भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई अमर गीत दर्ज हैं जिनकी लोकप्रियता और चमक वक्त के गुजरने के साथ कभी फीकी नहीं पड़ी। हालांकि हिंदी फिल्म जगत में एक बेहद दिलचस्प और अनोखा इत्तेफाक तब देखने को मिला जब एक ही गाए गए जज्बे को अलग-अलग दशकों में बनी तीन प्रमुख फिल्मों में पूरी शिद्दत के साथ पिरोया गया। यह ऐतिहासिक रचना और कोई नहीं बल्कि अमर शहीद भगत सिंह के बलिदान को समर्पित कालजयी गीत 'मेरा रंग दे बसंती चोला' है। साल 1965 की महान आवाज से लेकर साल 2002 के आधुनिक संगीत तक, इस गीत ने हर बार सिल्वर स्क्रीन पर दर्शकों के भीतर देशभक्ति की एक अनोखी अलख जगाई है।
शहीद (1965) का क्लासिक अंदाज
इस महान और देशभक्ति से ओतप्रोत गीत की शुरुआत साल 1965 में आई फिल्म ‘शहीद’ के जरिए बड़े पर्दे पर हुई थी। एस राम शर्मा के निर्देशन में बनी इस सिनेमाई कृति में दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार ने अमर शहीद भगत सिंह की मुख्य भूमिका को बेहद संजीदगी से निभाया था। इस गीत के बोल लिखने और इसे अपनी धुन में पिरोने का श्रेय मशहूर गीतकार प्रेम धवन को जाता है। फिल्म में इस गाने को मुख्य रूप से मुकेश की आवाज में रिकॉर्ड किया गया था, जबकि उनका साथ देने के लिए महेंद्र कपूर और लता मंगेशकर जैसे दिग्गज कलाकार भी शामिल रहे थे। जब यह गीत साल 1965 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ, तो इसने पूरे देश में देशभक्ति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने हर नागरिक के दिल को झकझोर कर रख दिया। मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम और देश के लिए हंसते-हंसते जान कुर्बान कर देने वाले क्रांतिकारियों के त्याग को दर्शाता यह गीत भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा क्लासिक बन गया।
23 मार्च 1931- शहीद (2002) की दमदार वापसी
दशकों का सफर तय करने के बाद इस सदाबहार रचना को एक बार फिर से नई सदी के शुरुआती दौर में यानी साल 2002 में आई फिल्म ’23 मार्च 1931: शहीद’ में शामिल किया गया। इस फिल्म के निर्देशक गुड्डी धनोआ थे। पर्दे पर इस बार भगत सिंह के किरदार में अभिनेता बॉबी देओल नजर आए, जबकि उनके बड़े भाई और मशहूर अभिनेता सनी देओल ने महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की भूमिका को जीवंत किया। इस प्रोजेक्ट के लिए म्यूजिक कंपोजर आनंद राज आनंद ने इस ऐतिहासिक गीत को आज के दौर के दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से तैयार किया। इस नए संस्करण में अपनी जादुई आवाज देने का जिम्मा उदित नारायण और भूपेंद्र सिंह ने उठाया। जब यह गाना सिनेमाघरों के बड़े पर्दे पर बॉबी देओल और सनी देओल की दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के साथ चला, तो इसने दर्शकों के भीतर वही पुराना जोश और देशभक्ति का अटूट जुनून एक बार फिर से ताजा कर दिया।
द लेजेंड ऑफ भगत सिंह (2002) और एआर रहमान का संगीत
उसी वर्ष यानी 7 जून 2002 को निर्देशक राजकुमार संतोषी की एक और बहुचर्चित फिल्म ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ रिलीज हुई, जिसमें मुख्य भूमिका अभिनेता अजय देवगन ने निभाई थी। इस फिल्म के लिए प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान ने इस प्रतिष्ठित गीत को तीसरी बार बिल्कुल नए, आधुनिक और भव्य म्यूजिकल रूप में ढाला। इस बार इस गीत को अपनी आवाज से सजाने वाले कलाकार सोनू निगम और मनमोहन सिंह थे। फिल्म का वह बेहद मार्मिक दृश्य जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अपने प्राणों की आहुति देने के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे की तरफ बढ़ रहे होते हैं और पृष्ठभूमि में यह गाना बजता है, तो थिएटर में बैठे हर दर्शक की आंखें नम हो जाती हैं। इस खास वर्जन ने परदे पर अजय देवगन के किरदार को अमर बना दिया और संगीत की दुनिया में एक नया इतिहास रच दिया।
रीमेक के दौर में अपवाद बना यह अमर गीत
आमतौर पर जब भी फिल्म इंडस्ट्री में किसी पुराने और लोकप्रिय क्लासिक गाने का रीमेक तैयार किया जाता है, तो दर्शक अक्सर उसे नकार देते हैं या उसकी मूल भावना से तुलना करते हैं। लेकिन ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ इस नियम का एक बड़ा अपवाद साबित हुआ। साल 1965 से लेकर 2002 तक तीन अलग-अलग फिल्मों और अलग-अलग पीढ़ियों के कलाकारों पर फिल्माए जाने के बावजूद इस गीत के प्रभाव और गहराई में कभी कोई कमी नहीं आई। भगत सिंह की शहादत, देश की आजादी की क्रांति की वह पवित्र भावना और राष्ट्रप्रेम का संदेश इस गीत के हर एक शब्द में गहराई से रचा-ब बसा है। यही वजह रही है कि जब भी किसी फिल्मकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन पर आधारित कोई कहानी पर्दे पर उतारने की कोशिश की, तो इस गीत के बिना वह कहानी हमेशा अधूरी ही मानी गई।
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की अनिवार्य पहचान
तीन बड़ी फिल्मों के सफर से गुजरकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराने वाला यह गीत आज भी हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के पावन अवसरों पर हर भारतवासी की जुबान पर मुख्य रूप से रहता है। यह गीत इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि सच्चा संगीत और सच्ची भावना कभी भी समय की सीमाओं या दशकों के बंधनों में नहीं बंधती। चाहे वह मनोज कुमार का वह क्लासिक और संजीदा अंदाज हो, उदित नारायण की आवाज के सहारे परदे पर बॉबी देओल का ऊर्जावान प्रदर्शन हो, या फिर सोनू निगम के सुरों के साथ अजय देवगन की गंभीर और सधी हुई अदाकारी हो... तीन अलग-अलग जेनरेशन के दिग्गज अभिनेताओं पर फिल्माया गया यह एक अकेला गीत आज भारतीय सिनेमा के इतिहास में देशभक्ति का सबसे बड़ा और स्थाई प्रतीक बन चुका है।



















