अश्विनी अय्यर तिवारी के निर्देशन में बनी बरेली की बर्फी रिव्यू (2026) के इस दौर में भी अपनी सादगी और उत्तर भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लिए दर्शकों के बीच खास जगह रखती है। उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की पृष्ठभूमि पर रची गई यह सिनेमैटिक यात्रा बिट्टी मिश्रा, चिराग दुबे और प्रीतम विद्रोही जैसे किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी का केंद्र एक ऐसी युवा महिला है जो अपने विचारों से मेल खाती एक अनोखी किताब के लेखक की तलाश में निकलती है। इस खोज के दौरान उपजी गलतफहमियां, रोमांस और अनपेक्षित स्थितियां दर्शकों को अंत तक बांधे रखती हैं। दंगल जैसी बड़ी फिल्मों के लेखक नितेश तिवारी और श्रेयस जैन द्वारा तैयार किया गया इसका चुस्त पटकथा लेखन इस पूरी कहानी को मजबूती देता है।
राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना की दमदार अदाकारी
इस पूरी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय यदि किसी एक पहलू को दिया जाए, तो वह निश्चित रूप से राजकुमार राव का अभिनय है। उन्होंने पर्दे पर प्रीतम विद्रोही का किरदार निभाया है, जो पेशे से एक साधारण और झिझकने वाला साड़ी विक्रेता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब आयुष्मान खुराना द्वारा निभाए गए चिराग दुबे के निर्देश पर वह एक दबंग और टपोरी शख्सियत में ढलने की कोशिश करता है। पर्दे पर उनके इस रूपांतरण और संवाद अदायगी ने सिनेमाघरों में दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और आज भी इसे हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनय पलों में गिना जाता है। इस बेहतरीन काम के लिए राजकुमार राव को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया था।
कृति सनोन और सह-कलाकारों का लाजवाब अभिनय
जब यह फिल्म सिनेमाघरों में आई थी, तब आयुष्मान खुराना कंटेंट आधारित सिनेमा की एक नई पहचान बन रहे थे। चिराग दुबे के रूप में उन्होंने एक ऐसे प्रेमी की भूमिका को सहजता से निभाया जो थोड़ा स्वार्थी होने के बावजूद प्यार में पूरी तरह डूबा रहता है। इसके विपरीत, कृति सनोन ने बरेली की एक बेबाक, सिगरेट पीने की शौकीन और आजाद ख्यालों वाली बिट्टी का किरदार बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा। इसके अलावा, पंकज त्रिपाठी ने पिता की भूमिका और सीमा पाहवा ने मां के किरदार में अपनी खास कॉमिक टाइमिंग से फिल्म के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया। इन सभी कलाकारों के बीच का गजब का तालमेल ही इस फिल्म की असली ताकत साबित हुआ।
बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई और बजट का गणित
साल 2017 के दौरान जब कई बड़ी स्टार कास्ट वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो रही थीं, तब 18 अगस्त को रिलीज हुई इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि दमदार सामग्री ही बॉक्स ऑफिस की असली बाजीगर है। फिल्म का कुल बजट लगभग 20 करोड़ रुपये था और इसने दुनिया भर में 60 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया। भारत के घरेलू बाजार में इसकी नेट कमाई लगभग 34.55 करोड़ रुपये दर्ज की गई। अपने निर्माण लागत से तिगुनी कमाई करने के बाद इसने न केवल निर्माताओं और वितरकों को मालामाल किया, बल्कि बाजार विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। इस छोटी बजट की फिल्म की कामयाबी ने हिंदी फिल्म उद्योग में छोटे शहरों की कहानियों को नया मंच देने का एक नया सिलसिला शुरू किया।
किताब से लेकर मधुर संगीत तक का सफर
आज 18 अगस्त 2026 को इस फिल्म के रिलीज हुए पूरे 9 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद टेलीविजन और डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर इसे आज भी उतने ही चाव से देखा जाता है। निकोलस बैरो के उपन्यास द इंग्रीडिएंट्स ऑफ लव से प्रेरित होकर इस कहानी को भारतीय परिवेश में इस प्रकार ढाला गया कि यह हर उम्र के दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करती है। इसके अलावा, समीर उद्दीन और आरको द्वारा तैयार किए गए इसके मधुर गीत जैसे नज्म नज्म और स्वीटी तेरा ड्रामा आज भी लोगों की संगीत सूची में अपनी जगह बनाए हुए हैं। यह फिल्म इस बात का पुख्ता प्रमाण थी कि किसी भी प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए महंगे वीएफएक्स या बड़े एक्शन दृश्यों की नहीं, बल्कि बेहतरीन लेखन और मजबूत अभिनय की जरूरत होती है।



















