गाजा पट्टी में युद्ध की विभीषिका के बीच उम्मीद की किरण बनकर उभरे एक बेहद लोकप्रिय और सम्मानित राहत कर्मी मोहम्मद अल-वाहिदी की इज़रायली हवाई हमले में मौत हो गई है। मंगलवार को गाजा शहर में हुए इस हमले के बाद से पूरे क्षेत्र में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है। गाजा के निवासियों के लिए वह केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि संकट के इस दौर में मानवता की सबसे पहचानी जाने वाली आवाजों में से एक थे। उनकी मृत्यु की खबर मिलते ही सोशल मीडिया पर उनके मानवीय कार्यों से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो की बाढ़ आ गई। विस्थापितों के शिविरों में रहने वाले और उनसे मदद पाने वाले सैकड़ों लोगों ने उनके जाने पर अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त की हैं और उनके साथ बिताए पलों को याद किया है।
सबरा इलाके में हुआ घातक हवाई हमला
यह दुखद घटना गाजा शहर के सबरा इलाके में घटित हुई। मोहम्मद अल-वाहिदी जिस टैक्सी में यात्रा कर रहे थे, उस पर इज़रायल की एक मिसाइल आकर गिरी। इस हमले की तीव्रता इतनी भयानक थी कि अल-वाहिदी के साथ-साथ तीन अन्य लोगों की भी मौके पर ही मौत हो गई। मरने वालों में दो मासूम भाई भी शामिल थे, जिनकी उम्र क्रमशः आठ और दस वर्ष थी। ये दोनों बच्चे उस समय वहां से गुजर रहे थे जब यह धमाका हुआ। उनके अलावा एक अन्य व्यक्ति ने भी इस हमले में अपनी जान गंवा दी। इस घटना को लेकर इज़रायली सेना ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि उन्होंने हमास के एक सक्रिय सदस्य को निशाना बनाया था। साथ ही सैन्य अधिकारियों ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि उन्हें हमले में आम नागरिकों के मारे जाने के दावों की जानकारी है।
शिक्षक से राहत अभियानों के अगुआ बनने का सफर
युद्ध शुरू होने से पहले 65 वर्षीय मोहम्मद अल-वाहिदी एक अंग्रेजी शिक्षक के रूप में बच्चों का भविष्य संवार रहे थे। लेकिन युद्ध की परिस्थितियों ने उन्हें समाज सेवा की ओर धकेल दिया। वह गाजा में इजिप्टियन रिलीफ कमेटी (मिस्र राहत समिति) के एक वरिष्ठ अधिकारी बन गए। यह मिस्र सरकार के समर्थन से चलने वाला एक प्रमुख संगठन है, जिसने इज़रायल और हमास के बीच छिड़े इस युद्ध के दौरान गाजा पट्टी में मानवीय सहायता पहुंचाने और राहत अभियानों को संचालित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले ढाई साल से भी अधिक समय से अल-वाहिदी इस संगठन के माध्यम से आपातकालीन खाद्य सहायता का समन्वय कर रहे थे, विस्थापित परिवारों के लिए तंबू और शिविर स्थापित करवा रहे थे और बार-बार पलायन के लिए मजबूर होने वाले समुदायों तक जीवन रक्षक सामग्री पहुंचा रहे थे।
दफ्तर छोड़कर जमीन पर काम करने का जुनून
गाजा के लोगों के बीच अल-वाहिदी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनका कार्य करने का अनूठा तरीका था। वह वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर निर्देश देने के बजाय खुद जमीनी स्तर पर काम करना पसंद करते थे। यही वजह थी कि गाजा पट्टी के हर आश्रय स्थल और राहत शिविर में उनका चेहरा बेहद जाना-पहचाना बन चुका था। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले स्वयंसेवकों ने बताया कि वह हमेशा सहायता वितरण केंद्रों पर खुद मौजूद रहते थे। वह विस्थापित परिवारों से सीधे बात करते थे, उनकी तात्कालिक और बुनियादी जरूरतों को समझते थे और तुरंत उनका समाधान खोजने का प्रयास करते थे। उनका यह विनम्र और संवेदनशील स्वभाव ही था जिसने उन्हें लोगों के दिलों में मसीहा बना दिया था।
मलबे के ढेर पर फुटबॉल का रोमांच
