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मध्य प्रदेश का चोली तालाब: हजार साल से पानी से भरा यह जल-कुंड किसने बनवाया, जानिए परमारकालीन इंजीनियरिंग का राजकल्चर
13 जून 2026, 12:01 pm (138 दिन पहले)· 2

मध्य प्रदेश का चोली तालाब: हजार साल से पानी से भरा यह जल-कुंड किसने बनवाया, जानिए परमारकालीन इंजीनियरिंग का राज

खरगोन जिले के चोली गांव में करीब एक हजार साल पुराना तालाब आज भी सालभर लबालब रहता है। माना जाता है कि इसे परमार वंश के राजा मुंज ने वैज्ञानिक तरीके से बनवाया था।

मालवा की धरती जब जल संरक्षण की बात आती है तो ज्यादातर लोगों के जेहन में अहिल्याबाई होलकर का नाम उभरता है, जिनके बनवाए मंदिर, बावड़ियां और तालाब आज भी इस अंचल की पहचान हैं। मगर इतिहास के पन्ने पलटें तो एक और प्रतापी शासक मिलता है, जिसने सदियों पहले पानी सहेजने की ऐसी मिसाल खड़ी की कि लोग आज भी हैरान रह जाते हैं। यह नाम है परमार वंश के राजा मुंज का। कहा जाता है कि अहिल्याबाई की ही तरह राजा मुंज ने भी अपने राज्य में कई मंदिरों के साथ-साथ बावड़ियों और तालाबों का निर्माण कराया था, और चोली गांव का विशाल तालाब उन्हीं में से एक है — जो आज क्षेत्र की अनमोल धरोहर बन चुका है।

हजार साल बाद भी सूखता नहीं यह तालाब

करीब एक हजार साल पुराना होने के बावजूद यह तालाब पूरे साल पानी से लबालब रहता है। यह सिर्फ अपने गांव की प्यास ही नहीं बुझाता, बल्कि आसपास के कई गांवों के खेतों को भी सींचता है। इसका फैलाव इतना बड़ा है कि नजर जहां तक जाती है, बस पानी ही पानी दिखाई देता है। यह प्राचीन जलस्रोत खरगोन जिले के चोली गांव में है, जो धार्मिक और पर्यटन नगरी महेश्वर से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा है।

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गांव में परमारकाल के कई पुराने मंदिर भी मौजूद हैं। इनमें प्रसिद्ध गौरी सोमनाथ मंदिर खास है, जिसे पुरातत्व विभाग संरक्षित स्मारक मानता है। यही विशाल तालाब इसी मंदिर के ठीक सामने फैला हुआ है, जिससे इस जगह का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है।

किसने बनवाया और कब, क्या कहते हैं दस्तावेज

इतिहास के जानकार नवीन कुमार ने local18 को बताया कि सीताराम साधौ द्वारा संपादित पुस्तक 'माहिष्मति स्मारिका' में लेखक प्रह्लाद सिंह यादव ने इस तालाब का जिक्र किया है। दस्तावेजों के मुताबिक, परमार राजवंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज प्रथम के काका राजा मुंज ने यह तालाब बनवाया था।

राजा मुंज के शासनकाल को लेकर इतिहासकारों में एक राय नहीं है। कुछ का मानना है कि उन्होंने 972 ईस्वी से 990 ईस्वी तक मालवा पर राज किया, जबकि कुछ इतिहासकार इस अवधि को 978 ईस्वी से 1021 ईस्वी तक बताते हैं। इसी दौरान उन्होंने अपनी राजधानी मांडू समेत कई स्थानों पर मंदिर, तालाब और बावड़ियां बनवाईं।

मांडू का 'मूंज तालाब' भी इन्हीं की देन

नवीन कुमार के अनुसार, मांडू में दो तालाबों के बीच बने मशहूर जहाज महल के पूर्वी हिस्से में जो तालाब है, उसे आज भी 'मूंज तालाब' के नाम से पहचाना जाता है। माना जाता है कि जिस कालखंड में यह मूंज तालाब बना, उसी दौर में चोली का विशाल तालाब भी आकार में आया होगा। इस अनुमान को इस बात से बल मिलता है कि चोली गांव के मंदिरों का निर्माण भी राजा भोज के कार्यकाल में होना बताया जाता है।

123 एकड़ में फैली नक्काशीदार दीवार

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि चोली का यह ऐतिहासिक तालाब करीब 123 एकड़ के दायरे में फैला हुआ है। इसकी दक्षिण दिशा में पत्थरों की एक विशाल दीवार खड़ी की गई थी, जिस पर बेहद बारीक नक्काशी की गई थी। देखरेख न मिलने के कारण आज यह दीवार बड़े हिस्से में टूट चुकी है और वह पुरानी कारीगरी अब नजर नहीं आती। इसके बावजूद तालाब की बनावट और संरचना देखकर लोग दंग रह जाते हैं। बिना किसी आधुनिक तकनीक के हजार साल पहले इतनी वैज्ञानिक सोच से जल-संरचना तैयार करना किसी अजूबे से कम नहीं माना जाता।

नदी को तालाब से जोड़ने की अनोखी तकनीक

नवीन कुमार के मुताबिक, इस तालाब की सबसे बड़ी खूबी इसकी बनावट ही है। विंध्याचल पर्वत से निकलने वाली एक गुमनाम पहाड़ी नदी को तालाब से जोड़ दिया गया था, और उसी नदी का पानी तालाब को भरता रहता है। जब तालाब पूरी तरह भर जाता है, तो उसका अतिरिक्त पानी वेस्टेज वॉल के रास्ते करीब 7 किलोमीटर दूर बने मंडलेश्वर तालाब तक पहुंच जाता है। वहां से बचा हुआ पानी नालों के जरिए बहता हुआ आखिरकार नर्मदा नदी में जा मिलता है। इन दोनों तालाबों के आपस में जुड़ने के कारण वह पहाड़ी नदी भी नर्मदा से जुड़ गई — पानी को इतनी दूर तक संभालकर बहाने की यह व्यवस्था सदियों पुरानी इंजीनियरिंग की मिसाल है।

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