राजीव ठाकुर का छलका दर्द बताया कैसे एक कमरे के मकान में गुजरा बचपन और 1984 के दंगों ने छीना सब कुछटीवी
2 घंटे पहले· 0

राजीव ठाकुर का छलका दर्द बताया कैसे एक कमरे के मकान में गुजरा बचपन और 1984 के दंगों ने छीना सब कुछ

मशहूर कॉमेडियन राजीव ठाकुर ने अपने पुराने दिनों के भीषण संघर्षों को याद किया है, जिसमें एक ही कमरे में पूरे परिवार का रहना और दंगों में पिता की फैक्ट्री उजड़ना शामिल है।

आज राजीव ठाकुर को भारतीय मनोरंजन जगत में एक बेहद सफल कॉमेडियन और अभिनेता के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर शोहरत और संपत्ति दोनों अर्जित की है। उन्होंने 'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर शो', 'कॉमेडी सर्कस', 'द कपिल शर्मा शो' और 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' जैसे देश के सबसे बड़े और लोकप्रिय कॉमेडी कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। इसके अलावा, उन्होंने फिल्मों और वेब सीरीज में अभिनय के साथ-साथ स्टैंप कॉमेडी के मंच पर भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। लेकिन आज वे जिस आरामदायक और सफल मुकाम पर हैं, उनका बचपन उससे बिल्कुल विपरीत था और बेहद तंगी में बीता था। हाल ही में वैभव मुंजाल के पॉडकास्ट में एक बातचीत के दौरान, राजीव ठाकुर ने अपने व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों और उस गहरे दर्द को साझा किया जो आज भी उनके मन में छिपा हुआ है।

बचपन की यादें और कॉमेडी का दर्द

अपने शुरुआती दिनों के बारे में बात करते हुए राजीव ने बताया कि उनके बचपन की परिस्थितियां इतनी कठिन थीं कि वे उन्हें याद भी नहीं करना चाहते। उन्होंने साझा किया कि यदि वे आज के समय में लोगों को अपनी उस भीषण गरीबी की कहानियां सुनाते हैं, तो लोगों को यह सब एक कल्पना या मनगढ़ंत कहानी जैसा लग सकता है। इसका कारण यह है कि उनके जीवन के उस बेहद मुश्किल दौर की गवाही देने या उसकी पुष्टि करने के लिए आज कोई भी जीवित नहीं बचा है। कई लोग, जिनमें उनके साथी कलाकार भी शामिल हैं, अक्सर उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें अपने इस गहरे व्यक्तिगत दर्द और संघर्षों को अपनी स्टैंड-अप कॉमेडी का हिस्सा बनाना चाहिए। राजीव ने स्वीकार किया कि वे कभी-कभी ऐसा करने का प्रयास भी करते हैं, लेकिन उन यादों का दर्द आज भी इतना गहरा और वास्तविक है कि जब वे मंच पर इन बातों पर लोगों को हंसा रहे होते हैं, तब भी उनका दिल रो रहा होता है। कई बार तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि स्टेज पर अपनी परफॉर्मेंस खत्म करने के तुरंत बाद वे बैकस्टेज जाकर फूट-फूटकर रोने लगते हैं। इसी अत्यधिक भावनात्मक तनाव के कारण वे अपने जीवन के इस दौर के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम बात करते हैं।

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एक कमरे के मकान की लाचारी

राजीव के परिवार की इस भीषण तंगी की शुरुआत उनके माता-पिता की शादी के तुरंत बाद हुई थी। शादी के बाद उनके पिता को अचानक उनके पुश्तैनी और आरामदायक घर से बाहर निकाल दिया गया था। इसके बाद रातों-रात उनका पूरा परिवार एक बड़े और सुविधा संपन्न घर से बेघर होकर एक बेहद छोटे, एक कमरे वाले मकान में रहने को मजबूर हो गया। इसी एक कमरे के सीमित दायरे में राजीव और उनके दो भाई-बहनों का जन्म हुआ और वे वहीं बड़े हुए। यह एक कमरा ही उनके लिए सब कुछ था, जो एक साथ बेडरूम, लिविंग रूम, किचन और बाथरूम के रूप में इस्तेमाल होता था। चूंकि वहां अलग से कोई बाथरूम नहीं था, इसलिए परिवार के पांचों सदस्यों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। जब भी परिवार का कोई एक सदस्य नहाने जाता था, तो बाकी के चारों सदस्यों को कमरे से बाहर जाकर इंतजार करना पड़ता था। इस लाचारी के कारण छोटे से राजीव को हमेशा ऐसा महसूस होता था कि उनका घर कोई सामान्य घर नहीं बल्कि एक पब्लिक टॉयलेट है।

