सिनेमा जगत में साल 1982 एक ऐसा दौर था जब राज कपूर अपनी बेहतरीन और विचारोत्तेजक कहानियों के लिए जाने जाते थे। इसी कड़ी में वे रोमांटिक ड्रामा फिल्म प्रेम रोग लेकर आए थे, जिसने पर्दे पर आते ही दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना ली थी। फिल्म की कहानी अपने समय से काफी आगे की थी क्योंकि इसमें समाज में विधवा महिलाओं को लेकर चली आ रही रूढ़िवादी सोच और पाबंदियों पर तीखे सवाल उठाए गए थे। इस मूवी में मुख्य भूमिकाओं में ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे की जोड़ी को दर्शकों ने भरपूर प्यार दिया था, जिनकी केमिस्ट्री ने स्क्रीन पर जादू बिखेर दिया था।
इस संपूर्ण नाटकीय और भावनात्मक ताने-बाने के बीच फिल्म के गाने भी बॉक्स ऑफिस पर मील का पत्थर साबित हुए थे। राज कपूर के निर्देशन और निर्माण में बनी इस फिल्म में शम्मी कपूर, तनुजा, कुलभूषण खरबंदा और बिंदू देसाई जैसे दिग्गज सितारे भी अहम भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे, लेकिन इनमें से एक गाना भंवरे ने खिलाया फूल अपने अनूठे और अर्थपूर्ण बोलों के कारण विशेष चर्चा का केंद्र बन गया था। इस प्रसिद्ध गीत को स्वर कोकिला लता मंगेशकर और लोकप्रिय गायक सुरेश वाडकर ने अपनी जादुई आवाज़ से सजाया था, जबकि इसके बेहतरीन बोल मशहूर गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा ने रचे थे।
इस लोकप्रिय गीत की एक विशेष पंक्ति भंवरे को कहना न भूल भूल.. तेरा मधुर नहीं मधुकर में एक ऐसा शब्द आता है जिसके अर्थ को लेकर अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा बनी रहती है। क्या आप जानते हैं कि इस पंक्ति में प्रयुक्त मधुकर शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है? जानकारी के लिए बता दें कि यह शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका सीधा संबंध फूलों पर मंडराने वाले भौंरे से होता है। इस शब्द की गहराई और प्राचीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका उल्लेख महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस में भी मिलता है, जो इसे साहित्य की दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बनाता है।
फिल्म निर्माण और इसकी रिकॉर्डिंग से जुड़े कई ऐसे दिलचस्प किस्से हैं जो आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन जाते हैं। राज कपूर अपनी फिल्मों के हर एक सीन और संगीत को लेकर बेहद गंभीर रहते थे और वे शूटिंग के दौरान छोटी से छोटी बारीकी पर भी विशेष ध्यान देते थे। इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान एक अनोखा वाकया सामने आया था जिसका जिक्र गायक सुरेश वाडकर ने खुद एक लाइव इवेंट के दौरान किया था। उन्होंने बताया था कि स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के वक्त उन्होंने अपने ही गले से भौंरे के भिनभिनाने जैसी आवाज निकाली थी जो गीत के माहौल में पूरी तरह फिट बैठती थी।
सुरेश वाडकर का यह अनूठा प्रयोग और गाने के प्रति उनका समर्पण राज कपूर को बेहद पसंद आया था और उन्होंने इस रचनात्मक अंदाज के लिए गायक की खुलकर सराहना भी की थी। जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी तो दर्शकों का हुजूम थिएटर्स के बाहर उमड़ पड़ा था और इसे देखने के लिए लंबी-लंबी कतारें लग गई थीं। इस जबरदस्त क्रेज के चलते प्रेम रोग ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की थी और इसके गीत आज भी पुराने हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग की मिठास और रूमानी यादों को ताजा कर देते हैं।




















