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वाघा बॉर्डर की ठंड में बीमार पड़े जवान अवधेश कुमार का जहानाबाद में अंतिम संस्कार, बेटे ने दी मुखाग्निबिहार
2 जुल॰ 2026, 9:45 pm (40 दिन पहले)· 2

वाघा बॉर्डर की ठंड में बीमार पड़े जवान अवधेश कुमार का जहानाबाद में अंतिम संस्कार, बेटे ने दी मुखाग्नि

जहानाबाद के पुनीत बिगहा गांव के रहने वाले सेना जवान अवधेश कुमार का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा उनके पैतृक घर पहुंचा, जहां उनके 7 साल के मासूम बेटे ने पिता को मुखाग्नि दी।

बिहार के जहानाबाद जिले में सदर प्रखंड के पुनीत बिगहा गांव के रहने वाले सेना के जवान अवधेश कुमार का पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक घर पहुंचा तो पूरा इलाका शोक में डूब गया। तिरंगे में लिपटे अपने लाडले के आखिरी दर्शन के लिए हजारों लोग उमड़ पड़े और भारत माता की जय तथा शहीद अवधेश कुमार अमर रहें के नारों के बीच नम आंखों से उन्हें विदाई दी गई। घर में शव पहुंचते ही परिजनों का रो रोकर बुरा हाल हो गया और वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। ग्रामीणों ने पुष्पांजलि अर्पित कर अपने इस लाडले को आखिरी सलाम दिया।

गरीबी और संघर्ष के बीच बना सैनिक

अवधेश कुमार अपने पिता स्वर्गीय प्रभु यादव के इकलौते बेटे थे। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया था, जिसके बाद उनकी मां और चाचा ने आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी पढ़ाई पूरी कराई। घर की तंगहाली के बीच भी अवधेश ने देश सेवा का सपना नहीं छोड़ा और साल 2012 में भारतीय सेना में भर्ती हो गए। सेना में उनकी पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर के लेह में हुई थी, जहां उन्होंने कड़ी परिस्थितियों में भी अपनी ड्यूटी बखूबी निभाई।

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वाघा बॉर्डर पर बिगड़ी थी तबीयत, हुई थी बाईपास सर्जरी

करीब सात साल पहले जब अवधेश वाघा बॉर्डर पर तैनात थे, तब कड़ाके की ठंड के चलते उनकी सेहत काफी बिगड़ गई थी। हालत गंभीर होने पर उन्हें इलाज के लिए भेजा गया और चंडीगढ़ के आरआर अस्पताल में उनकी बाईपास सर्जरी की गई थी। सर्जरी से उबरने के बाद अवधेश ने हार नहीं मानी और दोबारा देश सेवा में जुट गए और अपनी ड्यूटी पर लौट आए।

छुट्टी से लौटने के हफ्तों बाद अचानक बिगड़ी हालत

परिजनों के मुताबिक अवधेश कुमार मई महीने में एक महीने की छुट्टी लेकर घर आए थे। परिवार के साथ छुट्टी बिताकर वे वापस ड्यूटी पर लौटे ही थे कि 7 जून को उनकी तबीयत अचानक फिर बिगड़ गई। स्थिति को देखते हुए उन्हें तुरंत दिल्ली के सैन्य अस्पताल आरआर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान ऑपरेशन में उनकी हृदय गति रुक गई और उनका आकस्मिक निधन हो गया। सेना के अधिकारियों ने जैसे ही यह दुखद खबर परिवार को दी, घर में कोहराम मच गया और पूरे गांव में मातम पसर गया।

राजकीय सम्मान के साथ जहानाबाद पहुंचा पार्थिव शरीर

अवधेश कुमार का पार्थिव शरीर हवाई मार्ग से गया लाया गया, जहां सेना के जवानों ने उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ सलामी दी। इसके बाद पार्थिव शरीर सबसे पहले जहानाबाद शहर के कालीनगर मोहल्ला स्थित उनके आवास पर लाया गया, जहां हजारों की तादाद में लोग जमा हो गए। कई राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी वहां पहुंचकर वीर सपूत को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। कालीनगर में श्रद्धांजलि सभा के बाद पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक गांव पुनीत बिगहा ले जाया गया।

7 साल के बेटे ने दी मुखाग्नि, पीछे छूटा पूरा परिवार

पुनीत बिगहा गांव में जब अवधेश कुमार के 7 साल के मासूम बेटे ने अपने पिता को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद हर आंख नम हो गई और लोग फफक फफक कर रो पड़े। अवधेश कुमार अपने पीछे अपनी बूढ़ी मां, पत्नी, 11 साल की बेटी और दो छोटे बेटों को छोड़ गए हैं। उनके निधन से परिवार का इकलौता सहारा छिन गया है और आगे की जिंदगी को लेकर पूरा परिवार गहरे सदमे में डूबा हुआ है।

सेना अधिकारियों का परिवार को भरोसा

पार्थिव शरीर के साथ आए सेना के अधिकारियों ने बताया कि अवधेश कुमार बेहद होनहार जवान थे और अपनी ड्यूटी के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उन्होंने शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाते हुए भरोसा दिलाया कि सरकार की ओर से मिलने वाले सभी अनुग्रह लाभ और सहायता राशि परिवार को जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जाएगी।

सवाल-जवाब

अवधेश कुमार कौन थे?
वे बिहार के जहानाबाद जिले के पुनीत बिगहा गांव के रहने वाले भारतीय सेना के जवान थे, जो साल 2012 में सेना में भर्ती हुए थे।
अवधेश कुमार की मृत्यु कैसे हुई?
7 जून को अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सैन्य अस्पताल आरआर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां ऑपरेशन के दौरान हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।
वाघा बॉर्डर पर उनकी तबीयत क्यों बिगड़ी थी?
करीब सात साल पहले वाघा बॉर्डर पर तैनाती के दौरान अत्यधिक ठंड के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद चंडीगढ़ के आरआर अस्पताल में उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी।
पार्थिव शरीर जहानाबाद कैसे पहुंचा?
पार्थिव शरीर हवाई मार्ग से गया लाया गया और फिर राजकीय सम्मान के साथ जहानाबाद के कालीनगर मोहल्ला स्थित उनके आवास और बाद में पैतृक गांव पुनीत बिगहा ले जाया गया।
मुखाग्नि किसने दी?
पुनीत बिगहा में उनके 7 साल के मासूम बेटे ने अपने पिता को मुखाग्नि दी।
वे परिवार में किसे छोड़ गए हैं?
वे अपने पीछे बूढ़ी मां, पत्नी, 11 साल की बेटी और दो छोटे बेटों को छोड़ गए हैं।
उनकी पहली तैनाती कहां हुई थी?
भारतीय सेना में भर्ती के बाद उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के लेह में हुई थी।
सेना ने परिवार को क्या भरोसा दिलाया?
सेना के अधिकारियों ने परिवार को आश्वासन दिया कि सरकार की ओर से मिलने वाले सभी अनुग्रह लाभ और सहायता राशि जल्द से जल्द दी जाएगी।
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