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अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चा तेल अस्थिर, ग्लोबल इकोनॉमी पर दबावबाज़ार
1 घंटे पहले· 2

अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चा तेल अस्थिर, ग्लोबल इकोनॉमी पर दबाव

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है, जिससे वैश्विक बाजारों में खलबली मच गई है। इसके साथ ही IMF ने वैश्विक और भारतीय आर्थिक विकास के अनुमानों में कटौती की है।

अमित पटेलअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
शेयर

दुनियाभर के शेयर बाजारों और कमोडिटी जगत में अमेरिका और ईरान के बीच उपजे ताज़ा सैन्य संघर्ष ने गहरी चिंता बढ़ा दी है। इस स्थिति ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव को जन्म दिया है, जिससे वैश्विक निवेशक काफी घबराए हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान युद्ध को समाप्त करने की इच्छा जताने के तुरंत बाद, ऐसी खबरें आईं कि अमेरिकी सेना ने ईरान पर नए सिरे से मिसाइल हमले किए हैं। इस घटनाक्रम के बीच सुबह 08:30 बजे के आसपास कच्चा तेल लगभग 75 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था। इन तेज और अनिश्चित बदलावों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेशकों को पूरी तरह अस्थिर कर दिया है।

शेयर बाजारों पर असर

इस घोषणा और संघर्ष के बढ़ने के बाद भारतीय इक्विटी बाजारों में बिकवाली का दौर देखा गया। बुधवार को Nifty 50 और Sensex दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों को 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बाजार पूंजी का नुकसान उठाना पड़ा। इस झटके का असर अमेरिकी बाजारों में भी दिखा, जहाँ Dow Jones में लगभग 800 अंकों की भारी गिरावट आई। इसके अलावा S&P 500 भी मंदड़िये रुझान (बेयरिश ट्रेंड) में बना हुआ है।

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तेल की कीमतों का इतिहास और वर्तमान

ब्रेंट क्रूड में हो रहे बदलाव मुख्य रूप से इस संघर्ष और समुद्री परिवहन जोखिमों से जुड़े हैं। जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया और वहां ताला लगा दिया था, तब तेल की कीमतों में लगभग 65 फीसदी का उछाल आया था। मार्च में ब्रेंट क्रूड का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में डर कम होने के कारण कीमतों में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। हालिया संघर्ष ने फिर से थोड़ी तेजी को प्रेरित किया है, लेकिन कीमतें अब भी अपने उच्चतम स्तर से नीचे हैं।

मानवीय और आर्थिक नुकसान

बाजारों के इन घटनाक्रमों के बीच मानवीय नुकसान भी भयावह है। एक आधिकारिक ईरानी स्रोत के अनुसार, अब तक 3,468 लोगों की जान जा चुकी है। HRANA के दस्तावेजों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 3,636 है, जिसमें 1,221 सैन्यकर्मी और 1,701 नागरिक शामिल हैं। अमेरिकी और इजरायली अनुमानों में यह संख्या 6,000 से अधिक ईरानी सैन्यकर्मियों की बताई गई है। यह संघर्ष फरवरी 2026 में शुरू हुआ था जो अभी भी जारी है।

IMF का वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था पर अनुमान

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने 2026 के लिए वैश्विक विकास के अपने अनुमान को 10 बेसिस पॉइंट कम करके 3 फीसदी कर दिया है। यह अनुमान इस उम्मीद पर आधारित था कि होर्मुज जलडमरूमध्य जुलाई के मध्य तक फिर से खुल जाएगा और क्षेत्र मार्च 2027 तक स्थिर हो जाएगा। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ संघर्ष विराम समझौता छोड़ने के बाद इस दृष्टिकोण पर नए सिरे से संदेह पैदा हो गया है। साथ ही, IMF ने भारत की GDP वृद्धि दर का अनुमान भी घटाया है। अप्रैल में भारत के लिए 6.5 फीसदी का अनुमान था, जो अब गिरकर 2026 के लिए 6.4 फीसदी रह गया है।

