भारतीय शेयर बाजार लगातार तीसरे सप्ताह लाल निशान में बंद होने के बाद अब 31 अगस्त से 4 सितंबर के नए कारोबारी सप्ताह में प्रवेश कर रहे हैं। प्रमुख सूचकांकों में भले ही दबाव देखने को मिला हो, लेकिन ब्रॉडर मार्केट का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा है। बड़े शेयरों यानी लार्ज-कैप में बिकवाली के बावजूद स्मॉलकैप और मिडकैप सेगमेंट में निवेशकों की ओर से खरीदारी जारी रही। इस रुझान से स्पष्ट होता है कि बाजार के मुख्य सूचकांकों में सुस्ती के बावजूद घरेलू निवेशक चयनात्मक अवसरों का फायदा उठा रहे हैं। आने वाले हफ्ते में वैश्विक संकेत, अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आंकड़े और क्रूड ऑयल की चाल भारतीय इक्विटी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
सप्ताहिक प्रदर्शन और संस्थागत निवेशकों का रुख
समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान निफ्टी में 0.31 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 24,175.65 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं, 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 0.36 प्रतिशत गिरकर 77,264 के स्तर पर आ गया। दिग्गज शेयरों में यह कमजोरी मिश्रित वैश्विक संकेतों, अमेरिका में लगातार ऊंची बनी हुई बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों की जारी बिकवाली के कारण देखने को मिली। हालांकि, मुख्य सूचकांकों की तुलना में ब्रॉडर मार्केट का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा।
सप्ताह के दौरान निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स ने एक नया ऑल-टाइम हाई छुआ, जबकि निफ्टी मिडकैप इंडेक्स भी अपने रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर बंद होने में कामयाब रहा। लार्ज-कैप शेयरों से हटकर दूसरे सेगमेंट में देखी जा रही यह मजबूती दर्शाती है कि घरेलू निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर भरोसा बनाए हुए हैं। विदेशी पूंजी की निकासी से बाजार पर जो दबाव बना था, उसे स्थानीय फंडों के निवेश ने काफी हद तक सीमित कर दिया है।
संस्थागत आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने लगातार दूसरे हफ्ते नेट सेलर की भूमिका निभाई। FII ने सप्ताह के दौरान 2,060 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को मजबूत सहारा दिया और कुल 19,310 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की। DII की ओर से आई इस भारी लिक्विडिटी ने सूचकांकों को बहुत निचले स्तरों तक फिसलने से बचा लिया।
वैश्विक आर्थिक संकेत और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के कदम
31 अगस्त से 4 सितंबर के कारोबारी हफ्ते के दौरान भारतीय बाजारों पर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का बड़ा असर पड़ सकता है। दुनिया भर के निवेशक अमेरिका में मुद्रास्फीति के रुझान, फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति के संकेतों, सरकारी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार से जुड़े घटनाक्रमों पर करीब से नजर रखेंगे।
अमेरिकी पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) इंडेक्स के हालिया आंकड़े जारी हुए हैं। यह इंडेक्स फेडरल रिजर्व का पसंदीदा इन्फ्लेशन गेज माना जाता है। जुलाई के महीने में इसमें 0.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि बाजार को 0.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान था। सालाना आधार पर PCE इंडेक्स 3.7 प्रतिशत पर पहुंच गया, जबकि कोर PCE इंडेक्स 3.3 प्रतिशत पर स्थिर रहा। यद्यपि उपभोक्ता खर्च में कोई बदलाव नहीं देखने को मिला और यह फ्लैट रहा, लेकिन महंगाई के ऊंचे स्तर ने नीति निर्माताओं की चिंताएं बनाए रखी हैं।
महंगाई के इन आंकड़ों का सीधा असर आने वाले समय में अमेरिकी फेड की ब्याज दरों से जुड़े फैसलों पर पड़ सकता है। यदि यह संदेश जाता है कि अमेरिका में मुद्रास्फीति लंबे समय तक जिद्दी बनी रहेगी, तो अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड ऊंची बनी रह सकती है। इसका सीधा नुकसान भारत जैसे उभरते बाजारों को होता है, क्योंकि ऊंचा रिटर्न मिलने से विदेशी पूंजी वापस अमेरिकी डेट मार्केट की ओर रुख कर सकती है।
इसके अलावा हाल ही में आयोजित जैक्सन होल सम्मेलन पर भी वैश्विक बाजारों की निगाहें टिकी थीं। फेडरल रिजर्व के नए चेयर केविन वॉश ने सम्मेलन में अपना पहला मुख्य भाषण दिया। हालांकि, उन्होंने भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर कोई स्पष्ट फॉरवर्ड गाइडेंस नहीं दिया और न ही ब्याज दरों में बदलाव के लिए कोई निश्चित मानक रेखा खींची।
