एशियाई खेलों के मंच पर क्रिकेट प्रतियोगिता एक बार फिर तकनीकी और बुनियादी सुविधाओं की गंभीर कमी से जूझ रही है। जापान की धरती पर आयोजित हो रही इस बहु-खेल स्पर्धा में मैचों से अधिक चर्चा मैदान के बाहर की गतिविधियों और रद्द हो रहे मुकाबलों की है। भारतीय पुरुष टीम समेत अन्य प्रतिस्पर्धी टीमें मैदान पर उतरने के बजाय स्थानीय स्तर पर सैर-सपाटा करती और राजदूत के आवास पर आयोजित स्वागत समारोह में तस्वीरें खिंचवाती नजर आईं। जिस जापान को दुनिया भर में गुणवत्ता और तकनीकी उत्कृष्टता के लिए जाना जाता रहा है, वहां क्रिकेट के लिए न्यूनतम इंतजामों का अभाव सीधे तौर पर खेल की प्रतिष्ठा पर असर डाल रहा है। असली चिंता इस बात की है कि क्या इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को उचित प्रशासनिक गंभीरता के साथ आयोजित किया जा रहा है।
मैच रद्द और रैंकिंग के सहारे सेमीफाइनल का सफर
पुरुष वर्ग की स्पर्धा में स्थिति बेहद निराशाजनक रही, जहां क्वार्टरफाइनल मुकाबला निर्धारित समय से महज 16 मिनट पहले रद्द घोषित कर दिया गया। मैदान पर न तो टॉस कराया जा सका और न ही एक भी गेंद फेंकी गई, लेकिन इसके बावजूद भारतीय पुरुष टीम सीधे सेमीफाइनल में पहुंच गई। ठीक इसी प्रकार पाकिस्तान की टीम भी उसी दिन बिना कोई खेल दिखाए आगे के दौर में पहुंच गई। दूसरी ओर, महिला वर्ग में कुछ मुकाबले खेले गए जहां भारतीय महिला टीम ने तीन मैच खेलकर तीनों में जीत दर्ज की और देश के लिए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस अभियान में भारत ने जापान को 8 विकेट से पराजित किया, जबकि बांग्लादेश के खिलाफ शैफाली वर्मा की नाबाद शतकीय पारी की बदौलत 114 रन से बड़ी जीत हासिल की। इसके बाद फाइनल में श्रीलंका को 147 रन के भारी अंतर से रौंदकर खिताब जीता। हालांकि, पूरी प्रतियोगिता की संरचना पर नजर डालें तो आठ टीमों के बीच बिना किसी लीग चरण के सीधा नॉकआउट रखा गया था, जहां महज तीन मैच खेलकर एक टीम महाद्वीप की चैंपियन बन गई।
रिज़र्व डे का अभाव और पुराने नियमों की पुनरावृत्ति
इस बड़े टूर्नामेंट में बारिश या खराब मौसम से निपटने के लिए कोई रिज़र्व डे निर्धारित नहीं किया गया है। वर्तमान नियमों के तहत जब भी कोई नॉकआउट मैच रद्द होता है, तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी ICC की T20 रैंकिंग में बेहतर स्थान वाली टीम को विजेता मानकर आगे बढ़ा दिया जाता है। चूंकि भारत रैंकिंग में शीर्ष पायदान यानी नंबर एक पर काबिज है और विपक्षी अफगानिस्तान दसवें पायदान पर था, इसलिए दोनों टीमों के बीच मुकाबला मैदान पर लड़े बिना ही कागजों पर तय हो गया। यह अजीबोगरीब स्थिति पहली बार देखने को नहीं मिली है। साल 2023 में चीन के हांगझोउ में आयोजित एशियाई खेलों के दौरान भी भारत और अफगानिस्तान का फाइनल मुकाबला बारिश की भेंट चढ़ गया था, जिसके बाद उच्च रैंकिंग के बूते भारत को स्वर्ण पदक दिया गया था। उसी वर्ष महिला वर्ग में भी मलेशिया के खिलाफ क्वार्टरफाइनल बारिश से धुल गया था और भारत सीधे सेमीफाइनल में प्रवेश कर गया था। मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए यह आशंका हमेशा बनी रहती है कि कोई टीम बिना कोई गेंद खेले भी चैंपियन बन सकती है।
बहु-खेल आयोजनों में क्रिकेट की ऐतिहासिक उपेक्षा
एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे बड़े बहु-खेल आयोजनों में क्रिकेट का इतिहास हमेशा से अनिश्चितताओं और आधी-अधूरी योजनाओं से भरा रहा है। एशियाई खेलों में क्रिकेट को शामिल किए जाने का यह चौथा अवसर है, इससे पहले यह खेल 2010, 2014 और 2023 के आयोजनों में शामिल था। शुरुआती दो संस्करणों में भारत ने अपनी कोई टीम ही नहीं भेजी थी। वर्ष 2010 में बांग्लादेश और 2014 में श्रीलंका की पुरुष टीमें चैंपियन बनी थीं, जबकि दोनों ही बार अफगानिस्तान की टीम उपविजेता रही थी। भारत ने पहली बार 2023 के संस्करण में अपनी टीमें उतारीं और महिला व पुरुष दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक अपने नाम किए। कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेलों की बात करें तो वहां क्रिकेट की मौजूदगी और भी दुर्लभ रही है। वर्ष 1998 में कुआलालंपुर में 16 टीमों के साथ 50 ओवर का पुरुष टूर्नामेंट कराया गया था, जिसमें शॉन पोलॉक के नेतृत्व वाले दक्षिण अफ्रीका ने स्टीव वॉ की कप्तानी वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम को मात देकर स्वर्ण जीता था।
प्रारूप में सुधार और बुनियादी सुविधाओं की दरकार
कुआलालंपुर के बाद पूरे 24 वर्षों तक राष्ट्रमंडल खेलों में क्रिकेट पूरी तरह नदारद रहा। इसके बाद वर्ष 2022 में बर्मिंघम खेलों में महिला T20 प्रारूप के साथ इसकी वापसी हुई, जहां ऑस्ट्रेलिया ने स्वर्ण पदक, भारत ने रजत पदक और न्यूजीलैंड ने कांस्य पदक जीता था। हालांकि, यह सफर लंबा नहीं खिंच सका और वर्ष 2026 में होने वाले ग्लासगो खेलों से खर्चों में कटौती करने की योजना के तहत क्रिकेट को एक बार फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि बड़े मंचों पर क्रिकेट आज भी एक स्थायी खेल बनने के बजाय केवल एक अतिथि खेल बनकर रह गया है। शैफाली वर्मा का आक्रामक शतक और 147 रनों की विशाल जीत यह साबित करती है कि जब भी खिलाड़ियों को मौका मिलता है, खेल का स्तर ऊंचा रहता है। नाकामी दरअसल उस व्यवस्था और प्रारूप की है जो महज तीन मैचों में महाद्वीपीय खिताब बांट देता है और जहां मैदान पर कवर्स या ग्राउंड स्टाफ न होने से गेंद फेंके बिना मैच खत्म हो जाते हैं। दर्शकों को मैदान पर बल्ले और गेंद का संघर्ष चाहिए, न कि रैंकिंग शीट से निकले नतीजे। भविष्य के आयोजनों के लिए आयोजकों को पर्याप्त कवर्स, प्रशिक्षित ग्राउंड स्टाफ और रिज़र्व डे सुनिश्चित करने होंगे, अन्यथा ऐसे मौसम में खेल का आयोजन कराने की सार्थकता ही समाप्त हो जाती है।

















