देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंध संस्थानों यानी आईआईएम से एमबीए की पढ़ाई करने की चाहत रखने वाले लाखों युवा प्रतिवर्ष कॉमन एडमिशन टेस्ट में हिस्सा लेते हैं। तैयारी के दौरान अधिकतर छात्र इस उलझन में रहते हैं कि बेहतर परसेंटाइल हासिल करने के लिए रोजाना कितने घंटे मेज-कुर्सी पर बिताने चाहिए और कितने मॉक टेस्ट हल करने जरूरी हैं। कोचिंग क्लास से लेकर सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों तक सिर्फ अध्ययन के घंटों और संदर्भ पुस्तकों की भरमार पर ही बहस चलती रहती है। हालांकि इन सब चर्चाओं के बीच सबसे बुनियादी पहलू यह समझना है कि अभ्यर्थी इस इम्तिहान में पहली मर्तबा बैठ रहा है या फिर वह अपने पुराने अनुभव के साथ दोबारा अपनी किस्मत आजमा रहा है।
शुरुआती दौर के अभ्यर्थी और पहले परीक्षा दे चुके रिपीटर्स की तैयारी के तौर-तरीके, उनके सामने आने वाली चुनौतियां और मानसिक दबाव बिल्कुल अलग होते हैं। एक ही ढर्रे पर बनी योजना दोनों श्रेणियों के छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी साबित नहीं हो सकती। यदि किसी रणनीति के बिना दोनों वर्ग एक ही लकीर पर चलेंगे, तो दिन-रात की कड़ी मेहनत के बाद भी वांछित परिणाम तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाएगा। रोधा के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रवि प्रकाश के अनुसार कैट 2026 की योजना बनाते समय दोनों वर्गों को अपनी अलग प्राथमिकताओं की पहचान करनी होगी।
शुरुआती उम्मीदवारों को शॉर्टकट छोड़कर बुनियादी सिद्धांतों को समझना होगा
इस प्रतियोगी दौड़ में पहली बार शामिल हो रहे युवाओं के लिए सबसे आवश्यक सुझाव यही है कि वे किसी भी तरह की जल्दबाजी से बचें और सबसे पहले बुनियादी सिद्धांतों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाएं। अमूमन देखने में आता है कि नए छात्र शुरुआत में ही पाठ्यक्रम की विशाल पुस्तकों और अत्यधिक जटिल प्रश्नों को देखकर घबरा जाते हैं। इस घबराहट के कारण कई छात्र सीधे शॉर्टकट और ट्रिक्स के पीछे दौड़ना शुरू कर देते हैं। हकीकत यह है कि यदि प्रतिशत अथवा अनुपात जैसे प्राथमिक गणितीय कॉन्सेप्ट स्पष्ट नहीं हैं, तो केवल जटिल सूत्रों को रटने से इस कठिन परीक्षा को पार नहीं किया जा सकता।
पहली बार परीक्षा दे रहे प्रतिभागियों को पाठ्यक्रम के प्रत्येक अध्याय की गहराई में उतरना चाहिए। विभिन्न प्रकार की प्रश्न संरचनाओं को समय रहते पहचानना और एक निर्धारित समयसीमा के भीतर उन्हें सटीक तरीके से हल करने का अभ्यास विकसित करना उनके लिए प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए। इस शुरुआती पड़ाव पर मॉक टेस्ट का उद्देश्य बहुत अधिक अंक बटोरना नहीं होता, बल्कि अपनी वास्तविक कमजोरियों और अनसुलझे पहलुओं को उजागर करना होता है। यदि पहले या दूसरे मॉक टेस्ट में स्कोर कम भी रह जाए, तो हताश होने की बजाय उसका तार्किक विश्लेषण करना चाहिए। छात्र को यह परखना चाहिए कि प्रश्न को समझने में चूक हुई, सही सूत्र याद नहीं आया या फिर समय प्रबंधन बिगड़ने से प्रश्न छूट गए।
दोबारा प्रयास करने वाले अभ्यर्थियों को पुराने प्रदर्शन के विश्लेषण पर देना होगा जोर
जो उम्मीदवार पहले इस इम्तिहान का अनुभव ले चुके हैं, उनकी कार्ययोजना नए छात्रों की तुलना में पूरी तरह अलग दिशा में बढ़नी चाहिए। ऐसे अभ्यर्थियों को पूरे पाठ्यक्रम की रूपरेखा पहले से मालूम होती है और वे परीक्षा केंद्र के अत्यधिक मानसिक दबाव का सामना भी कर चुके होते हैं। ऐसे में पूरी पाठ्यसामग्री को नए सिरे से शुरू से अंत तक दोबारा पढ़ना सिर्फ बहुमूल्य समय को नष्ट करना होगा। रोधा के संस्थापक और सीईओ रवि प्रकाश के मुताबिक दोबारा परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थियों को अपने पुराने परीक्षा रिकॉर्ड और हालिया मॉक टेस्ट के नतीजों का बारीक मूल्यांकन करना चाहिए।
रिपीटर्स को गहराई से यह देखना चाहिए कि पिछले प्रयास में किन प्रश्नों पर आवश्यकता से अधिक वक्त बर्बाद हुआ था। इसके साथ ही यह भी चिन्हित करना जरूरी है कि क्या कोई विशेष खंड लगातार कुल परसेंटाइल को नीचे गिरा रहा था। जब कमजोरी का सटीक दायरा पकड़ में आ जाता है, तब केवल उन्हीं कमजोर कड़ियों को सुधारने पर पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे पिछले साल हुई गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।
परीक्षा कक्ष में त्वरित निर्णय और मानसिक सजगता से तय होगी सफलता
अभ्यर्थी चाहे पहली बार इम्तिहान में बैठ रहा हो या फिर दोबारा प्रयास कर रहा हो, अंतिम सफलता इस बात पर टिकी होती है कि परीक्षा कक्ष में छात्र की निर्णय क्षमता और मानसिक संतुलन कैसा रहता है। पहली बार शामिल हो रहे छात्रों के लिए यह पूरी यात्रा अपनी खूबियों और कमियों को बारीकी से तलाशने का एक बड़ा अवसर है। दूसरी तरफ, दोबारा बैठने वाले छात्र अपने पुराने अनुभवों के आधार पर चिन्हित कमियों को दुरुस्त करके अपने प्रदर्शन को निखार सकते हैं। दोनों ही तरह के परीक्षार्थियों के पास पुस्तकें और अध्ययन सामग्री अमूमन एक जैसी ही होती हैं, लेकिन फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन सा अभ्यर्थी उनका बुद्धिमानी से इस्तेमाल करता है। वास्तविक प्रगति केवल अनगिनत मॉक टेस्ट हल करने से नहीं, बल्कि उनके सही समय प्रबंधन और विस्तृत विश्लेषण से ही संभव होती है।



















