भारतीय क्रिकेट में एक बड़ा बदलाव होता दिख रहा है और इसका सीधा असर सीनियर ऑलराउंडर रवींद्र जडेजा के वनडे भविष्य पर पड़ सकता है. सालों तक अपने बल्ले, गेंद और शानदार फील्डिंग से टीम इंडिया को कई अहम जीत दिलाने वाले जडेजा अब शायद वनडे क्रिकेट के मैदान पर दोबारा नीली जर्सी में नजर न आएं. मुख्य चयन समिति ने आगामी वनडे वर्ल्ड कप को ध्यान में रखते हुए अपनी सोच लगभग साफ कर ली है और अब वह जडेजा की जगह अक्षर पटेल को टीम के मुख्य स्पिन-गेंदबाजी ऑलराउंडर के तौर पर आगे बढ़ाना चाहती है. यह फैसला अचानक नहीं आया, बल्कि पिछले कुछ समय से टीम कॉम्बिनेशन में हो रहे बदलाव, कुलदीप यादव की भूमिका को लेकर चल रहे मंथन और खुद जडेजा के हाल के औसत प्रदर्शन का सामूहिक नतीजा है.
210 वनडे मैचों का लंबा अनुभव रखने वाले रवींद्र जडेजा का सफेद गेंद का सफर अब अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंचता दिख रहा है. इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी और तात्कालिक वजह अक्षर पटेल का लगातार निखरता प्रदर्शन है, जिसने बीते कुछ मैचों में चयनकर्ताओं का भरोसा तेजी से जीता है.
बर्मिंघम में अक्षर के दमदार खेल ने बदला समीकरण
बर्मिंघम में इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए सीरीज के पहले वनडे मुकाबले में अक्षर पटेल ने अपने ऑलराउंड खेल से पूरी महफिल लूट ली और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया. उन्होंने पहले गेंदबाजी में अपनी फिरकी का जादू बिखेरते हुए 62 रन देकर 4 विकेट झटके, जो उनके वनडे करियर का अब तक का सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी प्रदर्शन है. इसके बाद जब टीम को रन चेज के दौरान एक समझदार और संभली हुई पारी की दरकार थी, तब अक्षर ने बल्ले से भी कमाल दिखाया और नाबाद अर्धशतक जड़कर भारत को छह विकेट की आसान जीत दिला दी. गेंद और बल्ले दोनों से आई इस दोहरी झलक ने चयनकर्ताओं के भरोसे को और पुख्ता कर दिया कि अक्षर अब टीम में बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
टीम कॉम्बिनेशन बदला, कुलदीप यादव को झेलनी पड़ रही बेंच
पिछले कुछ समय में भारतीय टीम प्रबंधन की रणनीति में भी साफ बदलाव देखने को मिला है. खासकर विदेशी पिचों पर, जैसे मौजूदा इंग्लैंड दौरे में, टीम इंडिया बिना किसी विशेषज्ञ फ्रंटलाइन स्पिनर के मैदान में उतर रही है. इसका सीधा असर यह हुआ है कि बेहतरीन फॉर्म में होने के बावजूद चाइनामैन गेंदबाज कुलदीप यादव को लगातार बेंच पर बैठकर वक्त गुजारना पड़ रहा है.
टीम प्रबंधन कुलदीप को अंतिम एकादश में शामिल करने से बच रहा है, क्योंकि वह निचले क्रम में बल्लेबाजी का कोई खास विकल्प नहीं देते. स्पिन-गेंदबाजी ऑलराउंडरों की कमी के बीच टीम को नंबर सात पर एक ऐसा खिलाड़ी चाहिए जो गेंदबाजी के साथ-साथ बल्लेबाजी में भी पूरा योगदान दे सके, ताकि निचले क्रम में टीम का संतुलन न बिगड़े. यही वजह है कि कप्तान और कोच ने स्पिन विभाग की पूरी जिम्मेदारी अक्षर पटेल और वॉशिंगटन सुंदर की युवा ऑलराउंड जोड़ी के कंधों पर डाल दी है.
