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रसोई की चुभती बीप का इलाज: स्टारलिंग के जोएल कोरेलिट्ज़ और कोलिन कूगन ने C++ कोड से सुधारी माइक्रोवेव की आवाज़गैजेट्स
29 जुल॰ 2026, 3:01 am (18 घंटे पहले)· 0

रसोई की चुभती बीप का इलाज: स्टारलिंग के जोएल कोरेलिट्ज़ और कोलिन कूगन ने C++ कोड से सुधारी माइक्रोवेव की आवाज़

दो अनुभवी साउंड डिजाइनरों ने बिना कोई नया हार्डवेयर जोड़े सिर्फ C++ प्रोग्रामिंग के जरिए माइक्रोवेव की कर्कश बीप को सुरीली और सुखद आवाजों में बदलने का तरीका खोज निकाला है।

हर सुबह रसोई में खाना गर्म करते समय माइक्रोवेव की तीखी और कर्कश बीप सुनना लगभग हर व्यक्ति के लिए मानसिक तनाव का कारण बनता है। स्थिति यह हो चुकी है कि कई लोग ऑपरेंट कंडीशनिंग के शिकार हो चुके हैं और माइक्रोवेव की घंटी बजने से ठीक 1 सेकंड पहले ही उसका दरवाजा खोल देते हैं ताकि उस दर्दनाक आवाज से बचा जा सके। हालांकि, अब इस वैश्विक समस्या का एक बेहद सस्ता और तकनीकी समाधान सामने आ गया है। उपकरण निर्माताओं को अपने मार्जिन में कटौती करने या महंगे हार्डवेयर लगाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, क्योंकि महज कुछ पंक्तियों के C++ कोड को बदलकर माइक्रोवेव के ध्वनि अनुभव को पूरी तरह से बदला जा सकता है।

घरेलू शोर का मनोविज्ञान और रसोई की झल्लाहट

आधुनिक घरों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण लगातार विभिन्न प्रकार के संकेतों के लिए बीप की आवाज़ निकालते हैं। इनमें से माइक्रोवेव की बीप सबसे अधिक परेशान करने वाली मानी जाती है। जब कोई उपकरण बार-बार एक ही उच्च आवृत्ति वाली तीखी ध्वनि उत्पन्न करता है, तो यह मानव मस्तिष्क में कोर्टिसोल नामक तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ा देता है। यही वजह है कि अधिकांश उपभोक्ता खाना गर्म होने का इंतजार करते समय उल्टी गिनती गिनते हैं और टाइमर खत्म होने से ठीक पहले रद्द या ओपन बटन दबा देते हैं। इस व्यवहार ने यह साबित कर दिया है कि कैसे एक साधारण घरेलू उपकरण ने इंसानों को अपनी कर्कश आवाज़ से बचने का प्रशिक्षण दे दिया है।

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पांच दशकों की कहानी: पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र का इतिहास

इंसानों को परेशान करने वाली इस बीप का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। तीखी और छोटी आवाज के लिए बीप शब्द का पहला लिखित प्रयोग 1951 में प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक आर्थर सी. क्लार्क की पुस्तक द सैंड्स ऑफ मार्स में हुआ था। उससे पहले बीप शब्द का इस्तेमाल केवल गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ बताने के लिए किया जाता था। 1970 के दशक में जापानी निर्माताओं ने पहली बार पैसिव पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र को बाजार में पेश किया। पीज़ो बज़र एक पतली झिल्ली की तरह होता है जो विद्युत प्रवाह मिलने पर कंपन करता है और एक बुनियादी बीप पैदा करता है।

क्योंकि पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र की लागत महज कुछ सेंट होती है और इसकी बनावट बेहद सरल है, इसलिए यह तकनीक बहुत तेज़ी से दुनिया भर के उपकरणों में फैल गई। खिलौने, स्मोक डिटैक्टर, अलार्म घड़ी, मल्टीमीटर, हाथ की घड़ियां और माइक्रोवेव सभी में इसी बज़र का इस्तेमाल होने लगा। हालांकि, इस कम लागत वाली तकनीक की अपनी सीमाएं थीं। निर्माता केवल इस बीप की आवृत्ति और अवधि को ही थोड़ा बहुत नियंत्रित कर सकते थे। इसके बावजूद पचास साल बाद आज भी लगभग हर माइक्रोवेव में वही पुरानी पीज़ो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है।

कंपनियां क्यों नहीं बदलतीं पुराना बज़र?