हाल के हफ्तों में मोहम्मद अल-वाहिदी को एक और अनोखे और सराहनीय कार्य के लिए जाना जाने लगा था। उन्होंने गाजा शहर, देर अल-बला और दक्षिणी गाजा के अल-मवासी क्षेत्र में फीफा वर्ल्ड कप के मैचों की सार्वजनिक स्क्रीनिंग का आयोजन शुरू किया था। इस पहल का मुख्य उद्देश्य युद्ध की विभीषिका और हर तरफ फैले मलबे के बीच रह रहे परिवारों, विशेष रूप से बच्चों को मानसिक तनाव से कुछ समय के लिए मुक्ति दिलाना था। युद्ध की कड़वी सच्चाइयों से दूर ले जाने वाली इस कोशिश ने गाजा के लोगों में एक नया उत्साह भर दिया था। विशेष रूप से मिस्र के मैचों को देखने के लिए बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ती थी, जो गाजा के लोगों के मिस्र के साथ गहरे सांस्कृतिक, भावनात्मक और राजनीतिक संबंधों को दर्शाती है। खंडहरों के बीच विशालकाय स्क्रीनों के चारों ओर जमा हुए बच्चों और परिवारों के जश्न मनाने के वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए थे, जो इस भीषण संघर्ष के बीच खुशी के दुर्लभ दृश्यों को बयां कर रहे थे।
जीत के जश्न से ठीक पहले थम गईं सांसें
नियति का क्रूर खेल देखिए कि मोहम्मद अल-वाहिदी की मौत उस समय हुई, जब उनके द्वारा आयोजित एक और महत्वपूर्ण स्क्रीनिंग शुरू होने में कुछ ही घंटे बाकी थे। गाजा शहर में मिस्र और अर्जेंटीना के बीच होने वाले नॉकआउट (राउंड ऑफ 16) मुकाबले के लाइव प्रसारण की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन मैच से पहले ही इस नायक का अंत हो गया। इस असमय मृत्यु ने फिलिस्तीनियों के बीच शोक और खालीपन को और अधिक गहरा कर दिया है। उनके कार्यों को अपनी तस्वीरों और लेखन के माध्यम से संजोने वाले कार्यकर्ता मोहम्मद हमैद ने लिखा कि अल-वाहिदी केवल एक राहत समिति के कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वह उन विस्थापित लोगों के लिए रोजाना उम्मीद का एक नया दरवाजा खोलते थे जिन्होंने युद्ध में अपना सब कुछ खो दिया था। उन्होंने आगे कहा कि गाजा में दूसरों की मदद के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले भी सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन अच्छे कर्मों को कभी मारा नहीं जा सकता, वे लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहते हैं।
राहत कर्मियों के लिए कब्रिस्तान बनता गाजा
मोहम्मद अल-वाहिदी की मौत गाजा पट्टी में काम कर रहे मानवीय सहायता कर्मियों के सामने मौजूद गंभीर खतरों को एक बार फिर उजागर करती है। अप्रैल के अंत तक के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध की शुरुआत से लेकर अब तक संयुक्त राष्ट्र (UN) ने गाजा में कम से कम 593 राहत कर्मियों की मौत दर्ज की है। चिंता की बात यह है कि इसमें से 8 राहत कर्मी तो उस समय मारे गए हैं जब इज़रायल और हमास के बीच 10 महीने पहले संघर्ष विराम समझौता लागू हो चुका था। यह आंकड़े बताते हैं कि युद्ध के मैदान में दूसरों की जान बचाने वाले खुद कितने असुरक्षित हैं।
युद्ध की पृष्ठभूमि और भीषण तबाही
गाजा में यह भीषण सैन्य अभियान 7 अक्टूबर 2023 को इज़रायल के दक्षिणी हिस्से पर हमास के नेतृत्व में हुए अभूतपूर्व हमले के बाद शुरू हुआ था। उस हमले में लगभग 1,200 लोग मारे गए थे और 251 लोगों को बंधक बना लिया गया था। इसके जवाब में इज़रायल द्वारा शुरू किए गए सैन्य हमलों में अब तक गाजा में भारी तबाही हुई है। हमास द्वारा संचालित गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस युद्ध में अब तक कम से कम 73,118 लोग मारे जा चुके हैं। इन आंकड़ों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा भी विश्वसनीय माना जाता है। मोहम्मद अल-वाहिदी की मृत्यु इस लंबे चलते आ रहे संघर्ष की एक और दुखद गाथा बन गई है, जिसने गाजा के लोगों से उनकी खुशियों का एक जरिया छीन लिया है।









