भारतीय सिनेमा के लंबे सफर में किसी महान क्रांतिकारी या अमर नायक के जीवन पर बार-बार फिल्में बनना कोई अछूती बात नहीं है, लेकिन शहीद भगत सिंह की गाथा हमेशा से फिल्मकारों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा स्रोत रही है, जिसकी गहराई हर दौर में अलग नजर आई। इस महान क्रांतिकारी के बलिदान और उनके विचारों ने पीढ़ियों को झकझोरा है, जिसके चलते हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी जिंदगी पर सिर्फ एक या दो नहीं, बल्कि कुल छह अलग-अलग फिल्में बनाई गईं। इनमें से एक साल ऐसा भी आया जब बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक टक्कर देखने को मिली और एक ही महीने के भीतर तीन अलग-अलग प्रोजेक्ट सिनेमाघरों में पहुंच गए।
1. 'शहीद-ए-आजाद भगत सिंह' (1954)
सिनेमा के शुरुआती दशकों में जब ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं को बड़े पर्दे पर उतारने का चलन तेजी से बढ़ रहा था, तब साल 1954 में जगदीश गौतम के निर्देशन में 'शहीद-ए-आजाद भगत सिंह' नाम से एक महत्वपूर्ण फिल्म बनाई गई। इस ब्लैक-एंड-व्हाइट फिल्म में अभिनेता प्रेम अदीब ने मुख्य क्रांतिकारी भगत सिंह का किरदार निभाया था। इस फिल्म में उनकी शहादत और देश की आजादी के प्रति उनके समर्पण को बहुत ही सादमी और संजीदगी के साथ पर्दे पर उकेरा गया था। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में शहीद भगत सिंह की सच्ची कहानी पर आधारित पहली आधिकारिक फीचर फिल्म थी, जिसने आने वाले समय के निर्देशकों के लिए एक मजबूत नींव रखी। हालांकि तमाम खूबियों के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई और फ्लॉप साबित हुई।
2. 'शहीद भगत सिंह' (1963)
साठ के दशक में शम्मी कपूर मुख्य रूप से अपनी रूमानी अदाओं और बेहतरीन डांसिंग स्किल्स के लिए जाने जाते थे, लेकिन उन्होंने साल 1963 में आई फिल्म 'शहीद भगत सिंह' में एक बेहद गंभीर और आक्रामक भूमिका निभाकर सबको हैरान कर दिया। केएन बंसल के निर्देशन में बनी इस मूवी में शम्मी कपूर ने अमर शहीद भगत सिंह का किरदार अदा किया। इस कहानी में उनके संघर्ष, सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने की घटना और लाहौर षड्यंत्र केस को काफी नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत किया गया था। शम्मी कपूर के इस कड़े अभिनय ने दर्शकों के भीतर देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी और यह फिल्म अपने समय की एक यादगार रचना बन गई, फिर भी कमर्शियल स्तर पर यह भी सफलता हासिल नहीं कर पाई।
3. 'शहीद' (1965)
साल 1965 में एस राम शर्मा के निर्देशन में पर्दे पर आई फिल्म 'शहीद' को भगत सिंह के जीवन पर बनी अब तक की सबसे बेहतरीन और कालजयी फिल्मों में शुमार किया जाता है। अभिनेता मनोज कुमार ने इस प्रोजेक्ट में भगत सिंह का मुख्य रोल निभाया था, और इसी फिल्म से उन्हें 'भारत कुमार' जैसी प्रतिष्ठित उपाधि मिली थी। इसके संवाद, पटकथा और अमर गीत जैसे कि मेरा रंग दे बसंती चोला आज भी दर्शकों की आंखें नम कर देते हैं। आज जब भी देशभक्ति से ओतप्रोत सिनेमा की मिसाल दी जाती है, तो इस मास्टरपीस का नाम सबसे ऊपर आता है। शहीद भगत सिंह पर बनी फिल्मों के इतिहास में यह इकलौती ऐसी फिल्म रही जिसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के सभी रिकॉर्ड तोड़े और सुपरहिट साबित हुई।
4. 'शहीद-ए-आजम' (2002)
साल 2002 का वह दौर था जब क्रांतिकारी के जीवन पर आधारित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई और यह साल सिनेमाई इतिहास में दर्ज हो गया। इस कड़ी में 31 मई 2002 को सुकुमार नायर के निर्देशन में बनी फिल्म 'शहीद-ए-आजम' ने सिनेमाघरों में दस्तक दी, जिसमें अभिनेता सोनू सूद ने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने उनके क्रांतिकारी विचारों और उनके बौद्धिक पक्ष को दर्शकों के सामने काफी गहराई से रखा। हालांकि यह फिल्म व्यावसायिक तौर पर कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन सोनू सूद के गंभीर और सधे हुए अभिनय की समीक्षकों और सिनेमा प्रेमियों द्वारा खूब सराहना की गई।
5. '23 मार्च 1931: शहीद' (2002)
सात जून 2002 का दिन भारतीय सिनेमा के बॉक्स ऑफिस इतिहास के सबसे अनोखे टकराव का गवाह बना। निर्देशक गुड्डू धनोआ की फिल्म '23 मार्च 1931: शहीद' ठीक उसी दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई जिस दिन एक और बड़ी भगत सिंह पर आधारित फिल्म मैदान में उतरी थी। इस फिल्म में बॉबी देओल ने भगत सिंह का किरदार निभाया था, जबकि उनके बड़े भाई सनी देओल ने महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की भूमिका अदा की थी। फिल्म में क्रांतिकारियों के बीच आपसी तालमेल, जबरदस्त एक्शन और भारी-भरकम ड्रामे का मिश्रण देखने को मिला। बड़े पर्दे पर देओल बंधुओं की मौजूदगी ने इस कहानी में एक नया रोमांच जरूर भरा, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म भी असफल साबित हुई।
6. 'द लेजेंड ऑफ भगत सिंह' (2002)
उसी तारीख यानी सात जून 2002 को राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी 'द लेजेंड ऑफ भगत सिंह' सीधे तौर पर बॉबी देओल वाली फिल्म के सामने मुकाबले में खड़ी थी। इस फिल्म में अभिनेता अजय देवगन ने भगत सिंह का किरदार इतनी बेजोड़ और प्रभावशाली ताकत के साथ निभाया कि देखने वाले दंग रह गए। एआर रहमान का रोंगटे खड़े कर देने वाला संगीत और अजय देवगन का सशक्त अभिनय इस फिल्म को ऐतिहासिक दर्जा दिलाने में कामयाब रहा। इस दमदार काम के लिए अजय देवगन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। हालांकि यह फिल्म अपनी प्रतिद्वंद्वी फिल्म के मुकाबले थोड़ी बेहतर जरूर रही, लेकिन कुल मिलाकर यह भी बॉक्स ऑफिस पर कमर्शियल सफलता का स्वाद नहीं चख पाई।



















