भारत के एयर डिफेंस बेड़े में शामिल आकाश मिसाइल सिस्टम अब मैक 2.5 यानी करीब 2981 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन और क्रूज मिसाइल तक पहुंचकर उन्हें हवा में ही तबाह कर सकता है, और इसके नए वर्जन आकाश-एनजी ने तो मार करने की दूरी को बढ़ाकर 70 से 80 किलोमीटर तक पहुंचा दिया है। यही वजह है कि दुनिया भर की सेनाएं भारत की इस स्वदेशी मिसाइल तकनीक पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।
राजेंद्र रडार, मिसाइल की आंख और दिमाग दोनों
आकाश सिस्टम की असली ताकत उसके साथ लगे राजेंद्र रडार में छिपी है, जो मिसाइल को दिशा और जानकारी दोनों देता है। यह थ्री-डी फेज्ड ऐरे तकनीक वाला रडार करीब 60 किलोमीटर के दायरे में मौजूद 64 अलग-अलग टारगेट को एक साथ ट्रैक कर सकता है। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर यह इनमें से 12 टारगेट पर एक साथ हमला बोलने के लिए भी हमेशा तैयार रहता है, जिससे झुंड में आने वाले हमलों का भी माकूल जवाब दिया जा सकता है।
पहले ही भांप लेता है खतरा, यह है थ्री-डी सेंट्रल एक्विजिशन रडार
राजेंद्र रडार से पहले काम करता है सिस्टम का थ्री-डी सेंट्रल एक्विजिशन रडार, जिसे लंबी दूरी का पहरेदार कहा जा सकता है। यह 150 से 180 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के 200 तक विमानों या मिसाइलों को भांप लेता है और तुरंत कमांड सेंटर को चेतावनी भेज देता है। अलर्ट मिलते ही पूरा नेटवर्क सक्रिय हो जाता है और पलक झपकते ही राजेंद्र रडार टारगेट को लॉक करके हमले की तैयारी शुरू कर देता है।
एक बैटरी में चार लॉन्चर, हर वक्त 12 मिसाइलें फायर के लिए तैयार
आकाश की एक सामान्य बैटरी में चार सेल्फ-प्रोपेल्ड लॉन्चर होते हैं और हर लॉन्चर पर तीन मिसाइलें चढ़ी रहती हैं। मतलब किसी भी वक्त यह पूरा सिस्टम 12 मिसाइलें एक साथ दागने की स्थिति में रहता है। इस वजह से अगर दुश्मन एक से ज्यादा दिशाओं से या झुंड में हमला करने की कोशिश करे, तो भी आकाश सिस्टम के पास पर्याप्त फायरपावर मौजूद रहता है।
पहाड़ हो या मैदान, हर जगह सेना के साथ चल सकता है यह सिस्टम
आकाश सिस्टम की एक बड़ी खूबी इसकी गतिशीलता है। यह पूरी तरह मोबाइल सिस्टम है, इसलिए ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी और आगे बढ़ रहे टैंक बेड़े के साथ भी यह आसानी से चल सकता है। इस मोबिलिटी की बदौलत एक ही सिस्टम करीब 2000 वर्ग किलोमीटर के इलाके को हवाई हमलों से सुरक्षित रख सकता है, जो इसे बॉर्डर और फॉरवर्ड पोस्ट दोनों जगह के लिए उपयोगी बनाता है।
वजन से रफ्तार तक, जानिए मिसाइल के तकनीकी आंकड़े
अगर मिसाइल के डिजाइन की बात करें, तो इसका वजन 720 किलोग्राम, लंबाई 5.78 मीटर और व्यास 35 सेंटीमीटर है। यह मैक 2.5 यानी करीब 2981 किलोमीटर प्रति घंटे की सुपरसोनिक रफ्तार से उड़ान भरती है। इसकी मारक क्षमता 25 से 45 किलोमीटर के बीच है, जबकि यह 20 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर उड़ रहे टारगेट तक भी पहुंच सकती है।
रैमजेट इंजन की वजह से कभी कम नहीं होती रफ्तार
आम तौर पर रॉकेट मोटर के जलने के बाद मिसाइल की रफ्तार धीरे-धीरे घटने लगती है, लेकिन आकाश में लगा इंटीग्रेटेड रैमजेट रॉकेट इंजन इस समस्या को हल करता है। यह इंजन उड़ान के दौरान हवा से लगातार ऑक्सीजन खींचता रहता है, जिससे मिसाइल पूरे सफर में बिना धीमी पड़े अपनी रफ्तार बनाए रखती है। यही तकनीक इसे लंबी दूरी तक भी उतनी ही घातक बनाए रखती है, जितनी यह लॉन्च के तुरंत बाद होती है।
वॉरहेड इतना घातक कि करीब से गुजरने पर भी काम तमाम
मिसाइल के अगले हिस्से में 55 से 60 किलोग्राम वजन का भारी वॉरहेड लगा होता है। इसमें लगा प्रॉक्सिमिटी फ्यूज इसे और खतरनाक बना देता है, क्योंकि इसका मतलब है कि मिसाइल को दुश्मन के विमान से सीधी टक्कर की जरूरत ही नहीं पड़ती। अगर यह विमान के बेहद करीब से भी गुजर जाए, तब भी यह फट जाती है और लक्ष्य को हवा में ही नष्ट कर देती है।
आकाश मार्क-1S ने खत्म की जमीन पर निर्भरता