अपने संबोधन में केविन वॉश ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से मिलने वाले उत्पादकता लाभों पर जोर दिया। इसके साथ ही उन्होंने हाल के दिनों में नौकरियों की भर्ती में आई सुस्ती का कारण श्रम आपूर्ति के समतल होने को बताया। स्पष्ट नीतिगत दिशा का अभाव रहने के कारण बॉन्ड मार्केट सतर्क बना हुआ है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 4.73 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, जो भारतीय शेयर बाजार के लिए लगातार निगरानी का विषय है।
कच्चे तेल की कीमतें और रुपये का उतार-चढ़ाव
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी एक सकारात्मक खबर बनकर आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत हफ्ते के दौरान लगभग 5 प्रतिशत गिरकर 90.60 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई। इसके साथ ही पिछले दो हफ्तों से चला आ रहा क्रूड का तेजी का सिलसिला टूट गया। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में गिरावट से देश के चालू खाते के घाटे और मुद्रास्फीति के मोर्चे पर राहत मिल सकती है।
मुद्रा बाजार की बात करें तो बीते सप्ताह भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 0.34 प्रतिशत मजबूत होकर 95.36 के स्तर पर पहुंच गया। विदेशी निवेशकों के रुख को समझने और डॉलर के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के लिए रुपये की चाल बेहद अहम मानी जाती है। आईटी सेक्टर, ऑयल एंड गैस कंपनियां और विदेशी कारोबार से जुड़ी भारतीय कंपनियों की कमाई पर रुपये के उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है।
निफ्टी 50 का टेक्निकल एनालिसिस और सपोर्ट-रेजिस्टन्स
लगातार तीन हफ्तों की गिरावट के बावजूद निफ्टी 50 के चार्ट पर कई अहम सपोर्ट लेवल अभी भी सुरक्षित नजर आ रहे हैं। तकनीकी संकेतकों के अनुसार, सूचकांक अपने 21-सप्ताह के EMA और बढ़ते हुए ट्रेंडलाइन सपोर्ट के काफी करीब कारोबार कर रहा है।
तकनीकी विश्लेषण के आधार पर मास्टर कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड के चीफ रिसर्च ऑफिसर डॉ. रवि सिंह ने बाजार के परिदृश्य पर कहा कि निफ्टी के लिए 24,000 के स्तर पर पहला मुख्य हॉरिजॉन्टल सपोर्ट मौजूद है, और यदि बाजार इस स्तर के नीचे लगातार बना रहता है तो बिकवाली का दबाव 23,800 के स्तर तक बढ़ सकता है। वहीं ऊपर की ओर 24,400 का स्तर एक प्रमुख रुकावट क्षेत्र बना हुआ है, जिसे पार करने के बाद सूचकांक 24,600 के स्तर की ओर बढ़ सकता है। डॉ. सिंह का मानना है कि चूंकि निफ्टी अभी ट्रेंडलाइन सपोर्ट के पास है, इसलिए ट्रेडर्स के लिए रिस्क-रिवार्ड रेश्यो अनुकूल है और सपोर्ट स्तर कायम रहने तक गिरावट पर खरीदारी की रणनीति अपनाई जा सकती है।
इसलिए 31 अगस्त से 4 सितंबर के सप्ताह में 24,000 का स्तर निफ्टी के लिए निर्णायक साबित होगा। जब तक सूचकांक इस दायरे से ऊपर टिका रहता है, तब तक हर गिरावट पर लिवाली देखने को मिल सकती है। लेकिन इस स्तर के नीचे निर्णायक ब्रेकडाउन होने पर बाजार में बिकवाली का दौर तेज होने का जोखिम रहेगा।
बैंक निफ्टी आउटलुक: 57,000 से 58,500 के स्तरों पर नजर
बैंकिंग सूचकांक यानी बैंक निफ्टी भी बीते हफ्ते दबाव में रहा और इसमें 0.46 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। हालांकि इस गिरावट के बाद भी बैंक निफ्टी अपने बड़े कंसोलिडेशन रेंज के भीतर बना हुआ है और नीचे के स्तरों पर तकनीकी सहारा मिलने से इसकी गिरावट सीमित रही है।
बैंक निफ्टी के लिए 55-दिन का EMA एक मजबूत सपोर्ट का काम कर रहा है, जिसने पहले भी सूचकांक को गिरने से बचाया है। इसके अलावा 57,000 से 57,200 का क्षेत्र अब बैंक निफ्टी के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण हॉरिजॉन्टल सपोर्ट जोन बनकर उभरा है।
तकनीकी स्तरों पर बात करते हुए मास्टर कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड के चीफ रिसर्च ऑफिसर डॉ. रवि सिंह ने कहा कि जब तक बैंकिंग इंडेक्स 57,000 से 57,200 के सपोर्ट जोन के ऊपर टिका रहता है, तब तक गिरावट में खरीदारी की रणनीति बेहतर रहेगी। ऊपरी स्तरों पर 58,000 का स्तर मुख्य रुकावट का काम कर रहा है। यदि इंडेक्स 58,000 के ऊपर मजबूती से निकलता है, तो बुलिश ट्रेंड को और ताकत मिलेगी और आने वाले दिनों में बैंक निफ्टी 58,500 के स्तर की तरफ कदम बढ़ा सकता है।
आगामी कारोबारी सप्ताह में बैंक निफ्टी का 57,000 से 57,200 के स्तर को बचाए रखना सबसे अहम होगा। 58,000 के ऊपर का ब्रेकआउट निकट अवधि के तकनीकी आउटलुक को सुधारकर इंडेक्स को 58,500 तक ले जा सकता है, जबकि सपोर्ट टूटने पर कंसोलिडेशन का दायरा नीचे की तरफ खिसक सकता है।



















