अरावली पहाड़ियों के संरक्षण और उनकी सटीक परिभाषा तय करने के कानूनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद सख्त रुख अपनाया है। उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए फरवरी 2027 तक का यानी छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समिति को अब दिन-रात काम करना होगा और किसी भी स्थिति में 30 नवंबर 2026 की समय सीमा तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।
न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी है कि इस तय तारीख के बाद कोई मोहलत नहीं दी जाएगी। यदि समिति अगले दो महीनों में अपना कार्य पूरा करने में विफल रहती है, तो पूरे पैनल का पुनर्गठन तक किया जा सकता है। इस उच्चाधिकार प्राप्त पांच सदस्यीय समिति की कमान भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद की महानिदेशक कंचना देवी के हाथों में है। समिति का तर्क था कि अरावली क्षेत्र का एक व्यापक, मजबूत और वैज्ञानिक आकलन तैयार करने के लिए उसे जमीन, पर्यावरण, पानी और स्थानीय निवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन करने की आवश्यकता है, जिसके लिए अतिरिक्त समय जरूरी था।
हालांकि, इन तमाम दलीलों के बावजूद अदालत ने फिलहाल समय सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है। इसके साथ ही पीठ ने समिति को यह भी निर्देश दिया है कि वह महत्वपूर्ण और जरूरी मुद्दों पर अंतरिम रिपोर्ट भी पेश कर सकती है, ताकि पूरी रिपोर्ट के आने तक का लंबा इंतजार न करना पड़े। इसके अलावा, अदालत ने यह भी अनिवार्य किया है कि अंतिम सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत तमाम संबंधित हितधारकों की राय अवश्य सुनी जानी चाहिए।
अरावली क्षेत्र की परिभाषा को लेकर लंबे समय से खींचतान और कानूनी विवाद चल रहा है। इस भौगोलिक सीमा के तय होने से इस बात पर सीधा असर पड़ेगा कि देश के किन हिस्सों में पर्यावरण संरक्षण के कड़े नियम लागू होंगे और कहाँ खनन जैसी व्यावसायिक गतिविधियों पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाया जाएगा। विशेषज्ञ समिति ने पूर्व में कहा था कि इस पूरे मामले को केवल जमीन की बनावट के किसी एक मानक या सीमित साक्ष्यों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसमें कई जटिल पहलू शामिल हैं।
इससे पहले समिति ने 31 अगस्त को अपनी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल की थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि अंतिम आकलन तक पहुँचने के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली, पर्यावरण संतुलन, भूगर्भीय स्थिति, जल विज्ञान और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का एक साथ गहन विश्लेषण करना बेहद जरूरी है। इसके अतिरिक्त, भौगोलिक मानचित्रण, संवेदनशीलता का मूल्यांकन, विषय-विशेषज्ञों की तकनीकी जाँच, ज़मीन पर जाकर भौतिक सत्यापन और सभी पक्षों से विस्तृत परामर्श लेने की प्रक्रिया भी इस अध्ययन का हिस्सा है।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख और समय बढ़ाने की माँग ठुकराए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कांग्रेस पार्टी ने अदालत के इस निर्णय पर गहरी निराशा जताई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण और समझ से परे करार दिया है। उनका कहना था कि 31 अगस्त 2026 के बाद रिपोर्ट जमा करने के लिए समिति द्वारा माँगा गया अतिरिक्त समय पूरी तरह से तार्किक और उचित था, क्योंकि अरावली जैसे अति-संवेदनशील पर्यावरण क्षेत्र पर एक पुख्ता रिपोर्ट तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिलना आवश्यक था।
अब इस ताज़ा अदालती आदेश के बाद समिति के ऊपर सीमित समय सीमा के भीतर सभी वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, भौगोलिक और सामाजिक पहलुओं को समेटकर एक विस्तृत दस्तावेज तैयार करने की भारी चुनौती आ गई है। इस पूरे प्रकरण की अगली सुनवाई आगामी 2 दिसंबर को तय की गई है। अदालत के इन कड़े निर्देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में अब न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की ढिलाई या अनावश्यक विलंब को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।





