आर्थिक मंदी का बढ़ता खतरा

कच्चे तेल के अलावा, कई अन्य दबाव मंदी की आशंकाओं को और बढ़ा रहे हैं। विभिन्न कंपनियों में AI के कारण तकनीकी नौकरियों में कटौती देखी गई है। कई देशों में उपभोक्ता विश्वास भी कमजोर हुआ है। वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ रही है जबकि दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक विकास धीमा पड़ रहा है। ये सभी कारक मिलकर दुनिया को उम्मीद से कहीं जल्दी मंदी की चपेट में ला सकते हैं।

तकनीक, रोजगार और जलवायु

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) विभिन्न उद्योगों के काम करने के तरीके को बदल रहा है। Anthropic ने कहा है कि उसका मिशन ऐसी AI विकसित करना है जो मानवता के काम आए। इसके बावजूद, साल की पहली छमाही में 1 लाख से अधिक टेक कर्मचारियों ने अपनी नौकरियां खो दीं। कई कंपनियां तेजी से AI को अपना रही हैं, जिसके चलते कर्मचारियों को अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए कौशल सीखने (रिसकिलिंग) की जरूरत महसूस हो रही है। जलवायु लक्ष्यों की बात करें तो नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करना कठिन बना हुआ है। कई देशों के पास कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने की स्पष्ट योजना नहीं है, केवल भूटान का प्रदर्शन बेहतर रहा है। भारत नीति आयोग के अनुसार E20 पेट्रोल के माध्यम से तेल आयात कम करने और "आत्मनिर्भर" भारत का समर्थन करने पर जोर दे रहा है। भारत के लिए नेट जीरो का लक्ष्य यूरोपीय देशों की तुलना में थोड़ा दूर जरूर है, लेकिन भारत की 1.4 अरब की आबादी के कारण इसका पैमाना काफी मायने रखता है।

इसका आप पर असर

भारत में: कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता का सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है, जो आम बजट को प्रभावित करेगा।

निवेशकों के लिए: वैश्विक अस्थिरता के कारण शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव रह सकता है, इसलिए जोखिम प्रबंधन को प्राथमिकता दें।

सवाल-जवाब

अमेरिका-ईरान संघर्ष का कच्चे तेल पर क्या असर पड़ा है?
संघर्ष ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। पहले होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से कीमतें 120 डॉलर तक पहुंची थीं और अब हालिया मिसाइल हमलों के बाद फिर अस्थिरता बढ़ गई है।
IMF ने भारत की GDP को लेकर क्या अनुमान दिया है?
IMF ने भारत की 2026 की GDP विकास दर के अनुमान को अप्रैल में अनुमानित 6.5 फीसदी से घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया है।
बाजार पर इस तनाव का तात्कालिक असर क्या हुआ?
भारतीय शेयर बाजारों (Nifty 50 और Sensex) में भारी बिकवाली हुई और निवेशकों को 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। अमेरिका में Dow Jones में भी 800 अंकों की गिरावट देखी गई।
क्या वैश्विक आर्थिक मंदी की संभावना है?
हां, वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई, धीमी विकास दर, और AI के कारण नौकरियों में कटौती के दबाव के कारण विशेषज्ञों को मंदी की आशंका है।
अमित पटेल
लेखक के बारे मेंअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताबिज़नेस समाचार, वित्तीय बाज़ार, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट मामले, स्टार्टअप, उद्यमिता, आर्थिक रुझान, टेक्नोलॉजी बिज़नेस, निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, स्टार्टअप, तकनीक और आर्थिक रुझानों को कवर करते हैं। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले कारोबार और उद्योगों की ख़बरें, बाज़ार विश्लेषण और अंतर्दृष्टि देते हैं।

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, उद्यमिता, तकनीक और आर्थिक घटनाक्रमों को कवर करते हैं। वे ब्रेकिंग बिज़नेस न्यूज़, कॉर्पोरेट रणनीतियों, शेयर बाज़ार के रुझानों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले औद्योगिक नवाचारों पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, स्पष्टता और गहन विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए अमित पाठकों को जटिल कारोबारी विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करते हैं। उनकी कवरेज वित्तीय बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उभरते उद्योगों, आर्थिक नीति, निवेश रुझानों और डिजिटल बदलाव तक फैली है।

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