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क्रेडिट डेरिवेटिव्स पर लगी पाबंदी हटाई RBI ने, वित्तीय संस्थाओं और बड़े कॉर्पोरेट को मिली खुली आज़ादीबाज़ार
3 घंटे पहले· 2

क्रेडिट डेरिवेटिव्स पर लगी पाबंदी हटाई RBI ने, वित्तीय संस्थाओं और बड़े कॉर्पोरेट को मिली खुली आज़ादी

भारतीय रिज़र्व बैंक ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार के लिए ताजे दिशानिर्देश जारी किए हैं जिनके तहत बैंकों और बड़ी कंपनियों को CDS और TRS जैसे साधनों का उपयोग बिना उद्देश्य-प्रतिबंध के करने की छूट मिलेगी। छोटे निवेशकों के लिए पुरानी सुरक्षा सीमाएं बरकरार रखी गई हैं।

Amit PatelAmit PatelBusiness Correspondent 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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भारतीय रिज़र्व बैंक ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार को नई दिशा देने के लिए ताजे नियम जारी किए हैं। इनका मुख्य मकसद देश के कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को और गहरा बनाना तथा बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं को क्रेडिट रिस्क का कुशलता से प्रबंधन करने में सक्षम बनाना है। यह कदम सरकार के बजट में इस बाजार को प्रोत्साहन देने की घोषणा के बाद उठाया गया है।

बैंकों और बड़ी कंपनियों को मिली नई छूट

नए ढांचे के तहत भारत में रहने वाले गैर-रिटेल उपयोगकर्ता, यानी बैंक, वित्तीय संस्थाएं और बड़ी कंपनियां, अब क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) और टोटल रिटर्न स्वैप (TRS) जैसे क्रेडिट डेरिवेटिव्स इंस्ट्रूमेंट का उपयोग बिना किसी उद्देश्य-संबंधी पाबंदी के कर सकेंगे। पहले इन साधनों के उपयोग पर कुछ निश्चित प्रतिबंध थे, लेकिन अब इन संस्थाओं को यह तय करने की पूरी आज़ादी होगी कि वे इन्हें किस काम के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। इससे उन्हें अपने क्रेडिट जोखिम का अधिक कुशलता से प्रबंधन करने और अपनी बैलेंस शीट को मजबूत करने में सहूलियत होगी।

विदेशी निवेशकों पर लागू होंगी सीमाएं

जो निवेशक भारत से बाहर रहते हैं, यानी नॉन रेजिडेंशियल निवेशक, उन्हें इन क्रेडिट डेरिवेटिव्स साधनों का उपयोग केवल हेजिंग के लिए करने की अनुमति होगी। हेजिंग का मतलब है अपने निवेश को संभावित नुकसान से बचाना। इसके अलावा, नॉन रेजिडेंशियल निवेशकों के साथ होने वाली क्रेडिट डेरिवेटिव डील का भुगतान भारतीय रुपये या विदेशी मुद्रा, दोनों में से किसी में भी किया जा सकेगा।

छोटे निवेशकों के लिए कुछ नहीं बदला

आरबीआई ने यह सुनिश्चित किया है कि इस सुधार से रिटेल निवेशकों पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े। उनके लिए पुरानी सीमाएं पहले की तरह ही लागू रहेंगी ताकि छोटे निवेशकों को जटिल वित्तीय उत्पादों के बड़े जोखिम का सामना न करना पड़े। रिटेल रेजिडेंशियल उपयोगकर्ता, जिनमें व्यक्तिगत निवेशक शामिल नहीं हैं, क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप का उपयोग सिर्फ हेजिंग के उद्देश्य से ही कर सकेंगे।

लोन पर क्रेडिट डेरिवेटिव्स की मांग ठुकराई

हालांकि एक महत्वपूर्ण मांग जो केंद्रीय बैंक ने स्वीकार नहीं की, वह थी लोन पर क्रेडिट डेरिवेटिव्स की अनुमति देने की। आरबीआई का मानना है कि इस तरह की इजाजत से बाजार में अनावश्यक जोखिम पैदा हो सकता है। इसलिए फिलहाल ऐसे लेनदेन को मंजूरी नहीं दी गई है। इस सतर्क फैसले से बाजार में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

