माता रानी के जागरण और मेलों में गूंजने वाले भजन जैसे ‘चलो बुलावा आया है’ और ‘तूने मुझे बुलाया शेरावालिए’ आज भी हर किसी की जुबान पर हैं। अपनी जादुई और दमदार आवाज से इन भजनों को अमर बनाने वाले नरेंद्र चंचल की कला सिर्फ धार्मिक गीतों तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा के सिल्वर स्क्रीन पर भी अपनी गायकी का ऐसा जादू बिखेरा कि हर कोई उनका कायल हो गया। विशेष तौर पर फिल्म ‘बॉबी’ के एक लोकप्रिय गाने ने उनके करियर को एक ऐसा नया मोड़ दिया जिससे वह रातोंरात देश भर में मशहूर हो गए। इस गाने के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी नवाजा गया था।
धार्मिक माहौल और अमृतसर से संगीत की शुरुआत
नरेंद्र चंचल का जन्म 16 अक्टूबर 1940 को पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेंद्र खरबंदा था। उनके घर का माहौल बेहद धार्मिक था और उनकी माता कैलाशवती खुद भी भजन-कीर्तन किया करती थीं। घर के इसी पवित्र और संगीतयुक्त वातावरण के कारण नरेंद्र का झुकाव बचपन से ही संगीत और गायकी की तरफ हो गया था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था। हालांकि उस दौर में उन्हें खुद इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि बचपन का यह शौक आगे चलकर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन जाएगा और लोग उन्हें हमेशा के लिए याद रखेंगे।
दुकानों के बाहर बैठकर सीखते थे गाने
बचपन के दिनों में नरेंद्र चंचल को फिल्मों के गीत सुनने का बेहद शौक था, लेकिन उस समय उनके परिवार के पास रेडियो या ग्रामोफोन खरीदने के साधन नहीं थे। अपनी संगीत की इसी भूख को मिटाने के लिए वह अक्सर बाजार में रिकॉर्ड की दुकानों के बाहर घंटों खड़े होकर या बैठकर गाने सुना करते थे। इसके बाद वह उन गानों को अपने जहन में बिठाकर वैसे ही गाने का रियाज किया करते थे। उन्हें अपने दौर के महान गायक मोहम्मद रफी और मन्ना डे की गायकी खासी पसंद थी और वह उन्हीं के अंदाज में गाने की कोशिश करते थे। मोहल्ले के छोटे-मोटे कार्यक्रमों और पारिवारिक आयोजनों में वह बढ़-चढ़कर अपनी प्रस्तुति देते थे। उनकी सुरीली आवाज धीरे-धीरे आसपास के लोगों को काफी पसंद आने लगी थी।
चंचल नाम के पीछे का दिलचस्प किस्सा
गायकी के इस सफर के बीच उनके नाम के साथ जुड़े ‘चंचल’ शब्द की भी एक बड़ी दिलचस्प कहानी है। स्कूल के दिनों में उनका स्वभाव थोड़ा नटखट और बहुत अधिक चंचल हुआ करता था। उनकी इसी शरारती और ऊर्जावान प्रवृत्ति से तंग आकर या प्रेरित होकर उनके एक शिक्षक ने उन्हें प्यार से ‘चंचल’ पुकारना शुरू कर दिया था। समय बीतता गया और स्कूल का वह उपनाम उनके असली नाम की तरह ऐसा रचा-बसा कि आगे चलकर यही उनकी पेशेवर पहचान बन गया और पूरी दुनिया उन्हें नरेंद्र चंचल के नाम से जानने लगी।
राज कपूर ने पहचानी प्रतिभा और मिला ‘बॉबी’ में मौका
उनके जीवन का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ तब आया जब मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने उनकी गायकी को पहली बार लाइव सुना। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान नरेंद्र चंचल महान सूफी संत बुल्ले शाह की कोई रचना गा रहे थे। वहां मौजूद फिल्ममेकर राज कपूर उनकी आवाज के भारीपन और गहराई से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपनी आने वाली फिल्म में गाने का अवसर देने का मन बना लिया। इस तरह उन्हें राज कपूर की चर्चित फिल्म ‘बॉबी’ में अपनी आवाज का जादू बिखेरने का बड़ा मौका मिल गया।
रातोंरात स्टार बना देने वाला वह ऐतिहासिक गाना
वर्ष 1973 में रिलीज हुई फिल्म ‘बॉबी’ में ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। इस फिल्म का गाना ‘बेशक मंदिर-मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो’ दर्शकों के दिलों में सीधे उतर गया। इस गीत के बोल में इंसानियत और सच्चे प्रेम का बहुत बड़ा संदेश छिपा था। नरेंद्र चंचल की बुलंद और रूहानी आवाज ने इस गाने को और भी अधिक प्रभावशाली बना दिया। फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर अपार सफलता के साथ ही उनकी यह आवाज देश के कोने-कोने तक पहुंच गई। शानदार गायकी के बल पर उन्हें वर्ष 1974 के फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्व गायक के खिताब से सम्मानित किया गया।
सिनेमा के साथ भक्ति संगीत का सफर और अंतिम विदाई
'बॉबी' की शानदार कामयाबी के बाद नरेंद्र चंचल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ‘बेनाम’ और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी कई अन्य हिंदी फिल्मों में भी अपनी सुरीली आवाज में गाने रिकॉर्ड किए। इसके अलावा उन्होंने पंजाबी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के संगीत में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि उन्हें जितनी शोहरत और अपार लोकप्रियता माता की भेंटों और जागरण के भजनों से मिली, वैसी फिल्मों में कम ही मिल पाई। फिल्म ‘आशा’ का गाना ‘तूने मुझे बुलाया शेरावालिए’ और फिल्म ‘अवतार’ का लोकप्रिय गीत ‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है’ उनकी पहचान का पर्याय बन गए। संगीत की दुनिया को अपनी सुरीली आवाज से संवारने वाले नरेंद्र चंचल 22 जनवरी 2021 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अंतिम सांस लेने वाले गायक उस समय 80 वर्ष के थे और कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे।




