आकाश मार्क-1S को एडवांस्ड सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के तौर पर विकसित किया गया और इसका सफल परीक्षण मई 2019 में हुआ था। इसकी सबसे बड़ी खूबी है इसमें लगा स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर। पुरानी आकाश मिसाइलें टारगेट तक पहुंचने के लिए जमीन पर लगे रडार से मिलने वाली लगातार गाइडेंस पर निर्भर रहती थीं, लेकिन इस नए सीकर ने पूरी तस्वीर बदल दी। अब मिसाइल अपने आखिरी उड़ान चरण में खुद ही दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन या क्रूज मिसाइल को खोजकर उसका पीछा करती है और उसे वहीं ढेर कर देती है। इस अपग्रेड की बदौलत मिसाइल की किल प्रोबेबिलिटी, यानी एक ही कोशिश में टारगेट को नष्ट करने की क्षमता, पहले से काफी बेहतर हो गई है। यह मिसाइल 25 से 30 किलोमीटर की रेंज में कम और मध्यम ऊंचाई पर मंडरा रहे खतरों को आसानी से बेअसर कर सकती है। साथ ही दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमर या रडार में गड़बड़ी फैलाने की कोशिशों का भी इस पर कोई खास असर नहीं पड़ता। इस अपग्रेड ने भारतीय वायुसेना और थलसेना के एयर डिफेंस नेटवर्क को नई ताकत दी है और यह भी जाहिर किया कि क्रिटिकल सीकर तकनीक में भारत अब आत्मनिर्भर बन चुका है।
आकाश प्राइम, बर्फीले मोर्चों के लिए बनी खास मिसाइल
आकाश प्राइम को खासतौर पर भारतीय सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है और इसका सफल परीक्षण सितंबर 2021 में ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज में किया गया था। इस मिसाइल की खास बात यह है कि इसे लद्दाख, सियाचिन और पूर्वोत्तर जैसे ऊंचाई वाले और बेहद ठंडे इलाकों में तैनाती के लिए ही डिजाइन किया गया है। माइनस तापमान और पतली हवा में आमतौर पर मिसाइल के इंजन, फ्यूल और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों में गड़बड़ी आने का खतरा रहता है, लेकिन आकाश प्राइम ऐसी मुश्किल बर्फीली परिस्थितियों में भी बिना रुके काम करने में सक्षम है। इसमें और बेहतर एक्टिव आरएफ सीकर लगाया गया है, जो टारगेट को बेहद सटीक तरीके से ट्रैक करके लॉक कर लेता है। इसके ग्राउंड रडार और सपोर्ट इक्विपमेंट को भी आधुनिक मानकों के हिसाब से अपग्रेड किया गया है। मेक इन इंडिया पहल के लिहाज से यह एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इस मिसाइल में 82 प्रतिशत से ज्यादा पुर्जे पूरी तरह स्वदेशी हैं। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर चीन सीमा से सटे अहम सैन्य ठिकानों, फॉरवर्ड एयरफील्ड और रणनीतिक दर्रों को अचानक हवाई या ड्रोन हमलों से बचाने में यह मिसाइल एक भरोसेमंद कवच का काम करती है।
आकाश-एनजी, रेंज दोगुनी और दिसंबर 2025 में ट्रायल पूरे
आकाश-एनजी यानी न्यू जेनरेशन मिसाइल को भारत की एयर डिफेंस तकनीक में एक बड़ी छलांग माना जा रहा है। करीब 470 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट बजट से मंजूर हुई यह मिसाइल पुरानी आकाश सीरीज से पूरी तरह अलग बनाई गई है। पुराने वर्जन में जहां रैमजेट इंजन इस्तेमाल होता था, वहीं आकाश-एनजी में नया और ज्यादा दमदार डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर लगाया गया है। इसका वजन पहले से काफी कम है और इसकी बनावट इतनी सटीक है कि इसकी मार करने की दूरी 25-30 किलोमीटर से बढ़कर सीधे 70 से 80 किलोमीटर तक पहुंच गई है, यानी यह पहले से दोगुने से भी ज्यादा दूरी से दुश्मन को निशाना बना सकती है। दिसंबर 2025 में इसके पूरे यूजर ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं, जिसके बाद अब इसे सेना में शामिल करने का रास्ता खुल गया है। इस मिसाइल की एक और खासियत इसका कैनिस्टराइज्ड होना है, यानी यह एक सीलबंद बॉक्स में पैक रहती है, जिससे इसकी उम्र लंबी हो जाती है और इसे ट्रक या रेल आधारित मोबाइल लॉन्चर से चंद सेकंड के नोटिस पर दागा जा सकता है। इसमें लगा एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे यानी AESA मल्टी-फंक्शन रडार सुपरसोनिक रफ्तार से आ रही क्रूज मिसाइलों, स्टील्थ फाइटर जेट और झुंड में हमला करने वाले स्वॉर्म ड्रोन को दूर से ही पहचानकर मार गिराने में सक्षम है।
क्यों दुनिया की नजर टिकी है भारत की इस मिसाइल पर
राजेंद्र रडार से लेकर आकाश-एनजी तक हर अपग्रेड यह दिखाता है कि भारत अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को कदम दर कदम ज्यादा स्वदेशी और दमदार बना रहा है। स्वदेशी सीकर से लेकर बर्फीले मोर्चों में तैनाती और अब रेंज दोगुनी होने तक, यह सफर बताता है कि आकाश परिवार अब केवल एक मिसाइल नहीं बल्कि पूरे एयर डिफेंस इकोसिस्टम की तरह विकसित हो चुका है। यही वजह है कि दुनिया भर की सेनाएं भारत की इस मिसाइल तकनीक और इसके मेक इन इंडिया मॉडल को दिलचस्पी से देख रही हैं।



















