मानसून में ककोड़े की खेती: कम लागत और कम मेहनत में किसान ऐसे कमाएं बंपर मुनाफाव्यापार
2 घंटे पहले· 1

मानसून में ककोड़े की खेती: कम लागत और कम मेहनत में किसान ऐसे कमाएं बंपर मुनाफा

बरसात के मौसम में ककोड़े की खेती किसानों के लिए कमाई का एक बेहतरीन जरिया साबित हो रही है। कम लागत और सीमित देखभाल के बावजूद यह फसल बाजार में अच्छी मांग के कारण किसानों को मालामाल कर सकती है।

मानसून का आगमन किसानों के लिए खेती की नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। इन दिनों किसान कई तरह की नकदी फसलों और सब्जियों की बुवाई की योजना बनाते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण सब्जी है ककोड़ा, जिसकी खेती पहाड़ी और आदिवासी बहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर की जा रही है। गेनाराम जैसे प्रगतिशील किसानों का मानना है कि ककोड़ा एक ऐसी बेलदार फसल है जिसे खेत की मेड़, बाड़ या फिर मचान तैयार करके बहुत आसानी से उगाया जा सकता है। बाजार में इसकी उपलब्धता कम और मांग अधिक होने के कारण किसानों को इसके बेहतर दाम मिल जाते हैं। सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक बार बेल लगाने के बाद यह कई वर्षों तक फल देती रहती है।

मिट्टी और खेत का चुनाव

ककोड़ा की खेती के लिए हालांकि किसी भी प्रकार की मिट्टी अनुकूल हो सकती है, लेकिन सर्वोत्तम परिणाम के लिए दोमट या रेतीली दोमट मिट्टी को सबसे बेहतर माना गया है। चूँकि यह एक बेलदार सब्जी है, इसलिए इसे जमीन से ऊपर उठाकर रखना अनिवार्य है। इसके लिए मचान या रस्सियों का सहारा लिया जाता है। प्रबंधन में इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि खेत में जलभराव की स्थिति न बने, अन्यथा फसल में सड़न पैदा हो सकती है, जिससे उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है और पूरी बेल के नष्ट होने का खतरा बना रहता है।

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बुवाई और खाद का प्रबंधन

इस फसल की बुवाई जून और जुलाई के महीनों में की जाती है। खेत की तैयारी के लिए सबसे पहले गहरी जुताई करना आवश्यक है। इसके बाद पौधों के बीच डेढ़ से दो मीटर की दूरी रखते हुए छोटे गड्ढे तैयार किए जाते हैं। इन गड्ढों में बुवाई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद के साथ-साथ यूरिया या NPK जैसे उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। इससे शुरुआती अवस्था में ही पौधे को पर्याप्त पोषण मिलता है और आगे चलकर फल देने की क्षमता बढ़ जाती है। जैविक खाद का संतुलित उपयोग फसल के उत्पादन को और अधिक शानदार बनाता है।

पौधों का चुनाव और तकनीक

ककोड़ा उत्पादन में नर और मादा पौधों का संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक विधि के अनुसार, 7 से 8 मादा पौधों के साथ 1 नर पौधा लगाना अनिवार्य होता है, जिससे परागण प्रक्रिया बेहतर हो सके। कई अनुभवी किसान बीजों के स्थान पर पुराने कंद का उपयोग करना पसंद करते हैं, जिससे फसल जल्दी तैयार हो जाती है। इस फसल में बहुत कम देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन अच्छी पैदावार से बाजार में ऊंचा मुनाफा निश्चित मिलता है।

देखभाल और कीट नियंत्रण

बेल को जमीन से ऊपर रखने के लिए मचान, तार या रस्सी का उपयोग करना चाहिए ताकि फल जमीन के संपर्क में न आएं और सड़न से बचे रहें। मानसून के दौरान बारिश होने से सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम रहती है। हालांकि, ककोड़े में फल मक्खी का प्रकोप हो सकता है, जो फल के अंदर छेद कर उसे खराब कर देती है। इससे बचाव के लिए किसान फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल कर सकते हैं या कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर सही कीटनाशकों का छिड़काव करना प्रभावी रहता है।

तुड़ाई का सही समय

बुवाई के बाद मात्र डेढ़ से दो महीने के भीतर ही फसल में फूल और फल आने लगते हैं। जब फल गहरे हरे रंग के हो जाएं और छूने पर नरम महसूस हों, तब उनकी तुड़ाई करना सबसे उचित है। यदि फल जरूरत से ज्यादा पक जाएं और पीले पड़ने लगें, तो बाजार में उनकी कीमत गिर जाती है। इसलिए दो से तीन दिन के अंतराल पर निरंतर तुड़ाई करते रहना चाहिए। कम निवेश में अधिक मुनाफा कमाने के इच्छुक किसानों के लिए यह फसल आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद साबित हो रही है।

सवाल-जवाब

ककोड़े की खेती के लिए सबसे अच्छी मिट्टी कौन सी है?
ककोड़े की खेती के लिए दोमट या रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
ककोड़े के पौधे की तुड़ाई कब करनी चाहिए?
जब फल गहरे हरे रंग के और नरम हों, तब उनकी तुड़ाई करनी चाहिए, जो बुवाई के डेढ़ से दो महीने बाद शुरू हो जाती है।
ककोड़े में लगने वाले प्रमुख कीट से बचाव कैसे करें?
इसमें सबसे प्रमुख कीट फल मक्खी है, जिससे बचने के लिए फेरोमोन ट्रैप का उपयोग या कीटनाशकों का छिड़काव किया जा सकता है।
क्या ककोड़े की फसल को अधिक पानी की जरूरत होती है?
नहीं, बारिश के दौरान इसकी सिंचाई की जरूरत काफी कम होती है, लेकिन खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए।

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