बॉलीवुड की सुनहरी दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो महज चंद मिनटों के अभिनय से ही दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करते हैं। आज हम जिस कलाकार की बात कर रहे हैं, उनका नाम जगदीप है, जिन्हें देश-दुनिया आज भी उनके मशहूर किरदार ‘सूरमा भोपाली’ के नाम से जानती है। 8 जुलाई का दिन इस कालजयी अभिनेता की पुण्यतिथि के रूप में याद किया जाता है। 1975 में आई ऐतिहासिक फिल्म ‘शोले’ में उनका वह छोटा सा लेकिन प्रभावशाली किरदार, जिसमें वे अपनी मूंछों को ताव देते हुए अनोखे अंदाज में बात करते हैं, आज भी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज है। हालांकि, पर्दे पर अपनी हंसी और कॉमिक टाइमिंग से लोगों को सराबोर कर देने वाले जगदीप का असली सफर इश्तियाक अहमद जाफरी के रूप में शुरू हुआ था, जो गरीबी और अभावों के बीच पले-बढ़े थे।
बचपन का संघर्ष और गुमनामी के दिन
29 मार्च 1939 को जन्मे इश्तियाक अहमद जाफरी का बचपन बिल्कुल भी आसान नहीं था। बहुत कम उम्र में ही उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। इसके बाद 1947 में हुए भारत-विभाजन की त्रासदी ने उनके खुशहाल परिवार को पूरी तरह तोड़कर रख दिया। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उन्हें पेट भरने के लिए सड़कों पर काम तलाशना पड़ता था। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि दर-दर भटकने वाला यह बच्चा आगे चलकर एक दिन भारतीय सिनेमा का एक नायाब हीरा बनेगा। उनकी किस्मत का पहिया साल 1951 में घूमा, जब निर्देशक बी.आर. चोपड़ा अपनी फिल्म ‘अफसाना’ के लिए बाल कलाकारों की खोज कर रहे थे। एक एजेंट ने सड़कों पर घूमते इश्तियाक को काम का लालच दिया और नाटक के एक दृश्य में बस ताली बजाने के बदले उन्हें 3 रुपये देने का वादा किया।
कैसे एक छोटा सा रोल बना टर्निंग पॉइंट
सेट पर पहुंचकर इश्तियाक ने अभिनय की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। फिल्म के मुख्य बाल कलाकार को उर्दू के भारी-भरकम संवाद बोलने में कठिनाई हो रही थी। इश्तियाक, जो उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ रखते थे, ने हिम्मत दिखाई और नकली मूंछ-दाढ़ी लगाकर उन डायलॉग्स को ऐसे बोला कि सेट पर मौजूद हर कोई हैरान रह गया। बी.आर. चोपड़ा उनके आत्मविश्वास से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस बच्चे की फीस तुरंत दोगुनी कर दी और उन्हें 6 रुपये दिए। इस घटना ने साबित कर दिया कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं।
दिलीप कुमार और पंडित जवाहरलाल नेहरू का जुड़ाव
अपने शुरुआती दौर में जगदीप ने कॉमेडी नहीं, बल्कि गंभीर और भावुक भूमिकाएं निभाईं। 1953 की फिल्म ‘फुटपाथ’ में उन्होंने महान अभिनेता दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया। उस फिल्म के एक दृश्य में बिना किसी ग्लिसरीन के उनका इतना सजीव और मार्मिक अभिनय था कि खुद दिलीप कुमार भावुक हो गए और उन्होंने जगदीप को 100 रुपये का नकद पुरस्कार देकर उनकी प्रतिभा को सराहा। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि 1957 में फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ में छात्र ‘महमूद’ की भूमिका निभाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनके मुरीद हो गए थे।
कॉमेडी के जादूगर के रूप में पहचान
जगदीप के करियर में असली बदलाव तब आया जब प्रसिद्ध निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें अपनी क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ (1953) में जूता पॉलिश करने वाले ‘लालू उस्ताद’ की भूमिका दी। इस किरदार ने जगदीप को खुद से परिचित कराया कि उनकी असली कला कॉमेडी में है। 1968 की फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ ने उन्हें एक मुकम्मल कॉमेडियन के रूप में स्थापित कर दिया। ‘शोले’ के ‘सूरमा भोपाली’ और ‘अंदाज अपना अपना’ के ‘बांकेलाल भोपाली’ जैसे किरदारों ने तो उन्हें अमर ही कर दिया। उन्होंने ‘पुराना मंदिर’ में ‘मच्छर सिंह’ और प्रियदर्शन की फिल्म ‘मुस्कुराहट’ में ‘बद्रीप्रसाद चौरसिया’ जैसे चुनौतीपूर्ण किरदारों को निभाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया।











