छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के रघुनाथ पैलेस परिसर में स्थित राधावल्लभ मंदिर अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विशिष्टता के लिए जाना जाता है। यह प्राचीन मंदिर करीब दो सौ से ढाई सौ वर्ष पुराना माना जाता है और इसकी बनावट उत्तर प्रदेश के वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिरों की तर्ज पर तैयार की गई है। इस ऐतिहासिक स्थल की दीवारों पर भगवान श्री कृष्ण के जन्म से लेकर उनकी बाल लीलाओं तक के प्रसंगों को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। राजपरिवार के इस प्राचीन तीर्थ स्थल का निर्माण तत्कालीन महाराज रामानुजशरण सिंह देव की माताजी यानी राजमाता ने करवाया था, जिनकी गहरी आस्था इस परिसर से जुड़ी हुई थी। आज भी कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक विधि-विधान के साथ यहां पूजा-अर्चना करते हैं और दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
वृंदावन के कारीगरों ने तैयार की थी अनूठी संरचना
सरगुजा राजपरिवार के राजकुमार आदि बाबा के अनुसार, रघुनाथ पैलेस के भीतर बना यह राधावल्लभ मंदिर राजपरिवार की प्राचीन धार्मिक धरोहर का अहम हिस्सा है। इस मंदिर के निर्माण कार्य को अमलीजामा पहनाने के लिए विशेष रूप से वृंदावन से कुशल कारीगरों को बुलाया गया था ताकि उत्तर की स्थापत्य कला की झलक छत्तीसगढ़ की इस भूमि पर भी उतर सके। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ी विभिन्न बाल लीलाओं को चित्रों और कलात्मक आकृतियों के माध्यम से जीवंत किया गया है। यही वजह है कि जन्माष्टमी के महापर्व पर इस स्थान का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए कई इलाकों से लोग पहुंचते हैं।
राजमाता ने मंदिर के समीप कुटिया में बिताए थे जीवन के अंतिम वर्ष
राजकुमार आदि बाबा ने जानकारी दी कि तत्कालीन महाराज रामानुजशरण सिंह देव की माताजी, जो उस दौर में राजमाता थीं, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सांसारिक मोहमाया त्यागकर संन्यास का मार्ग चुन लिया था। उन्होंने मंदिर के बिल्कुल समीप एक साधारण कुटिया का निर्माण करवाया और अपने जीवन का बाकी वक्त वहीं आध्यात्मिक साधना में व्यतीत किया। राजमाता के इस समर्पण के कारण इस मंदिर का जुड़ाव राजपरिवार की आस्था और धार्मिक परंपराओं से और भी गहराई से स्थापित हो गया। उनकी स्मृति और त्याग से जुड़ी यह कुटिया आज भी इस ऐतिहासिक परिसर की गाथा का एक प्रमुख हिस्सा मानी जाती है.
मध्य रात्रि को होगा भव्य जन्मोत्सव और विशेष अनुष्ठान
जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर के भीतर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। रात के ठीक 12 बजते ही भगवान श्री कृष्ण के प्रकटोत्सव का जश्न मनाया जाएगा, जिसके तहत विशेष पूजा, आरती और आराध्य को झूला झुलाने की परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। इस मध्य रात्रि की मुख्य पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजपरिवार के सदस्य मुख्य रूप से शामिल होते हैं और अपनी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि, आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के द्वार पूरी तरह खुले रखे जाते हैं ताकि सरगुजा के अलग-अलग कोनों से आने वाले भक्त भगवान राधा-कृष्ण के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांग सकें.
महिलाओं और पुरुषों के लिए तय किए गए भजन-कीर्तन के समय
मंदिर के पुजारी राम नरेश द्विवेदी ने बताया कि राधावल्लभ मंदिर राजपरिवार द्वारा स्थापित एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल है जहां नियमित रूप से राधा-कृष्ण की आराधना की जाती है। जन्माष्टमी के उत्सव को लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा और अनुशासन के लिए भजन-कीर्तन के समय निर्धारित किए गए हैं। पर्व के दिन शाम 4 बजे से लेकर 6:30 बजे तक विशेष रूप से महिलाओं द्वारा भजन-कीर्तन प्रस्तुत किए जाएंगे। इसके पश्चात शाम 6:30 बजे से लेकर रात करीब 9:30 से 10 बजे तक पुरुषों के लिए भजन-कीर्तन का आयोजन तय किया गया है, जिसमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.
सफेद संगमरमर से गढ़ी गई हैं मनमोहक प्रतिमाएं
पुजारी राम नरेश द्विवेदी के अनुसार, मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं बेहद सुंदर और शुद्ध सफेद संगमरमर के पत्थरों से तराश कर बनाई गई हैं। इन प्रतिमाओं की दैनिक रूप से विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। जन्माष्टमी के पावन पर्व पर इन मूर्तियों का विशेष शृंगार किया जाता है और पारंपरिक अनुष्ठानों के जरिए जन्मोत्सव का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। संगमरमर की चमक और मंदिर की प्राचीन कलाकृतियां आने वाले हर शख्स को अपनी ओर आकर्षित करती हैं.
धनिया चूर्ण और चरणामृत का विशेष प्रसाद
राधावल्लभ मंदिर में जन्माष्टमी के पर्व पर मिलने वाले प्रसाद की अपनी एक अनूठी परंपरा है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को विशेष रूप से धनिया चूर्ण का प्रसाद, पवित्र चरणामृत और ताजे फलों का वितरण किया जाता है। इस खास प्रसाद को ग्रहण करने के लिए पर्व के दिन मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं और भारी भीड़ उमड़ती है। हर वर्ष की भांति इस बार भी जन्माष्टमी पर मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि दर्शनार्थियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो.
मटकी फोड़ आयोजन और सांस्कृतिक धरोहर की पहचान
धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत मंदिर परिसर में इस बार भी मटकी फोड़ प्रतियोगिता और हर्षोल्लास भरे आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई है। दिनभर मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहने की पूरी उम्मीद है। यह राधावल्लभ मंदिर महज पूजा-अर्चना का एक सामान्य केंद्र भर नहीं है, बल्कि यह सरगुजा राजपरिवार की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं, उत्कृष्ट वास्तुकला और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट भक्तिभाव से जुड़ी एक जीवंत ऐतिहासिक धरोहर के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान संजोए हुए है।





















