मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर अमेरिकी सैन्य नीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि अब से अमेरिकी सैनिकों पर होने वाले किसी भी हमले का जवाब देने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार नहीं करना होगा। यह जवाबी कार्रवाई अब पूरी तरह से ऑटोमैटिक होगी। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर यह ऐलान किया। इस फैसले ने वित्तीय बाजारों में मची उस खामोशी को तोड़ दिया है, जिसमें निवेशक मानकर चल रहे थे कि कूटनीति के जरिए कोई न कोई शांति समझौता हो जाएगा।
सैन्य फैसलों में बड़ा बदलाव
अपने समर्थकों को दिए गए एक सख्त संदेश में ट्रंप ने चेतावनी दी, "हर बार जब ईरान किसी अमेरिकी सैनिक को मारेगा, तो उन्हें उस हत्या की कई गुना ज्यादा कीमत चुकानी होगी!" अक्सर नेता ऐसे कड़े बयान देते हैं, लेकिन इस बार बात सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है। बताया जा रहा है कि जवाबी हमले का यह अधिकार अब सीधे मिलिट्री कमांडरों को सौंप दिया गया है। इनमें सेक्रेटरी ऑफ वॉर पीट हेगसेथ और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन डेनियल कैन के साथ-साथ सेना के अन्य शीर्ष अधिकारी शामिल हैं।
आमतौर पर जब भी विदेशों में अमेरिकी सैनिकों पर हमला होता है, तो राष्ट्रपति अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ बैठक करते हैं। इसके बाद ही तय होता है कि जवाबी कार्रवाई करनी है या नहीं। यह विचार-विमर्श का समय कई बार कूटनीतिक बातचीत के जरिए युद्ध को टालने का काम करता था। लेकिन अब पहले से ही हमले की मंजूरी देकर सरकार ने यह गुंजाइश खत्म कर दी है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भविष्य में ईरान समर्थित गुटों ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, तो अमेरिकी सेना बिना किसी नई राजनीतिक मंजूरी के तुरंत और जोरदार पलटवार करेगी।
तनाव के पीछे की असली वजह
यह आक्रामक रुख मिडिल ईस्ट में हाल ही में हुई कई गंभीर घटनाओं के बाद अपनाया गया है। पिछले वीकेंड पर जॉर्डन और इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों में तीन अमेरिकी सैनिकों की जान चली गई थी। इन घटनाओं से यह साफ हो गया है कि इस इलाके में तैनात अमेरिकी बलों पर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जहां कई विद्रोही गुट लगातार ड्रोन और रॉकेट से हमले कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, अमेरिकी सेना भी लगातार आक्रामक अभियान चला रही है। दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने के लिए अमेरिका ने लगातार नौ रातों तक एयरस्ट्राइक की है। इस बिगड़ते हालात के बीच, तेहरान ने भी हाल ही में हुए एक अंतरिम कूटनीतिक समझौते से अपने हाथ खींच लिए हैं। समझौते के टूटने के साथ ही उन सभी रास्तों पर भी ताला लग गया है, जो दोनों देशों के बीच तनाव को कम कर सकते थे।
बाजार की उम्मीदों को लगा झटका
वीकेंड से पहले शेयर और कमोडिटी बाजार काफी हद तक शांत थे। व्यापारी और बड़े निवेशक इस उम्मीद में बैठे थे कि पहले की तरह इस बार भी बैक-चैनल बातचीत के जरिए कोई न कोई बीच का रास्ता निकल आएगा। पिछले तीन बड़े विवादों में भी इसी तरह शांति समझौते हुए थे, इसलिए बाजार मानकर चल रहा था कि चौथी बार भी युद्ध टल जाएगा।
लेकिन ट्रंप के नए आदेश ने इस झूठी शांति को पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया है। अब जबकि जवाबी हमले की मंजूरी पहले ही मिल चुकी है और तेहरान समझौते से पीछे हट चुका है, तो शांति का कोई भी ढांचा नहीं बचा है। हालात अब बातचीत के दौर से निकलकर उस मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां सिर्फ एक चिंगारी भड़कने का इंतजार है। इसके नतीजे में जोखिम वाले एसेट्स में भारी गिरावट आ रही है, और सुरक्षित निवेश के विकल्पों की तरफ पैसा तेजी से भाग रहा है।