यदि माइक्रोवेव निर्माता चाहें तो उपकरण में बेहतर स्पीकर लगा सकते हैं, जिससे कई तरह की सुरीली आवाजें पैदा की जा सकती हैं। लेकिन कंज्यूमर व्हाइट गुड्स यानी घरेलू उपकरणों के बाजार में प्रतिस्पर्धा बहुत कड़ी होती है। कंपनियां एक-एक पैसे का हिसाब रखती हैं और मुनाफे का मार्जिन बहुत कम होता है। ऐसे में कोई भी निर्माता उस बेहद सस्ते पीज़ो बज़र को हटाकर महंगा स्पीकर लगाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता जो पहले से काम चला रहा है।

इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए साउंड डिज़ाइनर जोएल कोरेलिट्ज़ और कोलिन कूगन ने एक नई पहल की। यह दोनों स्टारलिंग नामक एक दो-सदस्यीय स्टार्टअप के संस्थापक हैं। इससे पहले वे सोनी, माइक्रोसॉफ्ट, नेटफ्लिक्स और सेगा जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए काम कर चुके हैं और उन्होंने फोर्ड की पूरी कार श्रृंखला के लिए साउंड रणनीति भी तैयार की थी। जोएल कोरेलिट्ज़ खुद अपने माइक्रोवेव की तीखी बीप से बेहद परेशान थे, इसलिए उन्होंने और कोलिन कूगन ने यह ठान लिया कि वे बिना किसी नए हार्डवेयर के, मौजूदा चिप्स और पीज़ो बज़र का उपयोग करके ही माइक्रोवेव की आवाज़ को बेहतर बनाएंगे।

बिना हार्डवेयर बदले आवाज़ बदलने का सी++ हैक

जोएल कोरेलिट्ज़ के अनुसार, कोई भी माइक्रोकंट्रोलर जो C++ भाषा को स्वीकार करता है, उसे अलग प्रोग्रामिंग देकर अलग-अलग प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न की जा सकती हैं। चूंकि हर आधुनिक माइक्रोवेव के भीतर पहले से ही एक माइक्रोकंट्रोलर और पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र मौजूद होता है, इसलिए केवल सॉफ्टवेयर कोड में बदलाव करके नई ध्वनियां बनाई जा सकती हैं। उन्होंने माइक्रोवेव साउंड बेंच नामक एक सॉफ्टवेयर विकसित किया और अपने लैपटॉप पर पुरानी भयानक बीप का मुकाबला नई ध्वनियों से करके दिखाया।

स्टारलिंग द्वारा तैयार की गई नई ध्वनियों में छोटे नोटों वाली ट्रिल, कार्टून के गिरने जैसी फ़्रीक्वेंसी स्वीप, आरपेजियो और वीडियो गेम जैसी ध्वनियों का क्रम शामिल है। ये ध्वनियां पारंपरिक माइक्रोवेव बीप जैसी बिल्कुल नहीं लगतीं और सुबह-सुबह मानसिक तनाव पैदा करने वाले टोन को पूरी तरह खत्म कर देती हैं। निर्माताओं को इसके लिए कोई नया हार्डवेयर खरीदने की ज़रूरत नहीं है, बस उन्हें अपने डिवाइस में नया प्रोग्रामिंग कोड डालना होगा।

लैब में प्रयोग: बिना नए पार्ट्स के वॉल्यूम और क्लिक का जादू

अपनी प्रयोगशाला में जोएल कोरेलिट्ज़ ने एक बेहद सरल सेटअप तैयार किया। उन्होंने एक आर्दुइनो UNO R4 Minima माइक्रोकंट्रोलर लिया और एक ब्रेडबोर्ड पर तीन अलग-अलग पीज़ो बज़र जोड़े। दो बज़र सीधे ब्रेडबोर्ड पर लगे थे, जबकि तीसरा बज़र कागज की एक शीट पर चिपकाया गया था ताकि वह अधिक गूंज पैदा कर सके। पीज़ो बज़र में वॉल्यूम कंट्रोल नहीं होता, लेकिन उन्होंने एक चतुर ध्वन्यात्मक तरकीब से वॉल्यूम में बदलाव का अहसास कराया।

फ्रीक्वेंसी को धीरे-धीरे बदलते हुए उन्होंने देखा कि कुछ खास फ़्रीक्वेंसी रेंज पर बज़र की आवाज़ स्वाभाविक रूप से तेज़ सुनाई देती है क्योंकि बज़र उस रेजोनेंस को पसंद करता है। इसी रेजोनेंट फ़्रीक्वेंसी का उपयोग करके उन्होंने ऐसा भ्रम पैदा किया जिससे लगता है कि आवाज़ धीमी और तेज़ हो रही है। इसके अलावा, माइक्रोवेव के मेनू में नेविगेट करते समय बटन दबाने की कठोर बीप को बदलकर उन्होंने स्मार्टफोन की तरह एक सॉफ्ट और प्रीमियम क्लिक साउंड तैयार किया। उन्होंने 4,000 Hz की बीप को केवल 1 मिलीसेकंड के लिए चलाकर देखा, जिससे बटन दबाने का अनुभव अत्यधिक संतोषजनक हो गया।

