दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में आपत्तिजनक और अमर्यादित टिप्पणियां करने के मामले में रुचिका सिंह की कानूनी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। यद्यपि प्रधानमंत्री ने एक वीडियो संदेश साझा करके इस प्रकार की भाषा पर अपनी आपत्ति जताई, दुख प्रकट किया और साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह रुचिका सिंह को व्यक्तिगत रूप से माफ करते हैं, परंतु इस क्षमादान के आधार पर उनके विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामला स्वतः समाप्त नहीं हो सकता। देश की कानूनी प्रणाली के प्रावधानों के अनुसार, किसी पीड़ित अथवा शिकायतकर्ता के व्यक्तिगत रूप से माफ कर देने मात्र से दर्ज मुकदमों का अंत नहीं हो जाता।
कानूनी धाराओं का स्वरूप और शिकायत दर्ज होने का आधार
रुचिका सिंह का विवादित वक्तव्य सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होने के उपरांत इस विषय में औपचारिक कार्रवाई शुरू हुई। गाजियाबाद निवासी स्मृति सिंह ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए बुधवार के दिन एक्सप्रेसवे पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि रुचिका सिंह ने संवैधानिक पद की गरिमा को आघात पहुंचाने के उद्देश्य से अत्यंत अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। इसके साथ ही उन पर जनसामान्य के बीच द्वेष फैलाने तथा सार्वजनिक शांति व्यवस्था को भंग करने का गंभीर प्रयास करने का आरोप लगाया गया। इस घटनाक्रम के पश्चात मामले में प्रारंभिक जांच और जीरो एफआईआर प्रक्रिया के तहत वैधानिक कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।
पुलिस प्रशासन द्वारा तैयार किए गए मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई महत्वपूर्ण धाराएं जोड़ी गई हैं। इनमें शांति भंग करने के इरादे से जान-बूझकर अपमान करने से संबंधित धारा 352 शामिल है। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयानों के संदर्भ में धारा 353(1) तथा मानहानि के अपराध हेतु धारा 356(1) के तहत प्रकरण पंजीकृत किया गया है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में इन कानूनी धाराओं का एक विशिष्ट महत्व है, जिसके कारण शिकायतकर्ता अथवा प्रभावित व्यक्ति की क्षमा के बाद भी राज्य की ओर से अभियोजन प्रक्रिया जारी रखी जाती है।
समझौता योग्य और गैर-समझौता योग्य अपराधों का कानूनी अंतर
भारतीय दंड विधान तथा प्रक्रिया के अंतर्गत अपराधों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: समझौता योग्य और गैर-समझौता योग्य। जब किसी मामले में ऐसे अपराधों की धाराएं लगाई जाती हैं जिन्हें कानून द्वारा गैर-समझौता योग्य माना गया है, तो वहां पक्षकारों के मध्य आपसी सहमति या व्यक्तिगत क्षमादान से मुकदमा खारिज नहीं होता। चूंकि सार्वजनिक व्यवस्था, संवैधानिक पद की मर्यादा तथा जनशांति को प्रभावित करने वाले मामलों में राज्य को मुख्य पक्षकार माना जाता है, इसलिए ऐसे मुकदमों का फैसला केवल सक्षम न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। इसी कारण से प्रधानमंत्री की ओर से व्यक्त की गई सार्वजनिक क्षमा के बावजूद रुचिका सिंह के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अदालत में निरंतर चलती रहेगी।
सर्वोच्च न्यायालय का हालिया उदाहरण और न्यायिक मिसाल
व्यक्तिगत क्षमादान के बाद भी कानूनी प्रक्रिया जारी रहने की इस स्थिति को समझने के लिए इसी वर्ष की एक अन्य न्यायिक घटना का उल्लेख महत्वपूर्ण है। 10 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। उस दौरान प्रबल प्रताप नामक एक छात्र ने अदालत कक्ष के भीतर असाधारण आचरण प्रदर्शित किया। उसने पीठ को आदेश देने की चेष्टा की, न्यायिक दस्तावेजों को हवा में उछाला और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के प्रति अत्यंत अभद्र भाषा का प्रयोग किया। इस अचानक उत्पन्न हुए तनाव के बीच सुरक्षा कर्मियों ने अविलंब हस्तक्षेप करते हुए छात्र को अदालत कक्ष से बाहर निकाला।
यह प्रकरण जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की न्यायिक पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ। पीठ ने मामले का संपूर्ण विश्लेषण करते हुए यह माना कि संबंधित याचिकाकर्ता का ऐसा व्यवहार उसकी अत्यधिक मानसिक हताशा और गंभीर परेशानी का परिणाम था। इस मानवीय पहलू पर विचार करते हुए अदालत ने छात्र पर कोई दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्णय लिया और प्रबल प्रताप तथा उसके साथी को क्षमा कर दिया। हालांकि, अदालत द्वारा क्षमा किए जाने के बाद भी आपराधिक न्याय प्रणाली की नियमित प्रक्रिया नहीं रुकी।
इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली पुलिस ने तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में औपचारिक एफआईआर दर्ज की और दोनों छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। तत्पश्चात पटियाला हाउस कोर्ट के समक्ष उन्हें प्रस्तुत किया गया, जहां से प्रबल प्रताप और उसके साथी चंदर भान को 25000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन दोनों आरोपी छात्रों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया। यह संपूर्ण दृष्टांत यह सिद्ध करता है कि न्यायालय या पीड़ित व्यक्ति की क्षमा के बाद भी पुलिस एफआईआर, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया अपने तय नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ती है।



