डॉलर में जोरदार वापसी
दुनिया की प्रमुख करंसी के मुकाबले डॉलर की ताकत मापने वाला यूएस डॉलर इंडेक्स इस तनाव का सीधा असर दिखा रहा है। यूरोपियन मार्केट के खुलते ही डॉलर में भारी खरीदारी देखी गई, जिससे यह इंडेक्स उछलकर 101.00 के बेहद अहम स्तर तक पहुंच गया। यह अपने निचले स्तर से करीब 0.4% की तेजी है। डॉलर को यह सपोर्ट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के दोबारा बंद होने की वजह से भी मिल रहा है। यह समुद्री रास्ता ग्लोबल एनर्जी मार्केट के लिए बहुत अहम है। इसके बंद होने से कच्चे तेल की सप्लाई रुक जाती है, जिससे ऊर्जा की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। महंगी ऊर्जा का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है, जिससे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ती हैं। यह पूरा माहौल डॉलर को निवेश के लिए सबसे सुरक्षित जगह बना देता है।
अमेरिकी डॉलर (USD) आज भी ग्लोबल फाइनेंस सिस्टम की रीढ़ है। यह सिर्फ अमेरिका की करंसी नहीं है, बल्कि दुनिया के कई विकासशील देशों में इसे व्यापार के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। ग्लोबल फॉरेन एक्सचेंज में होने वाले कुल ट्रेड का 88% से ज्यादा हिस्सा सिर्फ डॉलर में होता है। साल 2022 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में हर दिन डॉलर में 6.6 ट्रिलियन डॉलर का लेन-देन होता है। यह भारी भरकम लिक्विडिटी ही बड़े निवेशकों को संकट के समय कैश में पैसा सुरक्षित रखने का भरोसा देती है।
डॉलर का यह दबदबा दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ था, जब इसने दुनिया की रिजर्व करंसी के रूप में ब्रिटिश पाउंड की जगह ली थी। दशकों तक डॉलर की कीमत सोने के रिजर्व से तय होती थी। यानी विदेशी सरकारें एक तय रेट पर अपने डॉलर के बदले सोना ले सकती थीं। लेकिन 1971 में जब ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट टूटा, तो यह व्यवस्था हमेशा के लिए खत्म हो गई। डॉलर का सोने से नाता टूट गया और यह पूरी तरह से एक फिएट करंसी बन गया। अब इसकी कीमत किसी धातु से नहीं, बल्कि फेडरल रिजर्व की नीतियों और अमेरिकी सरकार की साख पर निर्भर करती है।
फेडरल रिजर्व की नीतियां और उनका असर
आज के समय में डॉलर की कीमत सबसे ज्यादा फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी से तय होती है। अमेरिका के इस केंद्रीय बैंक के पास दो सबसे बड़े काम हैं: देश में ज्यादा से ज्यादा रोजगार पैदा करना और महंगाई को काबू में रखना। महंगाई को लंबे समय तक 2% के टारगेट के आसपास रखना फेडरल रिजर्व का मुख्य लक्ष्य होता है। इन दोनों लक्ष्यों को एक साथ साधना काफी मुश्किल काम है और इसके लिए बैंक को लगातार कड़े फैसले लेने पड़ते हैं।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए फेडरल रिजर्व के पास सबसे बड़ा हथियार ब्याज दरें हैं। जब अर्थव्यवस्था में महंगाई तेजी से बढ़ने लगती है और यह 2% के टारगेट से ऊपर चली जाती है, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ा देता है। इससे कर्ज लेना महंगा हो जाता है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो जाती है। लेकिन इसके साथ ही, डॉलर में निवेश करने पर रिटर्न ज्यादा मिलता है, जिससे दुनिया भर के निवेशक डॉलर की तरफ खिंचे चले आते हैं और इसकी वैल्यू बढ़ जाती है। इसके उलट, जब महंगाई दर 2% से नीचे गिर जाती है या बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करता है। इससे डॉलर कमजोर हो जाता है।
