रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को एक कार्यक्रम में कहा कि भारतीय सेनाओं को अब यह पूरी आजादी और जरूरी संसाधन दोनों दिए गए हैं कि वे किसी भी खतरे का करारा जवाब दे सकें, जरूरत पड़ने पर दुश्मन की सरजमीं में घुसकर भी कार्रवाई कर सकें।
शांति और कमजोरी में साफ फर्क
राजनाथ सिंह ने कहा कि शांति और कमजोरी को एक जैसा समझना बड़ी भूल होगी, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। उन्होंने साफ किया कि अगर कोई मुल्क भारत के खिलाफ आतंकियों को शह देता पाया गया तो उससे कोई बातचीत की मेज नहीं सजेगी, बल्कि हमारी सेनाएं मुंहतोड़ जवाब देंगी। रक्षा मंत्री के मुताबिक भारत जंग या किसी की जमीन हड़पने में यकीन नहीं रखता और शांति को ही तरजीह देता है, मगर डर की वजह से मिली शांति शर्मनाक है, जबकि अमन कायम रखने के लिए लड़ी गई जंग इज्जत की हकदार होती है।
कश्मीर में युवाओं को बहकाने की साजिश नाकाम
रक्षा मंत्री ने गिनाया कि दुश्मन देशों ने अलग-अलग तरीकों से भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश की, जैसे जम्मू-कश्मीर के नौजवानों को गुमराह करना, भारत विरोधी सरगर्मियों को पैसा देना, आतंक फैलाना और समाज में फूट डालना। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पुनर्वास योजनाओं, कट्टरता से बाहर निकालने की कोशिशों और नौकरियों के मौके देकर इन तमाम चालों को विफल कर दिया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद घाटी में तरक्की की रफ्तार पहले कभी न देखी गई ऊंचाई पर पहुंच गई है।
सर्जिकल स्ट्राइक से ऑपरेशन सिंदूर तक का सफर
आतंकवाद से निपटने की रणनीति समझाते हुए राजनाथ सिंह ने सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयरस्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर की मिसाल दी, जिनमें आतंकियों के साथ-साथ उन्हें पालने वाले आकाओं को भी निशाना बनाया गया। उन्होंने सिंधु जल संधि रोके जाने का जिक्र करते हुए कहा कि इससे यह कड़ा संदेश गया कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।
अंतरिक्ष और साइबरस्पेस बने जंग के नए मैदान
जंग लड़ने के तरीके बदलने पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अब लड़ाई सिर्फ जमीन, हवा और समंदर तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरिक्ष और साइबरस्पेस भी इसके नए अखाड़े बनकर उभरे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, खुद फैसला लेने वाले सिस्टम और सटीक निशाना साधने वाले हथियार पूरे रणक्षेत्र की तस्वीर बदल रहे हैं। सरकार चाहती है कि भारत खुद अपनी आधुनिक तकनीक गढ़े, यही वजह है कि रक्षा नीति को पहले वाले 'रिएक्टिव' ढांचे से निकालकर 'प्रोएक्टिव' रुख में ढाला गया है।
रक्षा उत्पादन और निर्यात में जबरदस्त उछाल
आंकड़े गिनाते हुए रक्षा मंत्री ने बताया कि 2014 से पहले करीब 40,000 करोड़ रुपए रहने वाला रक्षा उत्पादन अब बढ़कर लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच चुका है, वहीं निर्यात में 56 गुना का उछाल आया है और यह 38,000 करोड़ रुपए से ऊपर निकल गया है। सरकार का इरादा 2029 तक 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात के आंकड़े को छूने का है। इस कामयाबी की झलक अस्त्र, आकाश मिसाइल, आकाशतीर, पिनाका, तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, प्रचंड-ध्रुव हेलीकॉप्टर और आईएनएस विक्रांत जैसे स्वदेशी हथियारों में दिखती है। उन्होंने बताया कि सभी 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अब मुनाफे में चल रही हैं और बीते 12 सालों में रक्षा बजट 2.5 लाख करोड़ रुपए से उछलकर करीब 8 लाख करोड़ रुपए के पास पहुंच गया है।



















