बिहार की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है कि क्या राज्य के चुनावी परिदृश्य में साढ़े तीन दशकों के लंबे अंतराल के बाद किसी बड़े सवर्ण नेता का उदय हो रहा है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के बाद से ही चौक-चौराहों और चाय की दुकानों पर यह बहस छिड़ गई है कि क्या प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने की क्षमता रखते हैं। इस बीच ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ समुदायों के बीच उन्हें लेकर सुगबुगाहट तेज हो चुकी है, जबकि अन्य जातियों के लोग इस समीकरण को खामोशी से परख रहे हैं। राज्य के जातिगत आंकड़ों के मुताबिक इन सभी सवर्ण जातियों की कुल आबादी दस से पंद्रह प्रतिशत के दायरे में आती है, ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केवल इस संख्या बल के सहारे किसी का मुख्यमंत्री बनना संभव है।
बिहार में पिछड़ चुका है सवर्णों का राजनीतिक प्रभाव
ऐतिहासिक दस्तावेजों पर नजर डालें तो बिहार के अंतिम सवर्ण मुख्यमंत्री के रूप में डॉ जगन्नाथ मिश्रा का नाम दर्ज है, जिन्होंने छह दिसंबर 1989 से दस मार्च 1990 तक इस पद की कमान संभाली थी। उनके कार्यकाल से पहले सत्येंद्र नारायण सिन्हा, भागवत झा आजाद, बिंदेश्वरी दुबे और केदार पांडेय जैसे ब्राह्मण और राजपूत समुदाय के दिग्गज नेताओं ने प्रदेश का नेतृत्व किया था। यदि पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह को अपवाद मान लिया जाए, तो उसके बाद से आज तक किसी भी भूमिहार नेता को बिहार का शीर्ष पद हासिल नहीं हुआ है। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब राजनीति का पारा बदला, तो सवर्ण वर्ग का वर्चस्व धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला गया।
लालू प्रसाद यादव के दौर से बदला सत्ता का समीकरण
तत्कालीन जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव दस मार्च 1990 को जब सूबे के मुख्यमंत्री बने, तो वहां मंडल आंदोलन और सामाजिक न्याय की ऐसी बयार बही जिसने सत्ता की पूरी धुरी ही पलट दी। उस बदलाव के बाद से लेकर अब तक के पिछले छत्तीस वर्षों में बिहार की गद्दी हमेशा पिछड़ी या अति-पिछड़ी जातियों के राजनेताओं के पास ही सुरक्षित रही है। इस लंबी अवधि में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार और मौजूदा समय में सम्राट चौधरी जैसे चेहरों ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है, जिससे सवर्णों के हाथ से प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह से बाहर चला गया।
क्यों तीन दशकों से नहीं मिला कोई सर्वमान्य सवर्ण चेहरा
नब्बे के दशक के बाद हुए इन बड़े सामाजिक बदलावों के चलते बिहार की सवर्ण राजनीति पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में चली गई। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई ठोस वजहें थीं, जिनमें पंद्रह फीसदी के आसपास की इनकी कुल आबादी शामिल है जिसके दम पर अकेले दम पर किसी भी चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करना असंभव था। इसके अलावा ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ आपस में ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण बंटे रहे, जिसके कारण कोई एक ऐसा छत्रछाया वाला नेता नहीं उभर सका जिसे सब स्वीकार कर सकें। हालांकि इस वर्ग ने मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी को अपना पारंपरिक राजनीतिक ठिकाना बनाया, लेकिन पार्टी ने भी अपनी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री पद के लिए हमेशा अति-पिछड़े या पिछड़े वर्ग के नेताओं को ही आगे रखा।
क्या प्रशांत किशोर साध पाएंगे सभी जातियों का समीकरण
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने अपनी सक्रियता से पारंपरिक क्षेत्रीय दलों को सीधी चुनौती पेश की है। हालांकि वे खुद को किसी एक जाति के दायरे में बांधने से इनकार करते हैं और हमेशा सही सोच तथा सामूहिक प्रयास की बात पर जोर देते हैं, लेकिन विश्लेषक उनके उभार को सवर्ण राजनीति के पुनरुत्थान के रूप में देख रहे हैं। उनके ब्राह्मण होने की वजह से इस समाज में उनके प्रति एक स्वाभाविक झुकाव पैदा हो रहा है, जो लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा है। दूसरी तरफ भूमिहार युवाओं के बीच उनके विकास, शिक्षा और पलायन रोकने जैसे मुद्दों को लेकर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है, जबकि पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ खड़े रहने वाले राजपूत और कायस्थ समाज के युवा भी अब इस नए विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
युवा मतदाताओं और नई चुनौतियों की भूमिका
बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे और हालिया पदयात्राओं ने यह संकेत दे दिए हैं कि आज का मतदाता केवल पुरानी लीक पर चलने के पक्ष में नहीं है। विशेष रूप से जेन-ज़ी वर्ग के युवा इन पारंपरिक समीकरणों से ऊपर उठकर बुनियादी विकास के मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं, जो प्रशांत किशोर के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। तीस साल से कम उम्र के युवा उन्हें एक शिक्षित और आक्रामक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। हालांकि उनके लिए यह डगर बिल्कुल आसान नहीं रहने वाली है क्योंकि उन्हें न केवल चारों सवर्ण समूहों को एक मंच पर लाना होगा, बल्कि दलितों, अति-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का भरोसा भी जीतना अनिवार्य होगा। यदि वे इन सभी मोर्चों पर कामयाब होते हैं, तो वे वाकई तीन-चार दशकों के अंतराल के बाद बिहार की राजनीति में एक नया इतिहास रच सकते हैं।


















