वैश्विक उच्च शिक्षा विश्लेषक संस्था क्यूएस क्वाक्वेरेली साइमंड्स ने अपनी ताजा क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 जारी कर दी है। इस नवीनतम सूची के आंकड़ों ने देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे परिसरों को शिक्षा और अनुसंधान के सर्वोच्च स्तंभ के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद एशिया स्तर की इस महत्वपूर्ण मूल्यांकन सूची के शुरुआती पचास पायदानों में देश के एक भी संस्थान का नाम शामिल नहीं हो सका है।
दिलचस्प पहलू यह है कि यह लगातार दूसरा ऐसा वर्ष है जब भारत का कोई भी उच्च शिक्षा संस्थान इस प्रतिष्ठित सूची के शीर्ष पचास स्थानों में जगह बनाने में नाकाम रहा है। देश की तरफ से इस सूची में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली भी इस बार फिसलकर छियासठवें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले वर्ष इसी संस्थान को इस तालिका में उनसठवां स्थान प्राप्त हुआ था, जिसका मतलब है कि इस बार इसकी स्थिति में भी गिरावट दर्ज की गई है।
केवल आईआईटी दिल्ली ही नहीं बल्कि भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु समेत देश के तमाम छह सबसे बड़े और अग्रणी संस्थानों के प्रदर्शन में भी गिरावट आई है। हालांकि एक तरफ जहां इन नामी संस्थानों की रैंकिंग नीचे आई है, वहीं दूसरी तरफ सूची में कुल भारतीय विश्वविद्यालयों की संख्या के मोर्चे पर एक सकारात्मक तस्वीर भी सामने आई है। इस साल इस प्रतिष्ठित रैंकिंग में शामिल होने वाले भारतीय परिसरों की कुल संख्या पिछले साल के दो सौ चौदह से बढ़कर अब तीन सौ पच्चीस तक पहुंच गई है।
इस उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ ही भारत एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा शिक्षण संस्थानों की मौजूदगी के मामले में दूसरे पायदान पर काबिज हो गया है। इस ताज़ा सूची में देश के चौंतीस नए संस्थान भी शामिल किए गए हैं जो यह दर्शाता है कि उच्च शिक्षा के दायरे का विस्तार तेजी से हो रहा है। इस प्रकार एक तरफ जहां देश के प्रमुख और स्थापित संस्थानों की रैंकिंग में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ कुल संस्थानों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा दर्ज किया जा रहा है।
प्रमुख संस्थानों का गिरता हुआ पायदान
संस्थानवार विश्लेषण किया जाए तो देश के दूसरे शीर्ष उच्च शिक्षा केंद्रों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही निराशाजनक नजर आती है। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु पिछले मूल्यांकन में चौंसठवें स्थान पर काबिज था, जो इस बार खिसककर उनासीवें नंबर पर जा पहुंचा है। इसी तरह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे की स्थिति भी प्रभावित हुई है और इसकी रैंकिंग इकहत्तर से गिरकर तिरासी हो गई है। मद्रास स्थित संस्थान सत्तरवें से पिछड़कर पचासीवें स्थान पर आ गया है, जबकि खड़गपुर का संस्थान सतहत्तरवें से नब्बेवें नंबर पर पहुंच गया है। कानपुर के तकनीकी संस्थान को भी सतहत्तरवें स्थान से फिसलकर निन्यानवेवें पायदान पर संतोष करना पड़ा है। इस तरह देश के सभी छह अग्रणी संस्थानों के रैंकिंग स्कोर में साफ तौर पर गिरावट आई है।
देश के सबसे प्रतिष्ठित पारंपरिक विश्वविद्यालयों में शुमार दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थिति भी इस बार काफी कमजोर नजर आई है। पिछले वर्ष यह विश्वविद्यालय एशिया महाद्वीप में पचानवेवें पायदान पर था, लेकिन इस बार यह लुढ़ककर एक सौ छठे स्थान पर जा पहुंचा है। इस गिरावट के चलते दिल्ली विश्वविद्यालय अब एशिया के शीर्ष सौ संस्थानों की सूची से पूरी तरह बाहर हो चुका है। हालांकि यह भी सच है कि देश के सभी परिसरों की रैंकिंग नहीं गिरी है क्योंकि कुछ ने अच्छा प्रदर्शन भी किया है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया उन चुनिंदा संस्थानों में शामिल हैं जिन्होंने इस बार अपनी रैंकिंग में सुधार दर्ज किया है।
एशियाई सूची में भारतीय संस्थानों की संख्या में भारी उछाल
संस्था की ओर से जारी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस एशियाई रैंकिंग में जगह पाने वाले भारतीय संस्थानों की तादाद में जबरदस्त तेजी आई है। साल 2016 के दौर की बात करें तो इस विशेष सूची में भारत के मात्र चौबीस संस्थान ही अपनी जगह बना पाए थे। अब यह आंकड़ा बढ़कर सीधे तीन सौ पच्चीस तक पहुंच चुका है, जिसका मतलब है कि लगभग दस वर्षों के भीतर भारतीय परिसरों की संख्या में तेरह गुना से अधिक की भारी बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2016 से लेकर अब तक इस संख्या में बारह सौ पचास प्रतिशत से भी ज्यादा का अभूतपूर्व उछाल देखा गया है। आंकड़ों के हिसाब से आकलन किया जाए तो औसतन हर साल करीब सत्ताईस प्रतिशत की तेज दर से भारतीय संस्थानों की मौजूदगी इस सूची में बढ़ी है। इस मोर्चे पर भारत ने एशिया महाद्वीप के अन्य बड़े उच्च शिक्षा तंत्रों को पीछे छोड़ दिया है। इसी समान अवधि के दौरान अगर तुलना करें तो चीन के संस्थानों की संख्या में लगभग तीन सौ पंद्रह प्रतिशत, इंडोनेशिया में एक सौ चौसठ प्रतिशत, जापान में चौंतालीस प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में केवल तीस प्रतिशत की ही वृद्धि दर्ज की गई है।
शोध के मोर्चे पर भारत की मजबूत स्थिति
भले ही प्रमुख परिसरों की रैंकिंग में गिरावट आई हो लेकिन रिपोर्ट के कुछ दूसरे पहलू देश के लिए काफी उत्साहजनक हैं। शोध उत्पादन यानी प्रति फैकल्टी सदस्य की दर से प्रकाशित होने वाले शोध पत्रों के मामले में भारत पूरे एशिया महाद्वीप में सबसे आगे खड़ा है। इस पैमाने के आधार पर देश के सत्ताईस विश्वविद्यालय इस श्रेणी के एशिया के शीर्ष पचास संस्थानों में अपना स्थान बनाने में सफल रहे हैं। इनमें से पांच विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो सीधे शीर्ष दस में शामिल हैं और दो ने तो शीर्ष पांच संस्थानों के भीतर अपनी मजबूत जगह बनाई है।
इसके अलावा अकादमिक और शोध से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पैमाने पर भी भारत की स्थिति काफी सुदृढ़ नजर आती है। पीएचडी की योग्यता रखने वाले शिक्षकों यानी ऐसे प्राध्यापकों जिनके पास डॉक्टरेट की आधिकारिक उपाधि है, के अनुपात के मामले में भारत के पंद्रह विश्वविद्यालय एशिया भर में संयुक्त रूप से पहले पायदान पर हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में उच्च योग्यताधारी और शोध कार्यों में माहिर फैकल्टी सदस्यों की एक अच्छी खासी तादाद मौजूद है, जो आने वाले समय में शिक्षण की गुणवत्ता को और बेहतर कर सकती है।


















