राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए छात्र प्रदर्शन और उससे जुड़े कानूनी विवादों पर मंगलवार को देश की सर्वोच्च अदालत में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान विभिन्न पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे और अदालत के सामने कई गंभीर मुद्दे उठाए गए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है।
कमेटी गठन और जांच का दायरा
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निर्णायक जांच सुनिश्चित करने के लिए एक हाई पावर्ड कमेटी बनाई जाएगी। इस समिति में एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, एक पूर्व डीजीपी और सीबीआई के एक पूर्व डायरेक्टर जनरल जैसे प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल होंगे। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि समिति केवल एक बार सीलबंद रिपोर्ट सौंपकर शांत नहीं बैठेगी, बल्कि जैसे-जैसे नए तथ्य सामने आएंगे, वह समय-समय पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट भी अदालत को सौंपती रहेगी ताकि आगे के जरूरी निर्देश जारी किए जा सकें।
वकीलों के तर्क और विरोध
अदालत की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने सभी एफआईआर को पूरी तरह से रद्द करने का पुरजोर अनुरोध किया। इसके विपरीत, विरोध पक्ष के वकील सैयद रिजवान ने एफआईआर रद्द करने की मांग का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि ऐसा करने से समाज में एक गलत मिसाल कायम होगी और संसद मार्च को पूरी तरह गैरकानूनी बताया। इस पर तीखी बहस भी देखने को मिली, जहां वकीलों ने याचिकाकर्ताओं के लोकस स्टैंड पर भी सवाल उठाए।
पुलिस कार्रवाई और घायलों का पक्ष
सुनवाई के दौरान पुलिस पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि इस आंदोलन के दौरान दो सौ से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिन पर पथराव किया गया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है, और किसी भी निर्दोष प्रदर्शनकारी के खिलाफ अनावश्यक दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। हालांकि, यह भी साफ किया गया कि जिन लोगों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उन्हें किसी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी।
अन्य अहम मुद्दे और तकनीकी पहलू
कारवाही के दौरान प्रदर्शनकारियों और महिला प्रतिभागियों को मिल रही ऑनलाइन धमकियों, सोशल मीडिया अकाउंट्स बंद किए जाने और फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल जैसे कई संवेदनशील मुद्दे भी उठाए गए। अदालत ने आश्वासन दिया कि इन सभी बिंदुओं को नव-गठित समिति के समक्ष उठाया जा सकता है, जहां सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा। अदालत ने सभी वकीलों से अपने बहुमूल्य सुझाव सौंपने को कहा है ताकि समिति के कार्यक्षेत्र और दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दिया जा सके।





















