समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर अपने अकाउंट @yadavakhilesh से एक पोस्ट करते हुए एथनॉल नीति को लेकर सरकार पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने लिखा कि एथनॉल असल में मुनाफ़ाख़ोरी का एक नया नाम बन चुका है।
'सरकारी मिलावट' का आरोप
अपनी पोस्ट में अखिलेश यादव ने एथनॉल को एक ऐसा त्रि-मिश्रण करार दिया जिसमें तीन पक्ष शामिल हैं, सरकार, एथनॉल बनाने वाली कंपनियां और तेल कंपनियां। उनका कहना है कि इन तीनों के बीच एक साझेदारी काम कर रही है, जिसे उन्होंने 'सरकारी मिलावट' नाम दिया। यानी उनके मुताबिक यह महज एक ईंधन नीति नहीं बल्कि तीन अलग-अलग हितों वाले पक्षों के बीच का एक ऐसा गठजोड़ है जिसका फायदा आम जनता के बजाय इन तीनों पक्षों को मिल रहा है।
एथनॉल के समर्थन में दिए जाने वाले तर्क
अपनी पोस्ट में उन्होंने यह भी माना कि एथनॉल के समर्थन में आमतौर पर दो बड़े तर्क दिए जाते हैं। पहला यह कि इससे प्रदूषण कम होगा और दूसरा यह कि देश का आयात बिल घटेगा क्योंकि कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल पर निर्भरता कम होगी। हालांकि इसके तुरंत बाद उनकी पोस्ट अधूरी रह जाती है, वे लिखते हैं कि सरकार यह नहीं, और आगे की बात एक लिंक के साथ जुड़ी हुई है। इससे साफ है कि उनका मकसद यह दिखाना था कि सरकार इस पूरे मामले में जनता से कुछ ऐसा छिपा रही है जो सामने आना चाहिए, भले ही पोस्ट में वह बात पूरी तरह स्पष्ट न हो सकी हो।
जनता की प्रतिक्रिया
अखिलेश यादव की इस पोस्ट पर सोशल मीडिया पर मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ यूज़र्स ने उनकी बात का समर्थन करते हुए एथनॉल मिश्रण नीति से आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई, वहीं कुछ लोगों ने इसे सरकार और तेल कंपनियों के बीच एक व्यावहारिक ट्रेड-ऑफ बताते हुए उनकी आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया। कई यूज़र्स ने इस मुद्दे पर सवाल भी उठाए और स्पष्टीकरण मांगा, जबकि कुछ ने राजनीतिक नज़रिए से उनकी आलोचना भी की। कुल मिलाकर इस पोस्ट ने एथनॉल नीति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।



















