नेपाल की त्रिशूली घाटी में आए भीषण सैलाब और तबाही ने भारी तबाही मचाई, जिसमें हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगें मजदूरों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गईं। जब हर तरफ बर्बादी का मंज़र था और पारंपरिक रास्ते बंद हो चुके थे, तब इंजीनियरों और विशेषज्ञों का एक व्हाट्सएप ग्रुप जिंदगी बचाने का बड़ा जरिया बन गया। पांच सौ से ज्यादा सदस्यों वाले इस डिजिटल नेटवर्क ने रेस्क्यू टीमों को वो जानकारियां दीं जो उस वक्त किसी भी सरकारी नक्शे में उपलब्ध नहीं थीं। इसी तकनीक आधारित सहयोग के बल पर राहत टीमों ने नौ दिन बाद मलबे से दो लोगों को जीवित बाहर निकालने में सफलता हासिल की।
डिजिटल नेटवर्क और विशेषज्ञों की भूमिका
इस अनूठे व्हाट्सएप ग्रुप में विभिन्न क्षेत्रों के जानकार जुड़े हुए हैं। इसमें सिविल इंजीनियर, हाइड्रोपावर सेक्टर के पुराने कर्मचारी, नेपाल बिजली प्राधिकरण के अधिकारी और जियोटेक्निकल एक्सपर्ट्स शामिल हैं। जब बाढ़ के पानी ने त्रिशूली घाटी के भूभाग को पूरी तरह से बदल दिया और सुरंगों के रास्ते छिप गए, तब इस ग्रुप ने एक लाइव सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करना शुरू किया। जब भी राहत दल को किसी जगह की भौगोलिक स्थिति समझने में मुश्किल आती, वे इस ग्रुप में मदद मांगते थे और कुछ ही पलों में उन्हें सटीक दस्तावेज मिल जाते थे।
मिनटों में मिले सुरंगों के नक्शे
बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी अड़चन यह थी कि सुरंगों के भीतर का ढांचा कैसा है और उनके मुहाने कहां खुलते हैं। जब राहत दल चिलिमे हाइड्रोपावर प्लांट के पास पहुंचा, तो एक अधिकारी ने ग्रुप में मदद के लिए संदेश भेजा कि क्या किसी के पास वहां का लेआउट प्लान है। इसके कुछ ही पलों के भीतर ग्रुप से जुड़े एक व्यक्ति ने पावरहाउस, एक्सेस टनल और इमरजेंसी निकास के नक्शे उपलब्ध करा दिए। इसके अलावा, पुराने कर्मचारियों ने अपनी पुरानी याददाश्त और तजुर्बे के आधार पर यह अनुमान लगाया कि आपदा के वक्त मजदूरों ने किस हिस्से में शरण ली होगी।
नौ दिन बाद मिला ऐतिहासिक ब्रेकथ्रू
इस आपदा के बाद सुरंगों की बनावट में भारी बदलाव आ चुका था और उनके अंदर लाखों टन कीचड़ व चट्टानें जमा हो चुकी थीं। इसके बावजूद, इस डिजिटल समूह से मिली जानकारियों के सहारे बचाव दलों ने अपर त्रिशूली 3A प्रोजेक्ट की सुरंग तक पहुंचने का रास्ता ढूंढ लिया। घटना के नौ दिन बाद शुक्रवार को इसी सुरंग के भीतर से दो कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जिनकी पहचान तीस वर्षीय संजय शाह और पैंतालीस वर्षीय कबीर महर्जन के रूप में हुई। इस चमत्कारिक बचाव कार्य ने यह साबित कर दिया कि सही समय पर सटीक जानकारी मिलने से कितनी बड़ी जानें बचाई जा सकती हैं।
बचाव कार्यों में तकनीकी और मानवीय सहयोग
इस ग्रुप का दायरा केवल नक्शे साझा करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए सुरंगों के अंदर ऑक्सीजन पाइप पहुंचाने की व्यवस्था में भी मदद ली गई। इसके साथ ही लापता हुए कर्मचारियों के फोन नंबर और उनकी आखिरी लोकेशन को टेलीकॉम अथॉरिटी के साथ साझा किया जा रहा है। रसुवागढ़ी प्रोजेक्ट के भीतर फंसे सैंतालीस अन्य कामगारों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए भी इसी समूह से लगातार तकनीकी राय ली जा रही है। भारी मशीनों और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर काम कर रहा यह व्हाट्सएप ग्रुप नेपाल के इस आपदा प्रबंधन अभियान में एक मजबूत डिजिटल हथियार साबित हो रहा है।


















