क्रिकेट के इतिहास में कुछ ऐसी दास्तानें दर्ज हैं जो केवल स्कोरबोर्ड के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बन जाती हैं। दिसंबर 1959 में कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम की नमी से भरी और गीली पिच पर भारतीय क्रिकेट के पन्नों में एक ऐसा अध्याय जुड़ा जिसने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रतिद्वंद्विता की नींव को पूरी तरह से बदल दिया। यह कहानी थी जसुभाई मोतीभाई पटेल नाम के पैंतीस वर्षीय ऑफ-स्पिनर की, जिन्हें अंतिम समय पर टीम का हिस्सा बनाया गया था और जिन्होंने अपने बेजोड़ कौशल से उस दौर की अजेय मानी जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम के गुरूर को तोड़ दिया था।
कठिन परिस्थितियों में मिला मौका
उस समय ऑस्ट्रेलियाई टीम को दुनिया की सबसे खतरनाक टीमों में गिना जाता था और भारतीय टीम को उनके खिलाफ मैदान पर काफी संघर्ष करना पड़ता था। श्रृंखला का पहला टेस्ट मैच दिल्ली में खेला गया था जिसमें भारत को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इसके बाद कानपुर के मैच में भी हालात कुछ वैसे ही बनते दिख रहे थे, जिससे खेल विशेषज्ञ और दर्शक एक और परिचित हार की आशंका जताने लगे थे। भारतीय टीम भारी दबाव में थी, लेकिन कप्तान जीएस रामचंद ने मुश्किल समय में अपने तरकश के एक छुपे हुए तीर यानी जसुभाई पटेल पर भरोसा जताया।
पहली पारी में नौ विकेट का जादुई कारनामा
जब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी अपनी पहली पारी खेलने मैदान पर उतरे, तब कानपुर की उस फिरकी अनुकूल पिच पर जसुभाई पटेल ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि मेहमान बल्लेबाज एक के बाद एक उसमें उलझते चले गए। जसुभाई पटेल ने अपने शानदार स्पेल में मात्र उनहत्तर रन खर्च करते हुए नौ बल्लेबाजों को पवेलियन की राह दिखाई। यह उस समय किसी भी भारतीय गेंदबाज की ओर से किया गया सबसे बेहतरीन गेंदबाजी प्रदर्शन था। ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज उनकी घूमती गेंदों को समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए। जसुभाई पटेल इतने पर ही नहीं थके और उन्होंने दूसरी पारी में भी अपना कहर जारी रखते हुए पांच और विकेट अपने नाम कर लिए।
मैच में चौदह विकेट और ऐतिहासिक जीत
पूरे मुकाबले में कुल चौदह विकेट झटककर जसुभाई पटेल ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रम की रीढ़ तोड़ कर रख दी। इस चमत्कारी प्रदर्शन के दम पर ही भारत ने ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध अपनी पहली ऐतिहासिक टेस्ट जीत हासिल की। क्रिकेट के इतिहासकार इस बात को मानते हैं कि अनिल कुंबले द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ दिल्ली में बनाए गए दस विकेट के रिकॉर्ड से पहले, यह भारतीय टेस्ट इतिहास का सबसे यादगार और महान गेंदबाजी प्रदर्शन था। यह मुकाबला केवल एक मैच जीतने भर की बात नहीं थी, बल्कि इसने भारतीय खेमे में यह आत्मविश्वास भर दिया था कि वे दुनिया की किसी भी मजबूत टीम को धूल चटा सकते हैं। वर्तमान समय में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली जाने वाली बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी जैसी कांटे की टक्कर का पहला महान भारतीय पल यही मुकाबला था।
रहस्यमयी तरीके से करियर का अंत
इस महान जीत के मुख्य नायक जसुभाई पटेल का अंतरराष्ट्रीय करियर इसके बाद ज्यादा लंबा नहीं चल सका। इस ऐतिहासिक मुकाबले के बाद उन्होंने महज दो और टेस्ट मैच खेले और उसके बाद उन्हें कभी दोबारा राष्ट्रीय टीम में नहीं बुलाया गया। हालांकि चयनकर्ताओं ने उन्हें आगे मौका नहीं दिया, लेकिन कानपुर के ग्रीन पार्क मैदान ने यह पक्का कर दिया कि जसुभाई पटेल का नाम इतिहास के पन्नों से कभी मिटाया नहीं जा सके। यह भारतीय खेल जगत के उन अनसुने चमत्कारों में से एक है जिसने खेल की पूरी दिशा को बदलकर रख दिया। जसुभाई पटेल भले ही बाद में चर्चा से दूर हो गए, लेकिन उनकी फिरकी का वह नायाब जादू आज भी खेल प्रेमियों के दिलों में पूरी तरह जीवंत है।



