क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) और टाइटनिंग (QT)
जब अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही होती है और सिर्फ ब्याज दरें घटाने से काम नहीं चलता, तब फेडरल रिजर्व क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) का सहारा लेता है। इस प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक भारी मात्रा में नए डिजिटल डॉलर छापता है और उनका इस्तेमाल वित्तीय संस्थानों से सरकारी बॉन्ड खरीदने में करता है। इसका मकसद बाजार में कैश का फ्लो बढ़ाना है, ताकि बैंक एक-दूसरे को कर्ज देने से ना डरें। 2008 के ग्रेट फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया गया था। यह एक आखिरी विकल्प होता है, लेकिन बाजार में बहुत ज्यादा कैश आ जाने से डॉलर की कीमत आमतौर पर गिर जाती है।
इसके ठीक विपरीत, क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) की प्रक्रिया होती है। इसमें फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और मैच्योर हो रहे बॉन्ड्स से मिलने वाले पैसे को दोबारा निवेश नहीं करता। इससे बाजार से अतिरिक्त लिक्विडिटी कम हो जाती है। मनी सप्लाई घटने के कारण आमतौर पर डॉलर को मजबूती मिलती है और यह निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बन जाता है।
फॉरेक्स मार्केट के ताजा हालात
मिडिल ईस्ट के तनाव और डॉलर की मजबूती का सीधा असर ग्लोबल करंसी मार्केट पर दिख रहा है। ब्रिटिश पाउंड में भारी बिकवाली का दबाव है। GBP/USD का जोड़ा एक बार फिर 1.3420 के आसपास अपने निचले स्तरों की तरफ खिसक रहा है। हफ्ते की शुरुआत ही इस गिरावट के साथ हुई है, क्योंकि निवेशक अमेरिका-ईरान विवाद को लेकर काफी डरे हुए हैं और सुरक्षित निवेश की तरफ भाग रहे हैं। अब सबकी नजरें मंगलवार को आने वाली यूके एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो पाउंड में और ज्यादा उतार-चढ़ाव ला सकती है।
इसी तरह, यूरो भी लगातार तीसरे दिन दबाव में कारोबार कर रहा है। EUR/USD का भाव 1.1400 के बेहद अहम सपोर्ट लेवल के करीब पहुंच गया है। मिडिल ईस्ट में बढ़ती अनिश्चितता और डॉलर के शानदार प्रदर्शन ने यूरो की कमर तोड़ दी है। आने वाले दिनों में बाजार की नजर यूरोपियन सेंट्रल बैंक के ब्याज दरों पर होने वाले फैसले पर रहेगी। यह फैसला तय करेगा कि आने वाले समय में यूरो की दिशा क्या होगी।
गोल्ड मार्केट की टेक्निकल स्थिति (लाइव डेटा)
मैक्रोइकॉनॉमिक्स के दो विरोधी रुझानों के आपस में टकराने से कीमती धातुओं के बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, गोल्ड फ्यूचर्स (GC=F) में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है और यह फिलहाल 4,121 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के स्तर पर ट्रेड कर रहा है। पिछले सत्र के 4,071 डॉलर के क्लोजिंग प्राइस के मुकाबले इसमें 1.21% की जोरदार बढ़त दर्ज की गई है। सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग इतनी बढ़ गई है कि इसका वॉल्यूम अपने 20-दिन के औसत के मुकाबले 15.71 गुना ज्यादा है। निवेशक बिगड़ते भू-राजनीतिक हालात के बीच सोने में अपनी पूंजी सुरक्षित कर रहे हैं। पूरे साल के 3,264 से 5,586 डॉलर के विशाल रेंज के बीच इसमें भारी वोलैटिलिटी बनी हुई है।
