जब पलामू कहलाता था 'बाघ देश': किंगफिशर के रंगीन पंखों और पेरिस के फैशन से जुड़ी एक भूली-बिसरी दास्तानjharkhand
3 घंटे पहले· 0

जब पलामू कहलाता था 'बाघ देश': किंगफिशर के रंगीन पंखों और पेरिस के फैशन से जुड़ी एक भूली-बिसरी दास्तान

झारखंड का पलामू कभी 'बाघ देश' के नाम से मशहूर था, जहां किंगफिशर पक्षियों का बड़े पैमाने पर शिकार होता था और उनके चमकीले पंख पेरिस की महिलाओं के फैशनेबल हैट सजाने के लिए भेजे जाते थे।

झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व आज जिस प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवों के लिए देश-विदेश के सैलानियों को अपनी ओर खींचता है, उसका अतीत उससे कहीं ज्यादा रोमांचक और चौंकाने वाला है। एक दौर ऐसा भी था जब इस इलाके को 'बाघ देश' के नाम से पुकारा जाता था। तब यह क्षेत्र सिर्फ बाघों और दूसरे जंगली जानवरों की भारी आबादी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी जैव-विविधता की वजह से भी दुनिया भर में पहचाना जाता था।

घने जंगल, जलस्रोत और पक्षियों का बसेरा

पलामू के जानकार डॉ. डी. एस. श्रीवास्तव ने लोकल18 से बातचीत में बताया कि यह कहानी कोई दशक-दो दशक नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पुरानी है। उस जमाने में यहां के घने जंगल, तालाब, आहर और कुदरती जलस्रोत वन्यजीवों और पक्षियों के लिए एकदम मुफीद ठिकाने माने जाते थे। बाघ और हिरण के साथ-साथ यहां तरह-तरह के पक्षी बहुतायत में पाए जाते थे।

इन्हीं में से एक था किंगफिशर, जो अपने आकर्षक और रंग-बिरंगे पंखों की वजह से दूर-दूर तक मशहूर था। हालत यह थी कि क्षेत्र के लगभग हर जलस्रोत के किनारे यह पक्षी बेहद आसानी से नजर आ जाता था।

सुंदर पंखों ने बुलाई शिकारियों की भीड़

डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पलामू के जंगलों में किंगफिशर पक्षियों की बड़ी तादाद मौजूद थी। लेकिन इनकी यही खूबसूरती इनके लिए मुसीबत बन गई। इन पक्षियों के चमकीले पंखों की विदेशों में जबरदस्त मांग थी, और इसी मांग को पूरा करने के लिए पटना की मीरशिकार टोली से शिकारी दल पलामू पहुंचने लगे।

ये दल बड़ी संख्या में पक्षियों का शिकार करते, उन्हें पकड़कर उनके रंगीन पंख निकाल लेते और फिर इन पंखों को व्यापारिक रास्तों से सीधे फ्रांस की राजधानी पेरिस तक भेजा जाता था।

पेरिस के फैशन से जुड़ा था पलामू का दर्द

कहा जाता है कि उस दौर में पेरिस की महिलाओं के फैशनेबल हैट और परिधानों की साज-सज्जा में इन्हीं रंग-बिरंगे पंखों का इस्तेमाल होता था। यानी पलामू के जंगलों में बहता खून सात समंदर पार फैशन की चमक बढ़ा रहा था। यह सिलसिला सिर्फ किंगफिशर तक सीमित नहीं था — दूसरे पक्षियों और वन्यजीवों के अंगों का भी कारोबार होता था।

स्थानीय स्तर पर चैनपुर और शाहपुर इलाके के बहेलिया समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में पक्षियों को मारते थे। शिकार किए गए पक्षियों की खाल और पंखों को सुखाकर व्यापारियों के हाथों बेच दिया जाता था।

1895 के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है गवाही

डॉ. श्रीवास्तव बताते हैं कि इन सारी बातों का जिक्र वर्ष 1895 के सर्वे एवं सेटलमेंट रिकॉर्ड में मिलता है। तत्कालीन अधिकारी डी.एच.आई. सैंडर्स की तैयार की गई पलामू से जुड़ी पहली रिपोर्ट में भी ऐसी गतिविधियों का उल्लेख दर्ज है।

पलामू का यह इतिहास एक तरफ इसकी समृद्ध जैव-विविधता की कहानी कहता है, तो दूसरी तरफ यह भी आईना दिखाता है कि कैसे कभी वन्यजीवों और पक्षियों का शिकार महज वैश्विक फैशन उद्योग की मांग पूरी करने के लिए किया जाता था। आज जब वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण की सुरक्षा पर खास जोर दिया जा रहा है, ऐसे में पलामू का यह अतीत हमें प्रकृति और जैव-विविधता को बचाने के महत्व की एक गहरी याद दिलाता है।

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