वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, विवेक, संतान और समृद्धि का प्रमुख कारक ग्रह माना जाता है। जब कुंडली में गुरु शुभ और बलवान स्थिति में विराजमान होते हैं, तो व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सही मार्गदर्शन और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। वहीं इसके विपरीत, यदि जन्मपत्रिका में गुरु कमजोर, पीड़ित या नकारात्मक स्थिति में हों, तो जातक के स्वभाव, सोचने के तौर-तरीके और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। ऐसे में गुरु के प्रभाव और उनकी विभिन्न ग्रहों के साथ युति को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
कुंडली में गुरु के नकारात्मक प्रभाव और व्यक्ति का व्यवहार
जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में गुरु नकारात्मक प्रभाव दे रहे होते हैं, तो उसके नैतिक मूल्यों और कृतज्ञता के भाव में भारी कमी देखी जाती है। ऐसा व्यक्ति दूसरों के प्रति उपकार मानने के बजाय अहसान फरामोश या कृतघ्न प्रवृत्ति की ओर झुक सकता है। नकारात्मक गुरु के कारण व्यक्ति के अंदर सही और गलत का अंतर करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। जातक का विवेक सीमित हो जाता है और वह केवल अपने निजी स्वार्थ और तात्कालिक फायदे के इर्द-गिर्द ही सोचने लगता है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, जीवन में किसी भी प्रकार की विकट परिस्थिति या संकट आने पर गुरु जातक की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़े रहते हैं। गुरु को बल प्रदान करने का सबसे श्रेष्ठ उपाय गुरुजनों, शिक्षकों और बड़ों का आदर-सम्मान करना है। यदि व्यक्ति गुरु का सम्मान करता है, तो कुंडली में गुरु की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। वहीं गुरु का निरादर करने से उनकी शुभता क्षीण हो जाती है।
पापी ग्रहों की युति और भावों में गुरु की स्थिति
कुंडली में गुरु की युति जब पापी अथवा क्रूर ग्रहों के साथ बनती है, तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। जब गुरु का संयोग मंगल, राहु, केतु या शनि जैसे ग्रहों के साथ होता है, तो व्यक्ति का अपने गुरु, मार्गदर्शक या पितातुल्य व्यक्तियों से विवाद होने की प्रबल संभावना बन जाती है। ऐसे अशुभ योगों के प्रभाव से व्यक्ति अपने गुरुजनों का अपमान कर बैठता है या उनसे उसके संबंध पूरी तरह बिगड़ जाते हैं।
इसके अलावा कुंडली के भावों के अनुसार भी गुरु के फलों में भारी बदलाव आता है। यदि गुरु जन्मपत्रिका के 6वें, 1ले या 12वें भाव में स्थित हों, तो जातक को जीवन में निरंतर नकारात्मकता और मानसिक उलझनों का सामना करना पड़ता है। 6ठा भाव रोग, ऋण और शत्रु का माना जाता है, जबकि 12वां भाव व्यय और हानि से जुड़ा होता है। इन भावों में गुरु की प्रतिकूल स्थिति व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है।
ग्रह-गोचर और गुरु का प्रभाव
ग्रहों के राशि परिवर्तन और गोचर का असर सभी 12 राशियों के जातकों पर समय-समय पर पड़ता रहता है। 1 नवंबर से चंद्रमा और केतु का साथ छोड़कर गुरु के सिंह राशि में प्रवेश से संबंधित स्थितियां भी जातकों के जीवन में कई बड़े बदलाव लेकर आती हैं। जन्म कुंडली में ग्रह-नक्षत्रों की चाल, उनकी दशा और भाव स्थिति का गहन अध्ययन करने पर ही व्यक्ति के जीवन पर पड़ने वाले वास्तविक असर का सटीक आकलन किया जा सकता है। नियमित रूप से बड़ों का सम्मान करना, नैतिक आचरण बनाए रखना और धार्मिक अनुशासन का पालन करना गुरु के दुष्प्रभावों को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।


