जडेजा आखिर रेस में पीछे क्यों छूटे
सवाल यह उठता है कि रवींद्र जडेजा इस दौड़ में पीछे क्यों छूट गए. दरअसल चयनकर्ता अब उन्हें वनडे प्रारूप में पहली पसंद के स्पिनर के तौर पर नहीं देख रहे. बीसीसीआई के एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'सीमित ओवरों के क्रिकेट में जडेजा की गेंदबाजी काफी समय से उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है. उन्हें हाल ही में चैंपियंस ट्रॉफी 2025 की टीम में सिर्फ इसलिए शामिल किया गया था क्योंकि भारतीय टीम को उम्मीद थी कि दुबई की पिचें स्पिनर्स के लिए मददगार साबित होंगी.'
सूत्र ने यह भी बताया कि जडेजा की उस आक्रामक बल्लेबाजी पर भी असर पड़ा है जिसके लिए वह लंबे समय तक पहचाने जाते रहे हैं. 2019 वनडे वर्ल्ड कप के दौरान जिस तरह की पावर-हिटिंग और फिनिशिंग जडेजा किया करते थे, अब वह धार उनके खेल में नजर नहीं आती. निचले क्रम में तेजी से रन बटोरने और मैच खत्म करने की उनकी वही पुरानी क्षमता चयनकर्ताओं को हाल के मुकाबलों में गायब सी दिखी है, और यही बात उनके पक्ष में सबसे बड़ी अड़चन बन गई है.
आंकड़े भी गवाही दे रहे गिरावट की
आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं. हाल ही में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेली गई वनडे सीरीज में जडेजा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. तीन मैचों की उस सीरीज में, जिसे भारत 2-1 से हार गया, जडेजा के बल्ले से सिर्फ 43 रन ही निकल सके. इस दौरान उनका बल्लेबाजी औसत महज 14.33 का रहा, जबकि उनका स्ट्राइक रेट भी सिर्फ 66.15 का रहा, जो आधुनिक वनडे क्रिकेट के मानकों से कहीं कम है. निचले क्रम में इतनी धीमी स्ट्राइक रेट किसी भी ऑलराउंडर की जगह पर सवाल खड़े करने के लिए काफी होती है, खासकर तब जब टीम को आखिरी ओवरों में तेजी से रन चाहिए होते हैं.
अक्षर पटेल के सामने भी आसान नहीं डगर
हालांकि अक्षर पटेल के लिए भी आगे का रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होने वाला. एक तरफ जहां उन्होंने स्पिन के लिए मददगार पिचों पर शानदार खेल दिखाया है, वहीं दक्षिण अफ्रीका जैसी तेज और उछाल भरी पिचों पर उनका प्रदर्शन अब भी चिंता की बात बना हुआ है. दक्षिण अफ्रीका में मिले सीमित वनडे मौकों में अक्षर खुद को साबित करने में जूझते दिखे. वहां खेले गए तीन मैचों में वह बल्ले से सिर्फ आठ रन बना सके और गेंदबाजी में भी उन्हें केवल एक ही सफलता मिली. ऐसे में आगामी वर्ल्ड कप की विदेशी और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अक्षर खुद को कैसे ढालते हैं, यह टीम इंडिया के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी, क्योंकि हर पिच स्पिन के लिए मददगार नहीं होगी.
बदलाव के दौर में जडेजा युग का पड़ाव
भारतीय क्रिकेट का इतिहास बताता है कि बदलाव हमेशा कठिन फैसलों के साथ ही आता है. रवींद्र जडेजा ने भारतीय क्रिकेट को जो कुछ दिया है, उसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं है. लेकिन भविष्य की जरूरतों और टीम संतुलन को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारतीय थिंक टैंक अब जडेजा के दौर से आगे बढ़कर अक्षर पटेल के रूप में नई उम्मीदें तलाश रहा है.











