यमन में छिड़ा गृहयुद्ध हाल के हफ्तों में एक बार फिर बेहद उग्र मोड़ पर पहुंच गया है, जहां देश के उत्तर-पश्चिमी इलाके पर काबिज ईरान समर्थित हूथी आंदोलन ने एक तेज सैन्य अभियान चलाकर लाल सागर तट के बड़े रणनीतिक हिस्सों को अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस नए सैन्य अभियान के तहत हूथियों ने मोखा बंदरगाह पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया है। मोखा बंदरगाह सीधे तौर पर बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य की निगरानी करता है, जो दुनिया भर के वाणिज्यिक और तेल परिवहन जहाजों के आवागमन के लिए सबसे संवेदनशील समुद्री चौकियों में गिना जाता है। अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच पिछले छह महीनों से जारी युद्ध के बाद अब लाल सागर के इस प्रमुख मार्ग पर नियंत्रण कायम होने से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में नए व्यवधानों की आशंका बढ़ गई है, जिसके चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है।
यमन में पिछले चार वर्षों से चले आ रहे अनौपचारिक संघर्षविराम के अचानक बिखरने के बाद हूथियों ने यह सैन्य बढ़त हासिल की है, जिसके दौरान दोनों पक्षों के सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। इस तेज सैन्य टकराव और हिंसा की वजह से जमीनी हालात बदतर हो चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इस ताजा सैन्य संकट के कारण 120,000 से अधिक लोग बेघर होकर विस्थापित होने को मजबूर हुए हैं। यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का खुलकर समर्थन करने वाले और हूथियों के विरोधी पड़ोसी देश सऊदी अरब ने स्थिति को देखते हुए ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। इसके जवाब में हूथी लड़ाकों ने दक्षिण-पश्चिमी सऊदी अरब के इलाकों पर कई ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं। इसके साथ ही हूथी संगठन ने लाल सागर के जलक्षेत्र में सऊदी अरब से जुड़े व्यापारिक जहाजों को भी सीधे निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
हूथी कौन हैं और संगठन का वैचारिक आधार क्या है
हूथी मूल रूप से उत्तरी यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक संगठन है, जो देश के शिया मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय जैदियों के अधिकारों और हितों की पैरोकारी करता है। औपचारिक रूप से यह संगठन 'अंसार अल्लाह' यानी ईश्वर के समर्थक नाम से जाना जाता है। इस संगठन का उभार 1990 के दशक में हुआ था और इसका नाम आंदोलन के संस्थापक दिवंगत हुसैन अल-हूथी के नाम पर रखा गया है। साल 2004 में हुसैन अल-हूथी की मौत के बाद से उनके भाई अब्दुल मलिक अल-हूथी इस विद्रोही संगठन के वास्तविक शीर्ष नेता के रूप में कमान संभाल रहे हैं।
वैचारिक और रणनीतिक तौर पर यह संगठन खुद को ईरान के नेतृत्व वाले उस 'प्रतिरोध की धुरी' का अभिन्न हिस्सा घोषित करता है, जो इस्राइल, अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव के खिलाफ एकजुट है। इस क्षेत्रीय गठबंधन में हूथियों के साथ-साथ फलस्तीनी सशस्त्र गुट हमास और लेबनान का हिजबुल्लाह आंदोलन भी शामिल हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में हूथियों ने यमन के तत्कालीन लंबे समय तक सत्ता में रहे निरंकुश राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया था। उस वक्त उनकी मुख्य मांग उत्तरी यमन में अपने गृह क्षेत्र के लिए व्यापक स्वायत्तता हासिल करने की थी।
साल 2011 में जब अरब स्प्रिंग के दौरान एक बड़े जनविद्रोह ने सालेह को सत्ता अपने उप-राष्ट्रपति को सौंपने पर मजबूर कर दिया, तब पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर हूथियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। तब से इस विद्रोही गुट की ताकत लगातार बढ़ती चली गई है। पिछले साल तक संगठन के लड़ाकों की अनुमानित संख्या बढ़कर 350,000 तक पहुंच चुकी थी। मौजूदा समय में हूथियों का कब्जा यमन के कुल भूभाग के एक-चौथाई से लेकर एक-तिहाई हिस्से पर है, लेकिन देश की करीब 3 करोड़ की कुल आबादी में से 70 से 80 प्रतिशत लोग इन्हीं के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में रहते हैं। इस संगठन की घोषित मांग सऊदी अरब द्वारा थोपी गई नाकेबंदी को पूरी तरह खत्म कराने, पूरे यमन पर अपना नियंत्रण स्थापित करने और देश के तेल तथा प्राकृतिक गैस राजस्व पर सीधा अधिकार हासिल करने की है।
सऊदी गठबंधन का दखल और संघर्षविराम का पतन
साल 2014 से ही हूथियों का उत्तरी यमन पर मजबूत नियंत्रण बना हुआ है। उस वक्त पड़ोसी सऊदी अरब को यह गहरा अंदेशा सताने लगा था कि हूथी पूरे यमन की सत्ता हथिया लेंगे और देश को उसके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान का एक उपग्रह राज्य बना देंगे। इसी आशंका के मद्देनजर सऊदी अरब ने साल 2015 में अरब देशों का एक साझा सैन्य गठबंधन तैयार किया और यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की तरफ से सीधे तौर पर युद्ध में दखल दे दिया।
सऊदी गठबंधन द्वारा वर्षों तक किए गए भीषण हवाई हमलों और जमीनी मोर्चे पर लड़ी गई लड़ाइयों के बावजूद हूथियों को उनके द्वारा छीने गए अधिकांश इलाकों से पीछे नहीं धकेला जा सका। उलटे इस लंबे युद्ध ने दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक को जन्म दे दिया, जिससे लाखों आम यमनी भुखमरी और तबाही की कगार पर पहुंच गए। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से साल 2022 में एक अस्थायी संघर्षविराम कराया गया था, जिसने लंबे समय तक बड़े सैन्य टकरावों को थामे रखा।
अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध छिड़ने के तुरंत बाद क्षेत्रीय समीकरण एक बार फिर बिगड़ने लगे। हूथियों ने खुले तौर पर फलस्तीनियों के समर्थन में कार्रवाई करने का दावा करते हुए इस्राइल की दिशा में और लाल सागर तथा अदन की खाड़ी से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले शुरू कर दिए। लाल सागर में व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों ने अपने युद्धपोत तैनात किए और अमेरिका, ब्रिटेन तथा इस्राइल ने हूथियों के ठिकानों पर सिलसिलेवार हवाई हमले किए। इस्राइल द्वारा किए गए एक हमले में हूथियों की स्वयंभू सरकार के प्रधानमंत्री सहित कई शीर्ष हूथी नेता मारे भी गए।
साल 2025 में अमेरिका और हूथियों के बीच एक-दूसरे के ठिकानों को निशाना न बनाने को लेकर एक सहमति बनी थी। गाजा में अक्टूबर 2025 के संघर्षविराम के बाद हूथियों ने इस्राइल पर अपने मिसाइल हमले रोक दिए थे, लेकिन फरवरी 2026 में जब अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर सीधा हमला किया, तो हूथियों ने इस्राइल के खिलाफ फिर से मिसाइल हमले शुरू कर दिए।
जुलाई का समुद्री प्रतिबंध और तटीय इलाकों पर ताजा कब्जा
हूथियों और सऊदी अरब के बीच बना अनौपचारिक संघर्षविराम जुलाई के महीने से टूटने की कगार पर आ पहुंचा। हूथियों ने सऊदी अरब के खिलाफ औपचारिक 'समुद्री प्रतिबंध' की घोषणा कर दी और सऊदी हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों तथा लाल सागर में सऊदी टैंकरों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए। इस आक्रामक कार्रवाई के पीछे हूथियों ने दलील दी कि वे वर्षों से सऊदी अरब द्वारा जारी नाकेबंदी और सना हवाई अड्डे पर हाल ही में किए गए हवाई हमले का बदला ले रहे हैं।
इसके बाद सितंबर के महीने में हूथियों ने तेज सैन्य अभियान छेड़ते हुए लाल सागर के लगभग 130 किलोमीटर यानी 81 मील लंबे तटीय इलाके के साथ-साथ रणनीतिक पेरीम द्वीप पर भी कब्जा जमा लिया। इस बड़े सैन्य विस्तार ने हूथियों को महत्वपूर्ण बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य पर भारी रणनीतिक नियंत्रण दे दिया है। हालांकि, संगठन ने साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय नौवहन को उनकी ओर से कोई खतरा नहीं है और वे केवल सऊदी अरब से जुड़े जहाजों को ही अपना निशाना बना रहे हैं।
हूथियों की इस हालिया आक्रामकता ने दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की गंभीर चिंताएं फिर पैदा कर दी हैं। अरब प्रायद्वीप के दूसरी तरफ स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाला तेल परिवहन अमेरिका और इस्राइल के ईरान के साथ जारी युद्ध के चलते पहले से ही काफी सीमित हो चुका था, जिसके कारण सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए बाब अल-मंदाब का यह समुद्री मार्ग और भी ज्यादा अहम बन चुका है। हालात तब और बिगड़ गए जब हूथियों ने सऊदी तेल संयंत्रों पर हमले किए और ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया द्वारा ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर भी हमला किया गया। यह ताजा सैन्य तनाव पश्चिमी ताकतों को एक बार फिर यमन के सीधे सैन्य संघर्ष में खींचने का जोखिम पैदा कर रहा है।
सामने आई खबरों के अनुसार, इस ताजा सैन्य अभियान के बाद यमन की सरकार और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान दोनों ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से हूथियों के ठिकानों पर तुरंत सैन्य हमले करने का आग्रह किया था। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा कोई हमला करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि हूथियों ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना न बनाने की सहमति जताई है।
ईरानी हथियारों की आपूर्ति और सैन्य क्षमता में वृद्धि
सऊदी अरब और पश्चिमी देशों का खुला आरोप रहा है कि यमन के गृहयुद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र के हथियार प्रतिबंध का खुला उल्लंघन करते हुए ईरान ने हूथियों को बड़े पैमाने पर हथियारों की तस्करी की, जिसमें उन्नत ड्रोन, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल थीं।
साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के एक पैनल ने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला था कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, लेबनान के हिजबुल्लाह आंदोलन और इराकी सैन्य विशेषज्ञों से मिले साजो-सामान, तकनीकी मदद और सैन्य प्रशिक्षण की बदौलत हूथी एक साधारण विद्रोही गुट से एक बेहद शक्तिशाली और संगठित सैन्य संगठन में तब्दील हो चुके हैं।
इसके अलावा, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद मई 2026 में कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (सीएआर) की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया कि अतीत में जहां तेहरान हूथियों को पूरी तरह तैयार हथियार भेजा करता था, वहीं अब वह तेजी से अलग-अलग कलपुर्जे भेज रहा है जिन्हें उसके सहयोगी स्थानीय स्तर पर खुद असेंबल कर लेते हैं। इसके साथ ही ईरान लगातार उन्नत मिसाइल तकनीक भी साझा कर रहा है। दूसरी तरफ, ईरान हूथियों को किसी भी तरह के हथियार मुहैया कराने से लगातार इनकार करता रहा है और उसका दावा है कि वह इस संगठन को केवल राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन ही प्रदान करता है।



