उपभोक्ताओं की मांग और उद्योग विशेषज्ञों की राय

कोलिन कूगन का कहना है कि सीमित संसाधनों और कम क्षमताओं वाले हार्डवेयर के साथ काम करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन सोशल मीडिया पर मिली प्रतिक्रिया ने साबित कर दिया कि लोग इस बदलाव के लिए तैयार हैं। इंस्टाग्राम पर लोगों ने लगातार टिप्पणियां कीं कि वे एक ऐसे माइक्रोवेव के लिए 50 डॉलर यानी लगभग 4,000 रुपये अतिरिक्त देने को तैयार हैं जिसकी आवाज़ बेहतर और सुखद हो।

नॉर्थ अमेरिका में वॉल्वो के डिजिटल यूएक्स डिज़ाइन प्रमुख और व्हर्लपूल में 15 वर्षों तक मुख्य यूएक्स डिज़ाइनर रहे रिचर्ड ह्यूजेस ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उन्होंने बताया कि घरेलू उपकरण बनाने वाली अधिकांश कंपनियों के पास आंतरिक ऑडियो विशेषज्ञता नहीं होती। वे उत्पाद के शोर को कम करने के लिए इंजीनियरिंग पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन साउंड डिज़ाइन पर बहुत कम काम होता है। व्हर्लपूल में रहते हुए रिचर्ड ह्यूजेस ने भी आर्दुइनो से जुड़े पीज़ो बज़र का उपयोग करके प्रयोग किया था और किचनएड प्रो लाइन टोस्टर में एक सॉफ्ट पीज़ो ध्वनि पेश की थी, जिसे उपभोक्ताओं ने फ्लाइट अटेंडेंट कॉल बटन की तरह बेहद पसंद किया था।

रसोई के भविष्य की नई गूंज

रिचर्ड ह्यूजेस के अनुसार, माइक्रोवेव में आवाज़ इसलिए नहीं सुधरी क्योंकि कंपनियां मुख्य रूप से महंगे मॉडलों पर ध्यान देती थीं और सस्ते उत्पादों में पुरानी तकनीकी विशिष्टताओं को ही नए मॉडल में कॉपी-पेस्ट कर देती थीं। हालांकि, अब स्थिति बदल रही है और प्रीमियम उत्पादों की तकनीक धीरे-धीरे साधारण माइक्रोवेव तक पहुंच रही है। उपभोक्ता अब उन छोटे-छोटे विवरणों को ध्यान में रखकर खरीदारी कर रहे हैं जो उनके उपयोग के अनुभव को आनंददायक बनाते हैं।

स्टारलिंग के संस्थापक पैनासोनिक या सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं। हालांकि, अगर कोई कंपनी उनके विचारों को अपनाकर खुद अपने स्तर पर कोड बदलती है, तो भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। जोएल कोरेलिट्ज़ और कोलिन कूगन का उद्देश्य दुनिया भर में रोजमर्रा के उपकरणों से निकलने वाले कष्टप्रद शोर को खत्म करना है और वे जल्द ही अन्य घरेलू उपकरणों की परेशान करने वाली आवाज़ों को सुधारने की योजना बना रहे हैं।

सवाल-जवाब

माइक्रोवेव की बीप की आवाज़ को बदलने के लिए क्या नया हार्डवेयर चाहिए?
बिल्कुल नहीं। स्टारलिंग के साउंड डिजाइनरों ने साबित किया है कि बिना कोई नया पार्ट जोड़े केवल C++ कोड बदलकर मौजूदा पीज़ो बज़र से ही सुरीली आवाज़ें बनाई जा सकती हैं।
पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र क्या है और यह कब से इस्तेमाल हो रहा है?
पीज़ोइलेक्ट्रिक बज़र एक बेहद सस्ता इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट है जो विद्युत प्रवाह से कंपन करके आवाज़ बनाता है। जापानी निर्माताओं द्वारा 1970 के दशक से इसका व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
स्टारलिंग कंपनी के संस्थापक कौन हैं?
स्टारलिंग कंपनी के संस्थापक जोएल कोरेलिट्ज़ और कोलिन कूगन हैं, जो सोनी, माइक्रोसॉफ्ट, नेटफ्लिक्स और फोर्ड जैसी कंपनियों के साथ साउंड डिज़ाइन का काम कर चुके हैं।
माइक्रोवेव निर्माता पहले बेहतर स्पीकर क्यों नहीं लगाते थे?
घरेलू उपकरणों के बाजार में कड़ा मुकाबला होने के कारण कंपनियां लागत कम रखना चाहती हैं। सस्ता पीज़ो बज़र काम चला देता था, इसलिए कंपनियां महंगा स्पीकर नहीं लगाती थीं।
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