1984 के दंगों का कहर और बिजली की किल्लत

उनके परिवार की आर्थिक स्थिति तब और भी ज्यादा खराब हो गई जब साल 1984 के दंगों के दौरान उनके पिता की धागे बनाने की फैक्ट्री पूरी तरह से तबाह हो गई। इस हादसे ने उनके पिता का रोजगार छीन लिया और परिवार के पास आय का कोई नियमित स्रोत नहीं बचा। हालात इतने बदतर थे कि वे उस एक कमरे का मासिक किराया देने के लिए भी संघर्ष कर रहे थे। उनके कमरे की स्थिति भी बेहद दयनीय थी, जहां रोशनी के नाम पर सिर्फ एक 40-वाट का पीला बल्ब लगा हुआ था। राजीव को उस पीली रोशनी से बहुत नफरत थी क्योंकि उन्होंने अपने घर में कभी सफेद ट्यूब लाइट नहीं देखी थी। जब भी वह किसी दूसरे के घर जाते और वहां जलती हुई सफेद ट्यूब लाइट देखते, तो वह सोचते थे कि उनके अपने घर में ऐसी रोशनी कब आएगी।

कठिन नियम और मां का कड़ा संघर्ष

इसके साथ ही, चूंकि कमरे के किराए में ही बिजली का खर्च भी शामिल था, इसलिए मकान मालिक का एक सख्त नियम था कि वह रात को ठीक 9 बजे उनके कमरे की बिजली बंद कर देता था। इस पाबंदी के बाद परिवार के पास केवल दो ही विकल्प बचते थे, या तो वे अंधेरे में तुरंत सो जाएं या फिर मिट्टी के तेल वाले दीये की मद्धम रोशनी के सहारे बैठें। उनका दैनिक जीवन भी शारीरिक रूप से बेहद थका देने वाला था। वे बिना लिफ्ट वाली एक इमारत की तीसरी मंजिल पर रहते थे, जिसका मतलब था कि राजीव और उनके भाई-बहनों को हर रोज पानी की भारी बाल्टियां अपने हाथों से उठाकर तीसरी मंजिल तक ले जानी पड़ती थीं। इस विकट परिस्थिति में परिवार को सहारा देने के लिए उनकी मां ने सिलाई-कढ़ाई का काम किया। वह न केवल घर पर कपड़े सिलती थीं, बल्कि खुद चलकर ग्राहकों के घरों तक जाती थीं ताकि वहां से सिलने वाले कपड़े ला सकें और तैयार होने के बाद उन्हें वापस पहुंचा सकें, जिससे परिवार का गुजारा हो सके।

सवाल-जवाब

राजीव ठाकुर ने कौन-कौन से प्रसिद्ध शोज में काम किया है?
राजीव ठाकुर ने 'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर शो', 'कॉमेडी सर्कस', 'द कपिल शर्मा शो' और 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' जैसे प्रसिद्ध शोज में काम किया है।
राजीव ठाकुर के पिता की फैक्ट्री किस वर्ष और क्यों बर्बाद हुई थी?
उनके पिता की धागे की फैक्ट्री साल 1984 के दंगों के दौरान पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी, जिसके बाद वे बेरोजगार हो गए थे।
बचपन में राजीव ठाकुर के परिवार को रहने में क्या दिक्कतें थीं?
उनका पूरा परिवार एक ही कमरे में रहता था जो बेडरूम, किचन और बाथरूम सब था। अलग बाथरूम न होने से एक सदस्य के नहाने पर बाकी चारों को बाहर इंतजार करना पड़ता था।
मकान मालिक रात 9 बजे बिजली क्यों बंद कर देता था?
चूंकि बिजली का खर्च किराए में ही शामिल था, इसलिए मकान मालिक बिजली बचाने के लिए रात 9 बजे लाइट बंद कर देता था, जिसके बाद वे मिट्टी के तेल के दीये का इस्तेमाल करते थे।
राजीव ठाकुर के परिवार का पेट पालने के लिए उनकी मां क्या काम करती थीं?
उनकी मां कपड़े सिलने का काम करती थीं और खुद ग्राहकों के घरों से कपड़े लाने और सिलने के बाद पहुंचाने का काम करती थीं।

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