भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ चेहरे ऐसे दर्ज हो चुके हैं जिनकी पहचान उनके निभाए अमर किरदारों से हमेशा जुड़ी रहती है. जब भी पर्दे पर रौबदार आवाज, तीखे तेवर और खौफनाक खलनायकी की बात उठती है, तो अमरीश पुरी का चेहरा अपने आप सामने आ जाता है. मोगैंबो जैसे ऐतिहासिक किरदार को जीवंत करने वाले अमरीश पुरी ने इंडस्ट्री में जो मुकाम बनाया, वह विरले ही देखने को मिलता है. हालांकि, अभिनय की इतनी बड़ी पारिवारिक विरासत होने के बावजूद उनके पोते वर्धन पुरी सिनेमाई दुनिया में वह जादू नहीं दोहरा सके और न ही उस स्टारडम तक पहुंच पाए जिसकी उनसे उम्मीद बांधी गई थी.
परंपरा से अलग राह चुनकर किया था बॉलीवुड डेब्यू
वर्धन पुरी ने साल 2019 में आई फिल्म ‘ये साली आशिकी’ के जरिए मुख्य अभिनेता के तौर पर बड़े पर्दे पर कदम रखा था. अधिकांश नए कलाकारों के विपरीत, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत किसी पारंपरिक या चॉकलेटी रोमांटिक ड्रामा से नहीं की थी. उनकी पहली ही फिल्म एक बेहद जटिल कथानक पर आधारित थी, जिसमें प्यार, गहरा जुनून, छल और मानवीय रिश्तों के स्याह पहलू को प्रमुखता से पेश किया गया था. इस कहानी में कई भावनात्मक उतार-चढ़ाव थे, जिनसे एक गंभीर थ्रिलर का ताना-बाना बुना गया था.
शुरुआती दांव और तुलना का भारी दबाव
फिल्म के प्रचार-प्रसार के दौरान वर्धन पुरी के किरदार की चर्चा शाहरुख खान की चर्चित फिल्म ‘डर’ के साथ जोड़ी जा रही थी. खुद वर्धन पुरी ने भी प्रमोशन के दौरान जिक्र किया था कि उनका निभाया पात्र दर्शकों को ‘डर’ में शाहरुख खान के जुनूनी किरदार की याद दिलाता है और लोगों को भी ऐसा ही महसूस हो रहा था. हालांकि, रिलीज के बाद दर्शकों ने न तो फिल्म की कहानी को पूरी तरह अपनाया और न ही उनके अभिनय को वह व्यापक सराहना मिली जिसकी अपेक्षा थी. नतीजतन, यह फिल्म टिकट खिड़की पर दर्शकों को आकर्षित करने में नाकाम रही और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई.
सही मौकों की कमी और करियर पर ठहराव का असर
पहली ही फिल्म के न चलने का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव वर्धन पुरी के आगे के सफर पर पड़ा. डेब्यू के जरिए उनका नाम दर्शकों के कानों तक तो पहुंचा, मगर वह मजबूत पहचान नहीं बन सकी जो एक लंबी पारी के लिए जरूरी होती है. किसी भी नवागंतुक कलाकार के लिए केवल एक असफलता ही सब कुछ तय नहीं करती, लेकिन इसके बाद उन्हें ऐसे सही प्रोजेक्ट्स और दमदार भूमिकाएं नहीं मिलीं जहां वे अपनी अभिनय क्षमता को नए सिरे से साबित कर पाते. लगातार काम न मिलना या लंबे अंतराल का होना किसी भी नए कलाकार के लिए जोखिम भरा साबित होता है. अगर उन्हें निरंतर मजबूत फिल्मों में काम करने का अवसर मिलता, तो उनके करियर का स्वरूप आज काफी अलग हो सकता था.



