बाजार और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर

विशेषज्ञों का कहना है कि इन नए नियमों से भारतीय कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को बड़ा फायदा होगा। कंपनियां अपना क्रेडिट रिस्क किसी दूसरे पक्ष को पहले से बेहतर तरीके से ट्रांसफर कर सकेंगी, जिससे बॉन्ड जारी करना आसान होगा। साथ ही बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी और निवेशकों के सामने निवेश के नए विकल्प भी खुलेंगे।

बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं इन साधनों की मदद से अपनी बैलेंस शीट को अधिक सुरक्षित और मजबूत बना सकेंगी, जिससे पूरे वित्तीय तंत्र की स्थिरता बढ़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम भारतीय क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार को वैश्विक मानकों के और करीब लाएगा। कंपनियों के लिए धन जुटाने की लागत भी कम हो सकती है और निवेशकों का भरोसा पहले से अधिक बढ़ेगा।

इसका आप पर असर

  • निवेशकों के लिए: कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में लिक्विडिटी बढ़ने से निवेशकों को नए और बेहतर निवेश विकल्प मिल सकते हैं।
  • कंपनियों के लिए: क्रेडिट रिस्क ट्रांसफर आसान होने से बॉन्ड जारी करना और धन जुटाना सस्ता हो सकता है, जिसका फायदा उपभोक्ताओं और कर्मचारियों तक पहुंच सकता है।
  • बैंकों के लिए: बैंक और वित्तीय संस्थाएं CDS और TRS का उपयोग बिना उद्देश्य-पाबंदी के कर सकेंगी, जिससे उनकी बैलेंस शीट अधिक सुरक्षित और मजबूत होगी।

सवाल-जवाब

आरबीआई ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स के नए नियम क्यों जारी किए?
सरकार के बजट में क्रेडिट डेरिवेटिव्स बाजार को बढ़ावा देने की घोषणा के बाद आरबीआई ने कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को मजबूत करने और वित्तीय संस्थाओं को क्रेडिट रिस्क के बेहतर प्रबंधन में मदद देने के लिए ये नियम जारी किए।
CDS और TRS क्या होते हैं?
क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) और टोटल रिटर्न स्वैप (TRS) क्रेडिट डेरिवेटिव्स इंस्ट्रूमेंट हैं जिनका उपयोग क्रेडिट रिस्क को एक पक्ष से दूसरे पक्ष को ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।
नए नियमों से बैंकों को क्या फायदा होगा?
बैंक और वित्तीय संस्थाएं अब CDS और TRS का उपयोग बिना किसी उद्देश्य-प्रतिबंध के कर सकेंगी, जिससे वे अपना क्रेडिट जोखिम बेहतर ढंग से प्रबंधित कर अपनी बैलेंस शीट को अधिक सुरक्षित बना सकेंगी।
क्या रिटेल निवेशकों के लिए भी नियम बदले हैं?
नहीं, रिटेल निवेशकों के लिए पुरानी सीमाएं पहले जैसी ही रहेंगी ताकि उन्हें जटिल वित्तीय उत्पादों के अधिक जोखिम से बचाया जा सके।
विदेशी निवेशक क्रेडिट डेरिवेटिव्स का उपयोग किस लिए कर सकते हैं?
नॉन रेजिडेंशियल निवेशक इन साधनों का उपयोग केवल हेजिंग के लिए कर सकेंगे, यानी अपने निवेश को संभावित नुकसान से बचाने के उद्देश्य से।
क्या लोन पर भी क्रेडिट डेरिवेटिव्स की अनुमति मिली है?
नहीं, आरबीआई ने यह मांग यह कहते हुए अस्वीकार कर दी कि इससे बाजार में अनावश्यक जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए फिलहाल ऐसे लेनदेन को मंजूरी नहीं दी गई है।
विदेशी निवेशकों के साथ डील का भुगतान किस मुद्रा में होगा?
नॉन रेजिडेंशियल निवेशकों के साथ क्रेडिट डेरिवेटिव डील का भुगतान भारतीय रुपये या विदेशी मुद्रा, दोनों में से किसी में भी किया जा सकेगा।
इन नए नियमों से कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां अपना क्रेडिट रिस्क दूसरे पक्ष को बेहतर तरीके से ट्रांसफर कर सकेंगी, जिससे बॉन्ड जारी करना आसान होगा, बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।
#बाज़ार#क्रेडिटडेरिवेटिव्स#RBIनएनियम#कॉर्पोरेटबॉन्डमार्केट#क्रेडिटडिफॉल्टस्वैप#वित्तीयबाजार#बैंकिंगनियम#हेजिंग#निवेश

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