हाईकोर्ट में इमरान खान के नोटिस पर सुनवाई, क्या देश छोड़ना होगा या मिलेगी कानूनी राहतलता-आशा के भाई हृदयनाथ मंगेशकर: भगवद्गीता के श्लोकों को रागों में ढालकर बनाई खास पहचान
दूसरा रिव्यू (2026): क्रिकेट इतिहास और व्यक्तिगत संघर्ष को जोड़ने का एक अनूठा लेकिन अधूरा सिनेमाई प्रयोगमूवी रिव्यू
26 अक्तू॰ 2026, 6:12 am (5 मिनट पहले)· 0

दूसरा रिव्यू (2026): क्रिकेट इतिहास और व्यक्तिगत संघर्ष को जोड़ने का एक अनूठा लेकिन अधूरा सिनेमाई प्रयोग

अभिनय देव द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दूसरा’ 1990 के दशक के क्रिकेट इतिहास और एक ग्रामीण लड़की के संघर्ष को जोड़ती है, लेकिन यह प्रयोग पूरी तरह असरदार साबित नहीं होता।

अभिनय देव के निर्देशन में बनी फिल्म ‘दूसरा’ एक बेहद अनूठा और लीक से हटकर तैयार किया गया सिनेमाई प्रोजेक्ट है। इस फिल्म की कहानी 1990 के दशक के अंतिम वर्षों और वर्ष 2000 के शुरुआती दौर के भारत को दो मुख्य पहलुओं के जरिए सामने रखती है। इसमें एक तरफ जहां भारतीय क्रिकेट टीम के सुनहरे दौर और ऐतिहासिक बदलाव को दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान के एक दूरदराज गांव की रहने वाली युवा लड़की तारा की सामाजिक लड़ाई को प्रमुखता से उकेरा गया है। डॉक्यू-फिक्शन शैली का इस्तेमाल करते हुए इस फिल्म ने देश के बढ़ते आत्मविश्वास को महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ पिरोने का प्रयास किया है, लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म दर्शकों को अंत तक बांधकर रखने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाती है।

नौवें दशक की पृष्ठभूमि और कहानी का दायरा

यह पूरी फिल्म उस दौर की पृष्ठभूमि पर आधारित है जब देश आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहा था, राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई थी और मैच-फिक्सिंग जैसी घटनाएं सामने आ रही थीं। मुख्य किरदार तारा यानी प्लाबिता बोरठाकुर एक पारंपरिक राजस्थानी परिवार से ताल्लुक रखती है, जहां पितृसत्तात्मक सोच गहरी जड़ें जमा चुकी है। उसके पिता अंकुर विकल और भाई उसे किसी भी तरह की व्यक्तिगत स्वतंत्रता देने के सख्त खिलाफ हैं। उसे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर केवल घर के कामकाज संभालने और पुरुषों की सेवा करने के लिए विवश किया जाता है। इसी समानांतर कहानी के साथ फिल्म उस समय के भारतीय क्रिकेट जगत के माहौल को भी परदे पर उतारती है। वर्ष 2002 में लॉर्ड्स के मैदान पर नेटवेस्ट ट्रॉफी के दौरान सौरव गांगुली की कप्तानी में मिली ऐतिहासिक जीत को भारतीय क्रिकेट की गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। फिल्म इन दोनों अलग धाराओं को एक सूत्र में पिरोने का साहसिक प्रयास करती है, हालांकि कागजों पर यह विचार जितना गहरा और प्रभावशाली नजर आता है, परदे पर उसका प्रभाव उतना सहज नहीं बन पाता है।

ये भी पढ़ें

कलाकारों के अभिनय की खासियत

फिल्म की स्टारकास्ट द्वारा किया गया अभिनय काफी हद तक वास्तविक लगता है, जो इस डॉक्यू-ड्रामा के मूल फ्लेवर को बनाए रखने में मदद करता है। प्लाबिता बोरठाकुर ने तारा के मुख्य किरदार में बेहद स्वाभाविक और प्रभावशाली अभिनय पेश किया है। वह अपनी आंखों और चेहरे के भावों के जरिए एक ऐसी युवती की परेशानियों, डर और भीतर सुलग रहे विद्रोह को पूरी संवेदनशीलता के साथ दर्शाती हैं। उनके इस किरदार से दर्शक आसानी से जुड़ाव महसूस करते हैं। इसके अलावा, तारा के सख्त और रूढ़िवादी पिता के रूप में अंकुर विकल ने बेहतरीन काम किया है। उनके संवाद और तौर-तरीके ग्रामीण भारत में फैली पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कठोरता को बखूबी बयां करते हैं। तारा की मां की भूमिका में समिधा गुरु ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है जो खुद पारिवारिक जुल्म का शिकार रही है और अनजाने में वही पाबंदियां अपनी बेटी पर भी थोप देती है। इसके अलावा फिल्म में कई असली क्रिकेट विश्लेषकों, पत्रकारों और वास्तविक जीवन से जुड़े लोगों के इंटरव्यू भी शामिल किए गए हैं, जिससे यह फिल्म अभिनय से ज्यादा एक डॉक्यूमेंट्री की तरह महसूस होने लगती है。