सोने के टेक्निकल इंडिकेटर्स काफी उलझी हुई तस्वीर पेश कर रहे हैं। यह एसेट एक लंबे डाउनट्रेंड से जूझ रहा है। हालांकि शॉर्ट-टर्म में दाम तेजी से बढ़े हैं, लेकिन लॉन्ग-टर्म मूविंग एवरेज अभी भी कमजोरी का इशारा कर रहे हैं। चार्ट पर एक बेयरिश डेथ क्रॉस साफ नजर आ रहा है, क्योंकि 50-दिन का एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) 4,249 डॉलर पर है, जो 200-दिन के EMA (4,269 डॉलर) से नीचे बना हुआ है। सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) की स्थिति भी ऐसी ही है; 50-दिन का SMA 4,280 डॉलर है, जो 200-दिन के SMA 4,477 डॉलर से काफी नीचे है।
इसके बावजूद, शॉर्ट-टर्म मोमेंटम पूरी तरह से बुल्स (खरीदारों) के पक्ष में जाता दिख रहा है। MACD लाइन -59.77 पर है और यह -76.59 की अपनी सिग्नल लाइन को पार कर चुकी है, जिससे 16.82 का एक बुलिश हिस्टोग्राम बन रहा है। रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) बिल्कुल न्यूट्रल जोन में 49 के स्तर पर है। इसका मतलब है कि हालिया तेजी के बाद भी गोल्ड ओवरबॉट जोन में नहीं गया है, और अभी इसके और ऊपर जाने की गुंजाइश बाकी है। इसके अलावा, ADX 35 पर है, जो एक मजबूत ट्रेंड की पुष्टि कर रहा है। स्टोकैस्टिक ऑसिलेटर की फास्ट लाइन 66 पर है, जिसने 44 पर मौजूद सिग्नल लाइन को ऊपर की तरफ काटा है, जो शॉर्ट-टर्म में और खरीदारी का दबाव दिखा रहा है।
कीमतों में आए इस उछाल ने गोल्ड को अपने बॉलिंजर बैंड्स के अंदर धकेल दिया है। इस बैंड की निचली सीमा 3,958 डॉलर और ऊपरी सीमा 4,165 डॉलर है, जबकि इसका मिडपॉइंट 4,062 डॉलर पर स्थित है। डेली वोलैटिलिटी बहुत ज्यादा है, जिसे 77 डॉलर से अधिक के एवरेज ट्रू रेंज (ATR) से समझा जा सकता है। ट्रेडिंग के लिहाज से 4,151 डॉलर का रेसिस्टेंस लेवल बेहद अहम है, और इसे पार करने पर कीमत 4,181 डॉलर तक जा सकती है। वहीं नीचे की तरफ 4,116 डॉलर पर पहला पिवट सपोर्ट है, जिसके टूटने पर 4,086 डॉलर और 4,051 डॉलर के स्तर देखे जा सकते हैं। मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ता संकट ही इस तेजी की सबसे बड़ी वजह है। एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि खरीदारों के लिए 4,065 डॉलर के 21-दिन के SMA को पार करना एक बड़ी जीत थी। इसी ब्रेकआउट के चलते गोल्ड अब ऊंची ब्याज दरों के दबाव के बावजूद रेसिस्टेंस लेवल को टेस्ट करने की स्थिति में आ गया है।
क्रिप्टोकरेंसी बाजार में उतार-चढ़ाव
पारंपरिक एसेट्स और फॉरेक्स बाजार से इतर, डिजिटल करंसी का बाजार भी भारी उथल-पुथल से गुजर रहा है। मार्केट में सबसे प्रमुख स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट प्लेटफॉर्म, एथेरियम ने हाल ही में अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले काफी मजबूती दिखाई थी। पिछले हफ्ते के दौरान दुनिया की इस दूसरी सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी ने दो अंकों में शानदार रिटर्न दिया था। इस दौरान एथेरियम ने न सिर्फ बिटकॉइन को पछाड़ा, बल्कि XRP और सोलाना जैसे बड़े टोकन से भी बेहतर प्रदर्शन किया।
हालांकि, एनालिस्ट्स ने चेतावनी दी थी कि यह तेजी बाहर से जितनी मजबूत दिख रही है, अंदर से उतनी ही खोखली है। ऑन-चेन डेटा बता रहा था कि इस रैली को सही मायनों में नेटवर्क एक्टिविटी का सपोर्ट नहीं मिला था। यह कमजोरी तब खुलकर सामने आ गई जब गुरुवार को पूरे क्रिप्टोकरेंसी बाजार में अचानक भारी करेक्शन आया। कुछ ही घंटों के भीतर इन टोकन्स ने अपनी सारी बढ़त गंवा दी। जैसे-जैसे वैश्विक मोर्चे पर तनाव बढ़ रहा है और सरकारी बॉन्ड्स पर रिटर्न ऊंचा बना हुआ है, निवेशक जोखिम भरे एसेट्स से अपना पैसा निकाल रहे हैं। इससे आने वाले दिनों में क्रिप्टो बाजार में और ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।



















