अजमेर और अरावली पर्वतमाला के जलग्रहण क्षेत्रों में हो रही लगातार जोरदार बारिश के कारण क्षेत्र का ऐतिहासिक गोविंदगढ़ बांध पूरी तरह भर गया है और उसकी चादर छलकने लगी है। बांध के ओवरफ्लो होने के साथ ही वर्षों के लंबे इंतजार के बाद लूणी नदी में नए वेग के साथ पानी का प्रवाह शुरू हो चुका है। यह जलधारा आलनियावास, रियांबड़ी और जसनगर के इलाकों से गुजरते हुए सीधे पिचियाक तालाब तक पहुंचेगी। नदी में पानी का यह नया आगमन न केवल धरातलीय जल प्रवाह तक सीमित है, बल्कि यह आसपास के दर्जनों गांवों की जल प्रणालियों, कृषि उत्पादन और तेजी से गिरते भूजल स्तर में नई जान फूंकने का काम कर रहा है।
गोविंदगढ़ बांध का इतिहास और भूजल रिचार्ज का असर
वर्ष 1995 में अजमेर जिले के भीतर सागरमती नदी पर गोविंदगढ़ बांध का निर्माण किया गया था। इस विशाल जलाशय की कुल भराव क्षमता 155 एमसीएफटी दर्ज की गई है। पिछले लगातार तीन वर्षों से इस पूरे अंचल में अच्छी मानसूनी बारिश दर्ज की जा रही है, जिसके कारण बांध में पानी की नियमित और प्रचुर आवक बनी हुई है। इस निरंतर जल संरक्षण का सबसे सकारात्मक असर इलाके के भूमिगत जल भंडार पर पड़ा है। पिछले लगभग तीन दशकों यानी 30 वर्षों से सूखे पड़े अनेक कुओं में जलस्तर अचानक बढ़ने लगा है। जिन ग्रामीण इलाकों में किसान लंबे समय से सिंचाई और पेयजल के लिए तरस रहे थे, वहां अब नलकूपों और पारंपरिक कुओं में पानी का स्तर ऊपर आ गया है, जिससे ग्रामीण पेयजल संकट से भी बड़ी राहत मिली है।
283 लाख रुपये की लागत से 8 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण
गोविंदगढ़ बांध से छलकने वाला यह पानी नागौर जिले के लगभग 1000 कृषक परिवारों के जीवन में नई उम्मीदें लेकर आया है। इस जल भराव से लगभग 780 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि को निर्बाध सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। पानी को बिना किसी बर्बादी के सीधे खेतों तक पहुंचाने के लिए आलनियावास क्षेत्र तक करीब 8 किलोमीटर लंबी नहर के पुनर्निर्माण का काम तेजी से निपटाया जा रहा है। इस पूरी अवसंरचना परियोजना पर 283 लाख रुपये का बजट खर्च किया जा रहा है। जैसे ही इस नहर का निर्माण कार्य पूरा होगा, बांध का मीठा पानी बिना किसी बाधा के नागौर के दूरदराज खेतों तक पहुंचने लगेगा और पूरे जिले की सिंचाई प्रणाली को नई मजबूती मिलेगी।
रबी फसलों की खेती और किसानों का घटता उत्पादन खर्च
बांध का पानी उपलब्ध होने से अकेले आलनियावास क्षेत्र के करीब 600 किसानों को आगामी रबी सीजन की फसलों की सिंचाई के लिए प्रचुर मात्रा में पानी हासिल होगा। इससे गेहूं, सरसों, चना और अन्य नकदी फसलों की समय पर बुवाई करना बेहद आसान हो जाएगा। भूजल स्तर सुधरने से आसपास के नलकूप भी रिचार्ज हो रहे हैं। स्थानीय किसानों के अनुसार, यदि आने वाले सालों में भी मानसूनी बारिश का यही दौर जारी रहता है और नहर प्रणाली का उचित रखरखाव किया जाता है, तो नागौर के कृषि परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। फसलों की गुणवत्ता में सुधार के साथ उत्पादन लगभग दोगुना तक बढ़ सकता है, जिससे किसानों की बिजली और डीजल पर होने वाली सिंचाई लागत में भारी कमी आएगी।



















