हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता और बेहतरीन कॉमेडी किंग असरानी आज भले ही पहले की तरह पर्दे पर सक्रिय नजर न आते हों, लेकिन उनके अभिनय का जादू आज भी दर्शकों के दिलों में पूरी तरह से बसा हुआ है। उनकी शानदार कॉमिक टाइमिंग, चेहरे के अनूठे हाव-भाव और डायलॉग बोलने के खास अंदाज ने दशकों तक लोगों को खूब हंसाया है। उन्होंने अपने लंबे अभिनय सफर में हर तरह के किरदारों को जीवंत किया, लेकिन साल 1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले में निभाया गया अंग्रेजों के जमाने के जेलर का उनका किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे अमर और यादगार किरदारों में शुमार किया जाता है। असरानी की जन्म वर्षगांठ के इस विशेष अवसर पर उनके पूरे फिल्मी सफर पर विस्तार से नजर डाली जा रही है।
जयपुर में बीता बचपन और पारिवारिक कारोबार
असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर शहर में एक सिंधी-हिंदू परिवार के भीतर हुआ था। उनके घर में कालीन और साड़ियों का एक स्थापित पारिवारिक कारोबार था। उनके घरवाले यही चाहते थे कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे तौर पर इस व्यवसाय में हाथ बटाएं और इसे आगे बढ़ाएं, लेकिन असरानी का मन पढ़ाई के बाद पूरी तरह से अभिनय और संगीत की तरफ खिंचा चला जाता था। कुल आठ भाई-बहनों में वह दूसरे स्थान पर आते थे। वह अपने स्कूल के शुरुआती दिनों से ही नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर के विभिन्न कार्यक्रमों में भी अपनी प्रस्तुतियां दीं, जिससे अभिनय के प्रति उनका लगाव और भी ज्यादा गहरा होता चला गया।
मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान संजोया था अभिनेता बनने का सपना
जब असरानी मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे थे, तभी उनके मन में फिल्मों में काम करने और एक सफल अभिनेता बनने का बड़ा सपना पलने लगा था। अपने इसी सपने को सच करने की खातिर वह मुंबई शहर भी पहुंच गए थे, लेकिन उस शुरुआती दौर में उन्हें सही दिशा और मार्गदर्शन नहीं मिल सका, जिसकी वजह से उन्हें वापस जयपुर लौटना पड़ा। हालांकि, इन शुरुआती असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपने उस बड़े सपने को कभी नहीं छोड़ा। अपनी कॉलेज की औपचारिक पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित संस्थान फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिला लिया और वहां रहकर अभिनय की सभी बारीक और जरूरी कलाएं सीखीं।
संघर्ष का दौर और छोटे-मोटे किरदारों से शुरुआत
असरानी के लिए फिल्मी दुनिया की इस रंगीन नगरी में अपनी एक ठोस जगह बनाना बिल्कुल भी आसान नहीं रहा था। अभिनय का कोर्स पूरा करने के बाद वह हर शुक्रवार को पुणे से मुंबई की यात्रा करते थे, फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों से मिलते थे और काम मिलने की उम्मीद लेकर वापस लौट जाते थे। शुरुआती दिनों में उनके हिस्से में केवल छोटे-छोटे किरदार ही आए, लेकिन उन्होंने कभी मायूस होने के बजाय हर एक भूमिका को पूरी मेहनत, लगन और ईमानदारी के साथ निभाया। धीरे-धीरे उनकी अभिनय प्रतिभा बड़े पर्दे पर लोगों की नजरों में आने लगी। इसके बाद उन्होंने गुड्डी, बावर्ची, नमक हराम, अभिमान और चुपके चुपके जैसी बेहतरीन फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच एक अलग पहचान कायम कर ली।
फिल्मफेयर पुरस्कार से मिला अभिनय का सम्मान
इन सभी चुनिंदा फिल्मों के जरिए उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि किसी भी किरदार को हमेशा के लिए यादगार बनाने के लिए उसका पर्दे पर बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं होता, बल्कि उसे पूरी शिद्दत से निभाने का अंदाज ही मायने रखता है। फिल्म आज की ताजा खबर में उनके द्वारा किए गए शानदार और लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसके अलावा रफूचक्कर, बालिका वधू और पति पत्नी और वो जैसी अन्य लोकप्रिय फिल्मों में भी उनकी कॉमेडी को दर्शकों ने खूब सराहा और पसंद किया।
जेलर के प्रतिष्ठित किरदार से चमकी तकदीर
असरानी के पूरे फिल्मी करियर का सबसे अधिक प्रसिद्ध और यादगार किरदार फिल्म शोले का वह अनोखा जेलर था। इस फिल्म में उनका वह मशहूर संवाद, हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं, आज भी देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर आसानी से मिल जाता है। इस भूमिका में वह खुद को जरूरत से ज्यादा चालाक और ताकतवर समझने वाले एक अजीबोगरीब जेलर के रूप में पर्दे पर आए, लेकिन उनकी हरकतें और हाव-भाव दर्शकों को लोटपोट होने पर मजबूर कर देते थे। फिल्म में भले ही उनकी उपस्थिति कम समय के लिए थी, लेकिन उन्होंने अपनी अमिट अदाकारी की ऐसी गहरी छाप छोड़ी कि वह हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित कॉमिक किरदारों की सूची में सबसे ऊपर शामिल हो गए। 20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहने वाले असरानी आज भी अपने चाहने वालों की यादों में हमेशा के लिए जिंदा हैं।


















