पंजाब राज्य के अमृतसर ज़िले में भारत और पाकिस्तान की सीमा के बेहद करीब स्थित अटारी रेलवे स्टेशन भारतीय रेल नेटवर्क के इतिहास में एक खास पहचान रखता है। एक समय ऐसा था जब इस स्टेशन से सीमा पार जाने वाली ट्रेनों में सफर करने के लिए यात्रियों के पास वैध पासपोर्ट और वीजा होना अनिवार्य था। देश के अंतिम रेलवे स्टेशन के रूप में पहचाने जाने वाले इस स्टेशन के आगे पड़ोसी देश पाकिस्तान की सीमा शुरू हो जाती है, जिसके कारण यहां अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़ी विशेष प्रक्रियाएं अपनाई जाती थीं।
सीमावर्ती स्टेशन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रक्रियाएं
अटारी रेलवे स्टेशन का इस्तेमाल जब अंतरराष्ट्रीय रेल सेवाओं के लिए होता था, तब इस पूरे परिसर में किसी हवाई अड्डे या अंतरराष्ट्रीय सीमा चौकी की तरह सुरक्षा और इमिग्रेशन के कड़े बंदोबस्त किए जाते थे। भारत से पाकिस्तान जाने वाले और वहां से भारत आने वाले यात्रियों को स्टेशन परिसर के भीतर ही सीमा शुल्क और इमिग्रेशन की जांच से गुज़रना पड़ता था। बिना वैध वीजा और पासपोर्ट के किसी भी यात्री को अंतरराष्ट्रीय ट्रेन में सवार होने या अपनी यात्रा पूरी करने की अनुमति नहीं दी जाती थी।
अक्सर इस स्टेशन को लेकर यह गलतफहमी देखने को मिलती है कि स्टेशन परिसर में कदम रखने वाले हर व्यक्ति के लिए पासपोर्ट और वीजा अनिवार्य था। हालांकि वास्तविक नियम यह था कि यह शर्त केवल उन यात्रियों पर लागू होती थी जो भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली अंतरराष्ट्रीय ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। स्थानीय रेल कार्यों या स्टेशन के सामान्य कामकाज से जुड़े लोगों पर अंतरराष्ट्रीय वीजा के नियम लागू नहीं होते थे।
समझौता एक्सप्रेस की शुरुआत और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अटारी रेलवे स्टेशन पर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और जांच प्रक्रियाओं की आवश्यकता वर्ष 1976 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए एक द्विपक्षीय समझौते के बाद पैदा हुई थी। इसी समझौते के तहत मशहूर समझौता एक्सप्रेस ट्रेन की शुरुआत की गई थी। इस ट्रेन को चलाने का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के आम नागरिकों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखना, पारिवारिक रिश्तों को जोड़ना और सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों को आपस में मिलने का अवसर प्रदान करना था।
समझौता एक्सप्रेस भारत के अटारी रेलवे स्टेशन से रवाना होकर पाकिस्तान के वाघा स्टेशन तक जाती थी। कई दशकों तक इस ट्रेन सेवा ने दोनों देशों के बीच आवाजाही का प्रमुख माध्यम बनकर हजारों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया, जिससे अटारी स्टेशन का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व काफी बढ़ गया।
पुलवामा हमले के बाद सेवाओं का निलंबन
वर्षों से निर्बाध रूप से चल रही इस अंतरराष्ट्रीय रेल सेवा पर फरवरी 2019 में अचानक विराम लग गया। पुलवामा में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक और सैन्य तनाव काफी बढ़ गया था। सुरक्षा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों ने समझौता एक्सप्रेस के परिचालन को अनिश्चित काल के लिए रोकने का फैसला किया।
फरवरी 2019 के निलंबन के बाद से अटारी रेलवे स्टेशन से होने वाली सभी प्रकार की अंतरराष्ट्रीय यात्री सेवाएं पूरी तरह बंद हैं। स्टेशन पर बनाए गए अंतरराष्ट्रीय इमिग्रेशन काउंटर और सीमा शुल्क जांच केंद्र तब से निष्क्रिय पड़े हैं और सीमा पार रेल यातायात ठप है।
वर्तमान स्थिति और अटारी-वाघा सीमा का पर्यटन महत्व
मौजूदा समय में अटारी रेलवे स्टेशन पूरी तरह से भारतीय रेलवे के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा है। यह स्टेशन सामान्य घरेलू रेल आवश्यकताओं और स्थानीय परिचालन के लिए पूरी तरह सक्रिय है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय यात्री सेवाओं के दोबारा शुरू होने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय ट्रेनें बंद होने के बावजूद यह क्षेत्र पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना हुआ है। स्टेशन के पास ही स्थित अटारी-वाघा बॉर्डर पर हर शाम आयोजित होने वाली 'बीटिंग रिट्रीट' सेरेमनी को देखने के लिए देश और दुनिया भर से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। सीमा सुरक्षा बलों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली यह सेरेमनी इस सीमावर्ती इलाके की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को आज भी जीवित रखे हुए है।



















