हिन्दू धर्मग्रंथों में पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और उनकी मुक्ति के मार्ग को सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों में से एक माना गया है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न किया जाएगा, जबकि इसके ठीक अगले दिन यानी 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध होगा। इसी के साथ सोलह दिनों तक चलने वाले श्रद्धा और आस्था के महापर्व पितृपक्ष की शुरुआत हो जाएगी। इस कालखंड को 'सोलह श्राद्ध' या 'महालय पक्ष' भी कहा जाता है। इस पावन अवधि में सनातन धर्म के अनुयायी अपने पूर्वजों के प्रति अपना आदर और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तर्पण, दान-पुण्य और पिंडदान जैसी शास्त्रीय परंपराओं का पालन करते हैं। पितृपक्ष के इन दिनों में बिहार में स्थित पौराणिक गयाजी धाम में देश के कोने-कोने के साथ-साथ विदेशों से भी लाखों श्रद्धालुओं का जमावड़ा होता है। आखिर पिंडदान के लिए गयाजी को संसार का सबसे श्रेष्ठ और पवित्र स्थल क्यों माना गया है, और क्यों हर व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम एक बार अपने पितरों के निमित्त यहां आकर अनुष्ठान करना चाहता है, इसकी महिमा अत्यंत निराली है।
महालय पक्ष: पूर्वजों को समर्पित 16 पवित्र दिन
धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन हिंदू पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष की अवधि भाद्रपद महीने की पूर्णिमा तिथि से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलती है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है। इन कुल 16 दिनों की समयावधि में लोग अपने स्वर्गीय माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य सभी दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विशेष श्राद्ध और जल तर्पण करते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार, इस काल में हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी लोक पर अपने वंशजों के निकट आते हैं और उनके द्वारा दी जाने वाली श्रद्धा और जल-अन्न को ग्रहण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि के दौरान पूर्वजों का स्मरण करने और उनके नाम से गरीबों को भोजन कराने या दान-पुण्य करने से पितरों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे कुल में सुख, शांति और समृद्धि की वृद्धि होती है।
धार्मिक ग्रंथों में गयाजी की महिमा और गयासुर की पौराणिक कथा
गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण जैसे पवित्र हिंदू ग्रंथों में गयाजी को पितृ कर्म, तर्पण और पिंडदान के लिए ब्रह्मांड का सर्वोच्च तीर्थ माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि गयाजी धाम में विधि-विधान से किया गया पिंडदान पितरों को सीधे विष्णु लोक में स्थान दिलाता है। मान्यता है कि इस पावन भूमि पर किया जाने वाला तर्पण और श्राद्ध न केवल मृत पूर्वजों को जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र से सदा के लिए मुक्ति दिलाता है, बल्कि पिंडदान करने वाले व्यक्ति के कुल की सात पीढ़ियों का भी उद्धार कर देता है।
इस पवित्र स्थान की उत्पत्ति के पीछे एक बेहद प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, गयासुर नाम का एक परम तपस्वी असुर था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर और जगत के कल्याण के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने उसके शरीर पर अपने दिव्य चरण रखे थे। आज गयाजी में जिस स्थान पर भगवान विष्णु के वे पावन पदचिह्न मौजूद हैं, उसे ही विष्णुपद मंदिर के रूप में पूजा जाता है। गयासुर को मिले दैवीय वरदान के प्रभाव से यह पूरा क्षेत्र अत्यंत पावन हो गया। इस वरदान के अनुसार, जो भी मनुष्य इस पावन क्षेत्र में आकर अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान करेगा, उन पूर्वजों की आत्मा को यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिलेगी और उन्हें परम शांति तथा मोक्ष की प्राप्ति होगी।
भगवान विष्णु का पावन विष्णुपद मंदिर और श्रीराम-सीता का संबंध
गयाजी धाम में फल्गु नदी के सुंदर और रेतीले तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर आस्था का एक भव्य केंद्र है। यह ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर भगवान विष्णु को पूर्णतः समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे पवित्र चरण चिह्न विराजमान हैं। इस पावन शिलाखंड पर शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे नौ अत्यंत शुभ और दिव्य धार्मिक प्रतीक अंकित हैं, जिनके दर्शन मात्र से ही मनुष्य के जन्म जन्मांतर के पाप कट जाते हैं। यह पवित्र स्थान दुनिया भर के हिंदुओं के लिए पितरों के मोक्ष और तर्पण का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है।
इसके अतिरिक्त, रामायण काल से भी इस स्थान का गहरा और अटूट संबंध रहा है। एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान राम अपनी पत्नी माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ यहां आए थे और उन्होंने अपने पूज्य पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गयाजी में ही श्राद्ध कर्म संपन्न किया था। इसी यात्रा के दौरान माता सीता द्वारा फल्गु नदी के किनारे बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ को पिंडदान करने की कथा भी पूरे देश में बहुत श्रद्धा के साथ सुनी और सुनाई जाती है।
गयाजी धाम की 48 पवित्र वेदियां और मोक्ष के स्थल
गयाजी में पिंडदान का अनुष्ठान केवल एक स्थान पर नहीं, बल्कि विभिन्न महत्वपूर्ण पवित्र वेदियों पर संपन्न किया जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार, इस पावन क्षेत्र में कुल 48 प्रमुख वेदियां और पवित्र धार्मिक स्थल माने गए हैं, जहां जाकर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। इन वेदियों में सबसे महत्वपूर्ण विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी का पावन तट, अक्षयवट का विशाल और अमर वृक्ष, माता सीता का सीता कुंड, पंचतीर्थ, प्रेतशिला, रामशिला, ब्रह्मकुंड और गया शिरोमणि क्षेत्र शामिल हैं।
शास्त्रों के अनुसार, पिंडदान केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति असीम कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र माध्यम है। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि गयाजी की इन पवित्र वेदियों पर पिंडदान करने से मृत पूर्वजों की अधूरी सांसारिक इच्छाएं तृप्त हो जाती हैं, जिससे उन्हें आंतरिक शांति मिलती है और उनकी आत्मा उच्च दिव्य लोकों की ओर अग्रसर होती है। अपनी इसी अतुलनीय आध्यात्मिक गरिमा और सदियों पुरानी अटूट परंपरा के कारण आज भी गयाजी धाम पूरे विश्व में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के मोक्ष और असीम श्रद्धा का सबसे बड़ा और सर्वोपरि केंद्र बना हुआ है।


