निर्देशकीय विजन और इसके कमजोर पहलू

डेल्ही बेली और ब्लैकमेल जैसी फिल्मों के लिए अपनी पहचान बनाने वाले निर्देशक अभिनय देव ने इस बार एक बिल्कुल अलग और प्रयोगात्मक रास्ता चुना है। मुख्यधारा की भारतीय फिल्मों में डॉक्यू-फिक्शन फॉर्मेट का प्रयोग बहुत कम देखने को मिलता है। खेल के किसी ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट को किसी आम इंसान और देश की मानसिक सोच के साथ जोड़ना अपने आप में एक अनोखा विचार है, लेकिन निर्देशन के स्तर पर यह फिल्म अपनी मूल दिशा से भटक जाती है। निर्देशक तारा की व्यक्तिगत कहानी और क्रिकेट से जुड़े डॉक्यूमेंट्री साक्ष्यों के बीच सही संतुलन बनाने में असफल नजर आते हैं। फिल्म के दूसरे हिस्से में असली क्रिकेट कमेंटेटर्स और विशेषज्ञों की बातें इतनी अधिक हो जाती हैं कि तारा की मुख्य कहानी पृष्ठभूमि में चली जाती है, जिससे फिल्म का ड्रामा और भावनात्मक जुड़ाव दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।

सिनेमैटोग्राफी और संगीत का प्रभाव

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसके माहौल को गढ़ने में एक अहम भूमिका निभाती है। कैमरे का काम 1990 के दशक के राजस्थानी गांवों और उस दौर के भारत के सामाजिक परिवेश को पूरी प्रामाणिकता के साथ दिखाता है। रंगों का चयन और प्रकाश की व्यवस्था उस जमाने के ठहराव और संघर्ष को परदे पर जीवंत करते हैं। हालांकि, असली क्रिकेट फुटेज और नाटकीय दृश्यों के बीच का बदलाव तकनीकी रूप से ठीक होने के बावजूद कई बार दर्शकों के देखने के प्रवाह में रुकावट पैदा करता है। तारा के घर के भीतर फिल्माए गए आंगन और बंद कमरे के शॉट्स बहुत समझदारी से तैयार किए गए हैं, ताकि दर्शकों को घुटन और कैद का अहसास हो सके। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत कहानी के मूड के अनुकूल तो है, लेकिन वे बहुत ज्यादा यादगार नहीं बन पाए हैं। खेल के मैदान का रोमांच दिखाते समय संगीत जरूर तेज हो जाता है, जिससे देशभक्ति का जोश पैदा होता है, लेकिन भावनात्मक दृश्यों में संगीत को और अधिक गहरा किया जा सकता था।

निष्कर्ष और सिनेमाई कमियां

क्रिकेट टीम की विजय गाथा और तारा के निजी संघर्ष को आपस में जोड़ने का प्रयास काफी हद तक जबरदस्ती किया हुआ प्रतीत होता है। दोनों कथाएं साथ-साथ चलती जरूर हैं, लेकिन वे आपस में सहज तरीके से नहीं मिल पाती हैं। डॉक्यूमेंट्री और फिक्शन के बीच लगातार हो रहे बदलावों की वजह से फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और ड्रामेटिक फ्लो अक्सर टूट जाता है। फिल्म के उत्तरार्ध में क्रिकेट से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री इतनी हावी हो जाती है कि दर्शक तारा के संघर्ष और उसके अंजाम से पूरी तरह कट जाते हैं। इसके अलावा, सामाजिक संदेश देने की होड़ में कई जगहों पर संवाद अत्यधिक उपदेशात्मक हो जाते हैं। कुल मिलाकर, ‘दूसरा’ एक वैचारिक रूप से सोचने पर मजबूर करने वाली और लीक से हटकर बनाई गई फिल्म है, जो खेल इतिहास और प्रयोगात्मक सिनेमा में रुचि रखने वाले दर्शकों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन एक संपूर्ण और संतुलित फिल्म के रूप में यह उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती है।

सवाल-जवाब

क्या दूसरा देखने लायक है?
यह फिल्म खेल इतिहास और प्रयोगात्मक सिनेमा में रुचि रखने वाले दर्शकों को पसंद आ सकती है, लेकिन कमजोर पेसिंग और संतुलन की कमी के कारण यह हर दर्शक के लिए उपयुक्त नहीं है।
फिल्म दूसरा का निर्देशन किसने किया है?
फिल्म दूसरा का निर्देशन अभिनय देव ने किया है।
फिल्म दूसरा में मुख्य भूमिका किसने निभाई है?
फिल्म में तारा का मुख्य किरदार प्लाबिता बोरठाकुर ने निभाया है।
कौन सी फिल्में या शैलियां दूसरा जैसी हैं?
यह फिल्म डॉक्यू-फिक्शन फॉर्मेट पर आधारित है जो खेल इतिहास और सामाजिक संघर्ष को जोड़ती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp