उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में मौसम का मिजाज दो तरफा बना हुआ है। जहां एक ओर भीषण गर्मी और लू से लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त है, वहीं भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने प्रदेश के कई जिलों के लिए राहत भरी चेतावनी जारी की है। विभाग के अनुसार, राज्य के कुछ क्षेत्रों में तेज आंधी और बारिश का दौर शुरू होने वाला है, जो भीषण उमस से राहत दिला सकता है। हालांकि, मौसम के इस अस्थिर रूप को देखते हुए सतर्कता बरतना आवश्यक है क्योंकि तेज हवाओं के साथ बिजली गिरने की आशंका बनी हुई है।
इन 15 जिलों में बदलेगा मौसम
मौसम विभाग ने सोनभद्र, चंदौली, मिर्जापुर, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, मऊ, प्रयागराज, जौनपुर, अयोध्या, अमेठी, रायबरेली, फतेहपुर, बांदा और सिद्धार्थनगर में येलो अलर्ट घोषित किया है। इन 15 जिलों में 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज तूफान आने और भारी बारिश होने की संभावना है। इतनी तीव्र गति की हवाएं टिन शेड, कमजोर ढांचों और पेड़-पौधों को भारी नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं, इसलिए निवासियों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
लू की मार और भीषण गर्मी
दूसरी तरफ, सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बरेली, कानपुर, खेरी और हरदोई जैसे इलाकों में गर्मी का प्रकोप जारी है। सहारनपुर में सुबह से ही तेज धूप और चिलचिलाती गर्मी का असर देखा जा रहा है। मुरादाबाद में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है, जहां वर्तमान तापमान 35 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच चुका है। गोंडा में स्थिति कुछ अलग है, जहां बादलों के आवागमन के बावजूद उमस कम नहीं हुई है और तापमान बढ़ने के कारण स्थानीय लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। घर से बाहर निकलने वाले लोगों को छाता और पर्याप्त पानी साथ रखने की हिदायत दी गई है।
मानसून की सुस्त रफ्तार और कृषि पर असर
समूचे देश में मानसून की प्रगति अब तक काफी धीमी रही है। केरल में इस बार सामान्य से 33 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जिसमें वायनाड जिला सबसे अधिक प्रभावित है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 23 जून 2026 तक खरीफ फसलों की बुवाई का लक्ष्य 110.00 लाख हेक्टेयर तय किया गया था, लेकिन अब तक केवल 6.63 लाख हेक्टेयर यानी कुल लक्ष्य का 5.99 प्रतिशत ही बुवाई हो पाई है।
किसानों के लिए विशेष परामर्श
मानसून की कम सक्रियता को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। धान की पारंपरिक खेती के बजाय किसानों को कम पानी वाली फसलों जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, सावां और कोदों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही उर्द, मूंग और तिल जैसी फसलों को तरजीह देना फायदेमंद बताया गया है ताकि फसल प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सके और संभावित जल संकट से निपटा जा सके।













